
देने वाले ने तुम्हें जो भी कुछ दिया है वो सहजता में ही दे दिया है और जो तुम्हें सहज न मिल रहा हो समझ लो कि वो तुम्हारे लिए है नहीं। कबीर साहब कह रहें हैं कि जो भी कुछ सहज मिल रहा हो, वही मीठा है; और जहाँ कहीं खींचा-तानी है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती है, वो नहीं है तुम्हारे लिए। उसकी कोशिश व्यर्थ मत करो।



ये खेल ऐसा है जिसमें ये नहीं देखा जाता कि किसने अंक ज़्यादा बनाये, इसमें ये देखा जाता है कि अन्त तक डटा कौन रहा, आख़िरी घड़ी तक खड़ा कौन रहा। इसमें बात ये नहीं है कि कौन कितना तेज़ दौड़ा, कहाँ तक पहुँच गया, इसमें बस बात ये है कि कौन मैदान छोड़कर भाग नहीं गया। जो मैदान छोड़कर नहीं भागा, वो जीत गया। ये नियम है इस खेल का। इसमें हार सिर्फ़ एक तरीक़े से होती है कि तुम मैदान छोड़ दो, *नॉक आउट* (पराजित) अपनेआप को घोषित कर दो कि भैया मेरा हो गया!


I tell everybody that small defeats are inevitable. You will have them. Let them not mean too much. If you are too disturbed by small defeats, you have had it; you won’t stay put for long. You would be so embarrassed and so ashamed of yourself that you will quit.

If you are in a railway coach, and that too an enclosed cabin with two fellow passengers, and it’s just a journey, let’s say, ten hours long, and those two guys are constantly squabbling, what would it do to you? If you are very patient, you will try to sleep.




आचार्य प्रशांत: सातवीं-आठवीं की बात होगी, तो हमारे साथ एक पढ़ा करता था, और उसका आठवीं में ही नाम पड़ गया था क्लास में — बुढ़ऊ। क्यों पड़ गया था? क्योंकि वो कक्षा के औसत विद्यार्थी से उम्र में लगभग दो साल बड़ा था। और इतना ही नहीं था, कुछ


प्रश्नकर्ता: मरने के बजाय अभी इसी क्षण जीवन में ही मुक्ति मिल सकेगी।
आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ जीवन में। तुलना भी नहीं है। तुलना दो इकाइयों के बीच में की जाती है न, दूसरी इकाई है ही नहीं। तो मुक्ति है तो इसी जीवन में है, और इस जीवन में कल…


प्रश्नकर्ता: मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल (प्रेरणा स्तर) बहुत फ्लकचुएट (उतार-चढ़ाव) होता है, दिन में ही कई बार बहुत गहरे में भी चला जाता है। ऐसा लगता है कि मुझे किसी

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं अभी बहुत दबाव में हूँ। पिता जी को दिल का दौरा पड़ा था, उनको लेकर अस्पताल पहुँचा और आगे का इलाज करवाया। पर अस्पताल पहुँचकर मैं बहुत हिल गया। एक साल से मैं आपको सुन रहा हूँ। हम आपसे सीखते हैं कि हम असंग हैं,

किसी की कदर तुम कर रहे हो किसी स्वार्थ की ख़ातिर, ठीक? इसको कहते हैं भाव देना। तुम उसे भाव दिए जा रहे हो, भाव दिए जा रहे हो और वो और ऐंठता जा रहा है, ऐंठता जा रहा है। एक बिंदु तो आता है जब तुम कहते हो, “धत्त

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। जब कभी-कभी मुझे लगता है कि कोई ग़लत कर रहा है या बोल रहा है, तो मैं उन्हें रोक नहीं पाती। ऐसा लगता है कि बोलूँगी तो उन्हें बुरा लगेगा, या उनको तक़लीफ़ होगी। उनकी बात पर बस हँस कर चली आती हूँ।

Patience is not about accommodation, adjustment, or tolerance. The patience we know is suffering. Real patience is timelessness—where you don't even feel time. Like when you're deeply immersed in a book in the late night, and suddenly it’s dawn with birds chirping—that is patience. Real patience is love, where time simply disappears.
Do not use your life as a waiting room. Do not wait even a second for things that merely promise but won’t deliver, as it's in the future which is unseen. Having seen that what you hope and expect will never materialize, do not wait another moment. Drop what is false. Don’t be kind or liberal; have no patience with falseness.
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस:। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।६.३७।।
अर्जुन बोले — हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस…
You are doing the right thing but not finding validation of it from your peers. So, in spite of doing the right thing and living rightly, or at least beginning to live rightly, you feel as if something deeply wrong is happening with you. It’s a bad situation.
Change your…
Question (Q): Sir, you always talk of filling life with the highest work possible. I want to know what exactly is that highest work you repeatedly refer to?
Acharya Prashant(AP): We know of what is not high, right? When we are talking of filling our lives with the highest possible,…
प्रश्नकर्ता: जब वो बातें बोलते हैं और कोई नहीं मानता, तो फिर उन्हें कोई गुस्सा या कोई नफ़रत नहीं होती है और उसके लिए आपने कहा था क्योंकि वह अपनेआप में सुरक्षित है। ये बात मुझे समझ नहीं आयी क्योंकि मेरे साथ ऐसा ही होता है। मैं बातें बताती हूॅं…
आचार्य प्रशांत: तिरसठवाँ श्लोक उद्धृत किया है, पिंगलागीता से। भीष्म कहते हैं, युधिष्ठिर से - “राजन्! ब्राह्मण द्वारा कहे गए इन युक्तियुक्त वचनों से राजा सेनजित् का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गए और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।”
तो कह रहे हैं प्रश्नकर्ता कि यहाँ तो ऐसा…
प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, प्रणाम। अच्छे श्रोता कैसे बन सकते हैं? मुझे बीच-बीच में टोकने की आदत है जैसे कि मैं बोल रहा हूँ, जैसे कि कोई बोल रहा होता है तो कई बार उसका जवाब आता है मुझे फिर मैं बोलना शुरू कर देता हूँ।
आचार्य प्रशांत: जब बहुत मन…
आपको जब सुनता…
क्या ऐसा करना…
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

Victory is not decided by the trophy you hold but by the battle you choose to fight. Real strength lies in making the right decisions, staying true to your deepest values, and refusing to be ruled by fear or circumstances. When your actions arise from clarity rather than ambition, the outcome loses its power over you. The moment you choose the right path, you have already won.

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।

Vedanta reveals that freedom is impossible as long as the ego seeks to preserve itself. Meditation may bring temporary calm, but real transformation begins only when the false sense of individuality dissolves. Whether through devotion or knowledge, every genuine spiritual path culminates in the complete dissolution of the seeker into Truth. Liberation is not the experience of Truth by an individual—it is the end of the individual who wants to experience Truth.

Kabir Saheb's message questions the very act of searching for fulfilment outside oneself. Whether through religion, relationships, success, possessions, or identity, people keep assuming that what is missing lies somewhere else. The problem is not the destination but the belief that fulfilment exists at a distance. Real freedom begins when the search turns inward, recognising that the seeker and the sought were never truly separate.

काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।

प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।

आध्यात्मिकता दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझना है। परिवार, बच्चों और समाज से संवाद के लिए उनके रुचि-क्षेत्रों को जानना आवश्यक है। किसी विचार को थोपने के बजाय समझ और निष्पक्षता से बात करनी चाहिए। आत्मज्ञान जीवन के हर क्षेत्र को दिशा देता है। सीखने की प्रक्रिया में जिज्ञासा, अध्ययन और खुला संवाद व्यक्ति को अधिक परिपक्व, प्रभावी और सार्थक बनाते हैं।

मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

आज के समय में बच्चों में मोबाइल और गेम का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खुद माता-पिता की लापरवाही और सुविधा-प्रियता है। समस्या को समझाने से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित करने से हल किया जा सकता है। इसी तरह सोशल मीडिया तुलना और हीन भावना को बढ़ा रहा है। हर मानसिक समस्या का मूल समाधान आत्म-जागरूकता और सही दिशा में प्रयास है, जिसके लिए व्यक्तिगत पहल जरूरी है।

Questioner (Q): Why do we forget?
Acharya Prashant (AP): The question is, "Why do we forget? Why forgetting is a property of the mind?"
Do not ask, "Why do we forget?" Just remember that we forget. Because when you forget then you don’t ask this question that, "Why do we…

If you are honest, you will find that significant chunks of your time are being taken up by activities you do not even want to admit to yourself. The thing is, we ought to be objective; we ought to know where it is really going. And you might discover that nobody is actually all that short of time. Time is there; it’s just that when it is spent on activities that please us, we try to hide that time because it’s our little joyful secret.

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

पूरी दुनिया की ओर देखिए सब सेटल्ड-ही-सेटल्ड लोग दिखाई दे रहे हैं। दिल-ही-दिल में हर सेटल आदमी जानता है कि वो ग़लत जगह सेटल हो गया है। जहाँ रुकना नहीं चाहिए वहाँ रुक गया है। अगर अभिभावकों को यह नहीं पता कि उन्होंने जीवन में क्या-क्या ग़लत करा है, तो उन्होंने जो कुछ करा है वही वो अपने बच्चों तक भी पहुँचा देंगे। बच्चे हमारे शब्दों से बहुत कम सीखेंगे, वो हमारे जीवन से सीख लेते हैं। आपका जीवन अगर आज़ादी भरा है, हिम्मत भरा है, तो बच्चों को सीख मिल गई आपसे।

बच्ची कुछ ऐसा कर रही है और आपको गुस्सा आ रहा है, उसको बता दीजिए कि “बेटा, आप जो कर रहे हो, बहुत गुस्सा आ रहा है, मेरा मारने का मन हो रहा है।” बस ये बोलिए, मारिए मत। फिर उसी से पूछिए, “अच्छा बताओ, मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है?” उनको एंगेज़ करिए न। नहीं तो एक अजीब-सी बात है, वो कुछ कर रही है, आपने थप्पड़ मार दिया, उसको समझ में भी नहीं आया कि आपने थप्पड़ क्यों मार दिया। उसको ही बताने दीजिए कि “हाँ, मैंने जो किया है, उस पर गुस्सा तो आपको आएगा।” तो अब एक ज़्यादा एंगेजिंग रिलेशनशिप बनी न।

बेटों को अगर वही सब कुछ करना है जो पूरी दुनिया करती है, तो आप वीकेंड पर गोवा में ये गीता क्यों पढ़ रही हैं? पूरी दुनिया ये तो नहीं करती। या मीठा-मीठा ख़ुद खाना है और इधर-उधर की गड़बड़ बच्चों को खिलाना है? पूरी दुनिया जो कर रही है, अगर वही करना है तो आप यहाँ क्यों मौजूद हैं? आपकी छोड़िए, मैं यहाँ क्यों मौजूद हूँ? मैं भी वही करता हूँ जो पूरी दुनिया कर रही है। मुझे यहाँ क्या करना है?

आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है, तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है। स्कूल अपने तरीक़े चला देता है और माँ-बाप उसमें सहभागी बन जाते हैं। इस पीढ़ी को मिकी माउस बनाए दे रहे हैं, रोबोटिक, असंवेदनशील और बहुत-बहुत भयभीत। बच्चे पर रोज़ सौ तीर लग रहे हैं; इस वक़्त उसको सुरक्षा चाहिए, और अध्यात्म के अलावा कोई दूसरा कवच नहीं है।

If you are in charge of a kid, then you have to be very sensitive, very careful, and loving. Just being with the kid in a loving way, not even having planned what to teach him, is sufficient. Instead of teaching kids, I have been learning from them, and they have given my ego great lessons by exposing me. No kid needs any training; we need de-training.

Karma is a reflection of who you are. You are the doer. Karma means action. You are the actor. The principle of karma is: do not focus on karma; focus on karta, the doer, the actor. That is karma, that’s all. There is nothing mystical about it.

Can you go to the past and choose something or unchoose something? And life is happening right now. So your power to respond to life is right now. But the moment you say it is happening due to the past, then you have surrendered your power to choose, because you cannot do anything with the past. You cannot change the past. You can’t choose the past. You can’t unchoose the past. You can’t modify it. You can do nothing.

साल भर जो निरंजन में जिया है, उसके लिए कल राम निरंजन; और साल भर जिसने मनोरंजन ही पाला है, उसके लिए फिर पर्व भी मनोरंजन। अंजन माने क्या होता है? कालिमा। तो राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे। समझ रहे हो? अब आपको तय करना है कि सकल पसारा माने चहुदिश जो ये व्याप्त है, आपको इसका होना है या इससे न्यारा होना है। न्यारा माने अलग, अस्पर्शित।

For most of us, work is a random accident. You’re born a girl, so you’ll become a housewife. Born a girl, how will you be an astronaut or a swimmer? Is any self-awareness needed? Do not let your choice of work be dictated by social norms or established channels. When work arises as an expression of your deepest clarity, only then can there be love.

काम ज़रूरी होते हैं, रिज़ल्ट पर हमारा हक़ नहीं होता। जब फ्रस्ट्रेशन में समय बीत रहा हो, तो तुरंत याद आना चाहिए कि यार, इतना भी समय कहाँ है कि मैं उदास हो पाऊँ। और अगर मेरे पास ये समय है, तो मैं ये समय अपने असली काम से चुरा रही हूँ। काम ज़रूरी है, तो जो कुछ तुम्हारे पास है, सब दे दो न उसको। इतना थक जाओ कि फ्रस्ट्रेट होने के लिए भी एनर्जी न बचे।

कितनी बार सोचा कि ये रील आख़िरी होगी, बस यहीं पर रुक जाना है, और रात के 3:00 बज गए, 4:00 बज गए। क्या करोगे आप बहुत स्क्रॉलिंग करके, या टीवी, या एक-एक घंटा नहाकर, या दो-दो घंटा खाकर? कुछ नहीं है, बैठे हुए हैं; ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही — ‘हाँ भाई, दो चाय और ले आओ।’ जब पता चल गया है कि क्या सही है, तब अपने आप को उसको सौंपना पड़ेगा, शत-प्रतिशत। ये आर्किमिडीज़ जैसी हालत है कि कपड़े पहनना भूल गए; दिनभर काम में डूबे रहे, वापस गए, बस चित्त पड़ गए। पर चूँकि वो चीज़ एक कीमत माँगती है, तो वो 1% लोगों को ही मिलती है।

The Gita is not made precious by the fact that Arjun won. No, Arjun may win, or Arjun may lose. The real thing lies in having the Truth represented by Shri Krishna at the heart. When you are fighting the right war, then you have won even before the war has begun. That does not mean that you will no longer fight. You will still fight, and you will fight for the sake of external victory. But inwardly, you are victorious even before shooting the first arrow.

हर बच्चा विद्रोही ही पैदा होता है; ये आदर, सम्मान, संस्कृति, सभ्यता, तमीज़, तहज़ीब — ये सब जो शब्द हैं, बच्चों को बचाकर रखो इनसे। उसके ऊपर नियम-कायदे मत लगाइए — “यहाँ बैठो, ऐसे करो, चलो-चलो, सीधे हाथ से खाना खाया करो।” बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं; प्राण होना चाहिए। बच्चा चाहिए एकदम जिसमें भीतर ज़िंदगी इतनी है कि छलक रही है, बाँधें नहीं बंध रहा, समेटे नहीं सिमट रहा — ऐसा होना चाहिए बच्चा।

हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।

Our definitions of beauty and greatness are all egoistic. Something is beautiful if it corresponds with our likes and with our taste — then we call it beautiful. Whereas the real definition of beauty is that which silences you, that which does not leave you even in a position to utter a "Wow!" That's beauty. That which takes you beyond yourself — that's beauty.

We say, “Oh yes, this thing is right, and it must be done, but…” If the thing is right and it must be done, from where has this split arrived? There is no need to split the action from the result of the action. Right action is its own fruit. Now you can rebel. If rebellion is the right thing to do, why bother about the result of rebelling?

रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती।

कोई भी कर्म तब सही है जब सत्य से उठता हो ज्ञानी के मामले में, या सत्य की ओर ले जाता हो अज्ञानी के मामले में। प्रथा भी अच्छी हो सकती है, अगर वो सत्य की ओर ले जाती हो, समझदारी की ओर, ज्ञान की ओर ले जाती हो तो वो प्रथा अच्छी है। पर जिस प्रथा के साथ कोई समझ जुड़ी ही नहीं है, उस प्रथा में क्या रखा है?