अज्ञान का दूसरा नाम शोषण है। जो आज अपनेआप को शोषित कह रहा है, वो भीतर- ही- भीतर तैयारी करके बैठा है कि कल शोषण करूँगा। तो जो आज का शोषित है, वो कल का शोषक बनता है। हमें ये नहीं करना है कि संतुलन ला दिया और संतुलन का मतलब हुआ कि अब दोनों बराबर का शोषण करेंगे। वो कोई संतुलन नहीं होता है। हमें ये करना है कि जो शोषण का मूल कारण ही है उसको मानव मात्र के भीतर से हटा दें।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
मंच संचालक1: हमारे गेस्ट ऑफ़ ऑनर आचार्य प्रशांत जी। बहुत-बहुत स्वागत सर आपका। आपसे रिक्वेस्ट करूँगी हमारे साथ डाइस (मंच) पर जुड़ें और दो शब्द… सर।
आचार्य प्रशांत: इस अवसर पर मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। पुरुष आयोग के गठन की बात है और…मुझे आने में थोड़ी देर हुई, तो जब मैं आ रहा था, तो यूट्यूब पर लाइव सुन रहा था, जो बातें हो रही थीं। तो उस तरह से जुड़ा हुआ था।
तो मुद्दे के जो सामाजिक और कानूनी पक्ष हैं, उनकी बात हुई है और उनके बारे में आप लोग मुझसे कहीं बेहतर ही जानते होंगे। मेरी उसमें कोई विशेषज्ञता नहीं है। मैं थोड़ा-सा हटकर के इस चीज़ के आन्तरिक पहलू पर पाँच-सात मिनट चर्चा करना चाहूँगा।
अभी हाल में कईं घटनाएँ घटी हैं जहाँ कहीं पर एक महिला को, कहीं पर एक पुरुष को अपने ही साथी के हाथों, परिवार के लोगों के हाथों, पति या पत्नी के हाथों या प्रेमी के हाथों, क्रूरता का शिकार होना पड़ा है और मौत हुई है, हत्या हुई है। तो उसको लेकर के मुझसे कोई बात कर रहा था, बोले कि,




