
धर्म के साथ कई तरह की परंपराएँ जुड़ी हैं, जिनका उद्देश्य होता है — मन को भ्रम और दुख से मुक्ति देना। ‘शिव’ परम सत्य का दूसरा नाम है। यदि तीर्थाटन करने से मन साफ़ हो रहा है, आपके मन में सच्चाई दृढ़ता से स्थापित होती है, तो तीर्थयात्रा बहुत शुभ है — चाहे वह कावड़ यात्रा हो, अमरनाथ यात्रा हो, या केदार यात्रा। लेकिन यदि शिव का अर्थ बस मानसिक तल पर कुछ मान लिया है, उस पवित्रता से प्रेम ही नहीं, तो फिर क्या ही लाभ।









प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नाम परितोष त्रिपाठी है और मैं भी बनारस से ही आया हूँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो रुद्राक्ष होता है उसके बारे में जैसे बचपन में मैंने भी सुना था, घर में कहते थे कि रुद्राक्ष को मंदिर में रखते हैं तो उससे जीवन में एक सकारात्मकता आती है।

आचार्य प्रशांत: तुलसीदास उल्लेख करते हैं एक स्थान पर, वहीं से प्रश्नकर्ता ने ये सवाल रखा है: उल्लेख ये है कि ब्रह्मा जी पार्वती जी से शिकायत कर रहे हैं कि शिव आगा-पीछा देखे बिना, विचारे बिना, दान करते रहते हैं। इतना दान दे देते हैं कि उनके पास भी…

प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, प्रणाम। आज गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर है। आपसे आज तक मिला तो नहीं हूंँ, लेकिन आपके वीडियोस व्याख्यान ही मेरे लिए गुरु समान हैं। सबसे पहले धन्यवाद!


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अनहद में नाचते समय जो ऊर्जा थी वह ऊर्जा हमेशा नाचने में क्यों नहीं होती?



सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?





अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।

हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ पर कोई तर्क हो ही नहीं सकता। हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ कोई मान्यता हो नहीं सकती और कौन सी हैं वो जगह ‘मैं’। बिल्कुल हो सकता है कि ये दीवारे न हो, ये मेरी मान्यता हो, आँखों का धोखा हो, सब कुछ झूठ हो सकता है। लेकिन एक चीज तो है न, जो है और उसी की खातिर मैं बात कर रहा हूँ, मैं हूँ और मैं हूँ। मुझे मेरे होने का दुख नहीं पता चलता है। मैं दुखी हूँ। यहाँ से सारा अध्यात्म शुरू होता है। बाकी सब नकली हो सकता है। आपको सामने वाले से एक बात पूछनी है दुखी हो? और ‘हो’। दुखी हो। उसमें अस्तित्व भी आ गया तुम्हारा। अहम। हो, हो माने अस्तित्व है तुम्हारा। अहम और दुख है। हाँ यही है अध्यात्म सारा।
आम जनमानस में तो ये एक ही हैं, पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे नाम सिर्फ नाम हैं, और शिव सत्य हैं। शिव कोई चरित्र नहीं हैं; शंकर का चरित्र होता है। शंकर किसी पुराण के केंद्रीय पात्र हो सकते हैं, शिव नहीं। शंकर मन की जितनी अधिकतम ऊँचाई पर उड़ सकता है, वह हैं। और शिव हैं उस मन का आकाश में विलीन हो जाना। तो विचार का उच्चतम बिंदु हुए शंकर, और निर्विचार हुए शिव।
महाशिवरात्रि का उत्सव मनाने का सार भीतर के अंधकार को पहचानना और उसे कम करने का प्रयास करना है, यह मानते हुए कि यह त्योहार केवल एक दिन का नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की निरंतर यात्रा है। यह रात महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विनाश की एक धारा और नए आरंभ की दूसरी धारा के मिलन का प्रतीक है। किसी भी नए आरंभ के लिए, पहले पुराने, सड़े हुए और झूठे तत्वों को समाप्त करना आवश्यक है।
शिव कोई ऐसी इकाई नहीं हैं, जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। हम सब जहाँ पहुँचना चाहते हैं, हमारी एक-एक गतिविधि जिस अवस्था को हासिल करने के लिए है, उसका नाम है—शिव। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं और शिव मन का केन्द्र हैं। शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव कोई देवता, भगवान या ईश्वर नहीं हैं, शिव सत्य मात्र हैं।
दो आँखें सबके पास होती हैं, और ये सिर्फ़ दुनिया को देखती हैं, स्वयं को नहीं। शिव की तीसरी आँख एक प्रतीक है, जो बताती है कि आपकी ज़िंदगी में दुनिया से परे कुछ होना ज़रूरी है। क्योंकि जो केवल दुनिया को देखेगा, वह उसमें फँसकर दुख पाएगा। इसलिए दुनिया को और स्वयं को एकसाथ देखो। यही शिवत्व और शिव के तीसरे नेत्र का अर्थ है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सपनों में या ध्यान में किसी भी भगवान के दर्शन हो जाने को बड़ा महत्व दिया गया है, लोगों को ध्यान में शिव दिखते हैं और ऐसी बहुत कहानियाँ और भी प्रचलित हैं, ये सब क्या है कृपया स्पष्ट करें?
आचार्य प्रशांत: और शिव का भी वही…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते…
आचार्य प्रशांत: आप मन का कोई विषय नहीं हैं। मन में कभी कोई विषय देखा है जो शाश्वत रहे कि अब आ गई मन में वो बात तो लगातार है, कोई भी ऐसी बात है? ज़िंदगी में आपको जो चीज़ सबसे प्यारी हो, वो भी क्या ऐसा होता है कि…
(श्रोतागण हँसते हुए)
प्र: महर्षि वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण लिखा है जिसमें सात खंड हैं, जिसमें चौथा खंड काशी खंड है। और उसमें जो…
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं!
देखो, भारत एक विशेष जगह रहा है। यहाँ पर हमने…
श्री गुरुगीता में आया है —
"शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्।।"
यदि…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले छः महीने से सुन रही हूँ और मेरा प्रश्न पहले सत्र से जुड़ा हुआ है। तब आपने कहा था और मैं मानती भी हूँ कि जो ब्रह्म है वही सत्य है। और जो निराकार है, जिसे हम ईश्वर भी कहते हैं, सामान्य भाषा…
नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।
डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।
डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।
जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।

युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।

अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।

जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।

दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!

ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।

कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।

मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।

अगर बीमारी वह चीज़ होती है, जिसके बाद मौत आती है, तो ज़िंदगी ही बीमारी है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। सबको ही जाना है। प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं? मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना, कि मौत भूल ही जाए। और कोई मौत याद दिलाए, तो मौत चुटकुले जैसी लगे।

अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।

यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।

जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।

प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।

गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।

प्रश्न: ‘भगवान’ क्या हैं?
वक्ता: इसका जवाब देना बहुत आसान हो जाता अगर तुमको वाकई पता ही ना होता, अगर पहले ये शब्द कभी सुन ही न रखा होता। अगर कोई बिल्कुल साफ़ स्लेट के साथ ये सवाल पूछे, ‘भगवान का क्या मतलब है?’ तो इसका जवाब देना…

चार्ली चैप्लिन की कॉमेडी होती है, उसमें वो बेचारे हमेशा गिर रहे होते हैं, पिट रहे होते हैं। मज़ा आता है या नहीं आता है? कितना हँसते हो। और अपने साथ हो जाता है तो? अपने साथ भी जब हो, तो यही मानो, दूसरे के साथ हुआ है। मैं सब कुछ ऐसे ही लेता हूँ, जैसे चार्ली चैप्लिन के साथ हो रहा हो, मेरे साथ नहीं हो रहा। आई टेक नथिंग पर्सनली। जितना दुनिया पर आश्रित रहोगे, दुनिया उतनी चोट मारेगी। और दुनिया पर आश्रित नहीं हो, तो दुनिया के भाँति-भाँति के रंग उल्लास की बात बन जाते हैं।

वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।

मृत्यु डरावनी होती ही इसीलिए है, क्योंकि वह एक अधूरी कहानी का अंत होती है। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम रोते हैं कि अभी सोचा था इनके साथ यह बातें करेंगे, नहीं कर पाए। अभी सोचा था, इनको साथ ले वहाँ घूम आएँगे, नहीं घूम पाए। बहुत कुछ संभव था, जो हो नहीं पाया। मृत्यु का कष्ट है ही अधूरेपन में, तो मरने से पहले ही पूरे हो जाओ। मरो मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा — मुक्त हो जाओ।

अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।

सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।

जब अपनी ज़िंदगी का पता होता है तो दूसरों से ईर्ष्या नहीं होती। दूसरों से आप बहुत तुलना करना ही नहीं चाहते क्योंकि अब ‘me versus you’ नहीं होता, अब ‘me versus me’ होता है। दूसरे को देखकर आप एक प्रेरणा ले सकते हो, लेकिन उसकी जो तरक़्क़ी देखोगे, वो उसकी तुलना में देखोगे। हम गड़बड़ ये कर देते हैं कि उसकी तुलना अपने आप से करने लगते हैं, जबकि हर व्यक्ति की स्थिति और स्थान बिल्कुल विशिष्ट होता है।

बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

हम सब जिनको चाहते हैं, या तो वह हमसे पहले चले जाते हैं या हम उनसे पहले चले जाते हैं। यह विदाई बताती है कि जैसे तुमने मुझे चाहा, लेकिन पाया कि मैं खो गया, वैसे ही तुम जो कुछ भी चाह रहे हो, वह सब खो जाना है, नष्ट हो जाना है। तो जाने वाला अपनी अन्तिम और उच्चतम इच्छा आपको बता रहा है कि कुछ ऐसा चाह लो, जो विदा न हो सकता हो, जिसको मौत भी तुमसे न छीन सके। तुम सही ज़िंदगी जियो, अपना जीवन पूर्ण करके दिखाओ — यही वास्तविक श्रद्धांजलि है।

आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी।

अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।