शिवलिंग: बहस से पहले बोध || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नाम परितोष त्रिपाठी है और मैं भी बनारस से ही आया हूँ।
आचार्य प्रशांत: हम भी बनारस से ही हैं।
(श्रोतागण हँसते हुए)
प्र: महर्षि वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण लिखा है जिसमें सात खंड हैं, जिसमें चौथा खंड काशी खंड है। और उसमें जो भी काशी में शिवलिंग है उनके बारे में बहुत ही विस्तृत रूप में बताया गया है। तो एक तो प्रश्न ये था कि ये शिवलिंग का मतलब क्या है, इनका प्रयोजन क्या है? उनको क्यों पूजा जाए? और दूसरा कि इन तीर्थ का कोई विशेष महत्व है या सिर्फ़ ये एक तीर्थाटन की जगह मान लिया जाए?
आचार्य: अच्छा प्रश्न है। चाहता तो मैं ये हूँ कि ये प्रश्न वो सब लोग पूछे जो शिवलिंग विवाद में बड़ी गहरी रुचि, उत्सुकता इत्यादि रखते हैं। खासतौर पर जिन लोगों के पास बड़े ठोस विचार और मत हैं, उग्र मत हैं। सबसे पहले तो उन्हें पूछना चाहिए कि क्या उन्हें पता भी है कि शिवलिंग माने क्या। और अगर वो नहीं जानते हैं कि शिवलिंग माने क्या, तो उनकी निष्ठा है किसके प्रति? वो किस बात को लेकर के शोर मचा रहे हैं अगर वो जानते ही नहीं हैं कि शिवलिंग माने क्या?
शिवलिंग क्या है इस पर विस्तार में मैं कई बार चर्चा कर चुका हूँ। बाहर इतनी किताबें हैं उनमें से किसी किताब में अध्याय भी होगा। एक पूरी चर्चा थी लगभग एक घंटे की, शिवलिंग का अर्थ क्या है। उसका वीडियो उपलब्ध भी होगा, उपलब्ध है। पूरा विस्तार से उसमें समझाया है कि कहाँ से लिंग की पूजा की शुरुआत हुई, फिर कैसे आगे बढ़ती गई, आगे बढ़ती गई। उसको लेकर के भ्रम किस तरीके से हैं और अंग्रेज़ों ने और समसामयिक कई इतिहासकारों ने किस तरीके से शिवलिंग के अर्थ को समझे बिना ही उसका उपहास भी कर दिया है। इन सब बातों की विस्तार से चर्चा की हुई है।






