जूता सर पर नहीं रखा जाता || आचार्य प्रशांत, वेदान्त पर (2020)

आचार्य प्रशांत: आप मन का कोई विषय नहीं हैं। मन में कभी कोई विषय देखा है जो शाश्वत रहे कि अब आ गई मन में वो बात तो लगातार है, कोई भी ऐसी बात है? ज़िंदगी में आपको जो चीज़ सबसे प्यारी हो, वो भी क्या ऐसा होता है कि वो किसी भी पल मन से ओझल नहीं होती? कुछ भी ऐसा है जीवन में? कुछ भी है क्या? तो मन ही वो जगह है जहाँ चीज़ें आती हैं और जाती हैं, वही जन्म और मरण का चक्र है। वहीं पर ये सारी घटनाएँ घट रही हैं।
"हे रुद्रदेव, आप जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हैं। न आपका उदय होना है, न आप कभी अस्त होते हैं। न आप आते हैं, न आप जाते हैं। आप मन का कोई विषय हैं ही नहीं।" ये बात हम फिर दोहरा कर कहेंगे कि मन के विषयों के विरुद्ध इतनी सावधानी रखने को क्यों कहा जा रहा है। कदाचित ऋषि उनमें से हैं जिन्होंने मन की तगड़ी चोट सही है।
थोड़ा और स्पष्ट करूँगा — मन की चोट पड़ती तो हम सब पर है, पर सिर्फ़ कोई संवेदनशील व्यक्ति होता है, जो उस चोट का पूरा-पूरा प्रभाव अनुभव करता है; क्योंकि आपके साथ क्या हो रहा है और आपने क्या अनुभव करा, इसमें बहुत अंतर हो सकता है। अगर आपमें संवेदना नहीं है, अगर आपका अंतर्जगत सुन्न सा पड़ा हुआ है, तो ये बिलकुल हो सकता है कि ज़िंदगी आपको रोज़ चोटें देती रहे और आपको कुछ पता ही न चले। वास्तव में ज़िंदगी हमें रोज़ जो चोटें देती है, वो हमें पता न चले इसके लिए हम इंतज़ाम ही यही करते हैं, क्या? सुन्न पड़ जाओ, असंवेदनशील हो जाओ। फिर दर्द नहीं होगा, पीड़ा नहीं होगी।
ऋषि उनमें से हैं, जिन्होंने चोट भी सही है और चोट का पूरा-पूरा बेख़ौफ़ अनुभव भी करा है। मैं बेख़ौफ़ क्यों बोल रहा हूँ? क्योंकि अनुभव कष्ट देता है न, तो अनुभव को गहराई तक भीतर जाने देने के लिए बड़ा निडर होना पड़ता है। हम तो अनुभव से डरते हैं। हमें लगता है अनुभव हमें तोड़ देगा। हम तो सख़्त हो जाना चाहते हैं, कठोर हो जाना चाहते हैं, एक तरह से निष्प्राण और अचेतन हो जाना चाहते हैं। क्योंकि पूरा अगर अनुभव हो गया, तो वो हमें दहला देता है, हमें तोड़ देता है। हमें माने अहंकार को ही, और किसी को नहीं। तो इसीलिए फिर हम अनुभवों के प्रति संज्ञाशून्य हो जाना चाहते हैं। हम कहते हैं, हमें नहीं पता कुछ हुआ कि नहीं हुआ, हुआ भी हो तो कहीं हो गया होगा, मैं उसका संज्ञान ही नहीं लूँगा। समझ में आ रही बात?






