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रुद्राक्ष की विशेष शक्तियाँ? || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो रुद्राक्ष होता है उसके बारे में जैसे बचपन में मैंने भी सुना था, घर में कहते थे कि रुद्राक्ष को मंदिर में रखते हैं तो उससे जीवन में एक सकारात्मकता आती है।

आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं!

देखो, भारत एक विशेष जगह रहा है। यहाँ पर हमने एक बात को समझा है कि हम पैदा यूँ ही जानवरों की तरह उछलने-कूदने, भोगने, खाने-पीने, संतानें पैदा करने और फिर मर जाने के लिए नहीं हुए हैं। भारत ने इस बात को समझा है, तो इसलिए भारत ने जी-तोड़ श्रम किया है और जान लगाकर के ऐसी व्यवस्था बनायी कि आपको पग-पग पर ये याद रहे कि आपको यहीं पर खपकर-पचकर मर नहीं जाना है, आपको मरने से पहले एक बहुत ज़रूरी काम है जो कर जाना है। तो हर छोटी-छोटी जगह पर प्रतीक लगाए गए; वो प्रतीक समझ लो।

वो आप नोट्स लगाते हो न कई बार, कौनसे नोट्स बोलते हैं उसको?

श्रोतागण: स्टिकी नोट्स।

आचार्य: स्टिकी नोट्स। तो आप स्टिकी नोट्स बार-बार क्यों लगाते हो?

श्रोतागण: याद रखने के लिए।

आचार्य: याद रखने के लिए न?

याद रखना ज़रूरी क्यों है? क्योंकि आप भूल जाते हो। वैसे ही ये जो इंसान पैदा हुआ है न, इसकी फ़ितरत है असली बात भूल जाने की और उन्हीं बातों को याद रखने की जो दिखाई पड़तीं हैं। जो असली बात है वो आँखों से दिखाई तो पड़ती नहीं, वो छुपी हुई है; कौन याद दिलाए? मुक्ति कोई चीज़ तो है नहीं कि दिखाई पड़ जाएगी!

(तौलिया उठाते हुए) ये मुक्ति है, ये तो नहीं दिखाई पड़ेगी। पर ये तौलिया दिखाई पड़ गया, और तौलिया फटा हुआ था। तो तुरंत मन इस बात में लग गया कि तौलिया फट गया है, नया तौलिया लाना है।

आँखों से जो चीज़ दिखती है वो तुरंत मन में हावी हो जाती है। और जो असली चीज़ है वो दिखाई नहीं पड़ती, तो वो मन में बिलकुल पीछे चली जाती है, वो मन के बिलकुल पकड़ में नहीं आती।

तो अब अगर असली चीज़ याद रखनी है तो क्या करना पड़ेगा? बहुत सारे स्टिकी नोट्स लगाने पड़ेंगे। ठीक है?

हिंदुस्तान ने इस तरह के हज़ारों स्टिकी नोट लगा दिए जगह-जगह पर, कि किसी को ये भूलने की अनुमति या सुविधा ही न रहे कि तुम क्यों पैदा हुए हो, तुम्हें लगातार ज़िंदगी का उद्देश्य याद रहे।

तो एक अब पहाड़ी फल ले लिया या बीज ले लिया और उसको नाम दे दिया कि ये रुद्र की आँख है। भारत नाम देने में बहुत सावधान रहा है और बहुत कलात्मक रहा है। कहते हैं न, कि नाम से ही तो बहुत फ़र्क पड़ जाता है? तो यहाँ बच्चों को भी जो नाम दिए जाते हैं वो ऐसे ही नहीं दे दिए जाते! बच्चों को भी जो नाम दिए जाते हैं वो इस हिसाब से दिए जाते हैं कि तुम नाम लो और कुछ पार का याद आ जाए। तो कहा, ‘जब अच्छे-अच्छे नाम देने ही हैं तो सिर्फ़ बच्चों को ही क्यों दें?’ तो फ़िर हर चीज़ को बहुत ऊँचे-ऊँचे नाम दिए गए।

समझ में आ रही है बात?

अब कमल का फूल है, उसका संबंध जोड़ दिया गया देवताओं के साथ, विष्णु के साथ जोड़ दिया संबंध। लो! आप कमल जब भी देखोगे तो किसकी याद आ जाएगी? विष्णु की याद आ जाएगी। तो इसी तरीके से रुद्राक्ष के साथ रुद्र का नाम जोड़ दिया गया, कि इसको आप जब भी देखो तो उनकी याद आ जाए। फिर वो (रुद्राक्ष) बड़ा ज़बरदस्त-सा होता है, आसानी से वो न टूटता है, न ख़राब होता है, ये उसमें गुण होता है; आप उसको अगर पहने रहो तो वो बहुत सालों तक चलता है। तो आप उसे पहन सकते हो एक रिमाइंडर (याद दिलाने वाला) की तरह। क्या? कि इस दुनिया में ही फँसकर नहीं रह जाना है। ये उसका महत्व है।

और इस तरह के महत्व हमने न जाने कितनी चीज़ों के साथ, कितने पशुओं के साथ, कितने पक्षियों के साथ, पेड़-पौधों के साथ, यहाँ तक कि घास के साथ भी जानबूझकर संबंधित किए। ये जो संबंध बनाया गया, ये न तो रूढ़ि की बात थी, न अंधविश्वास की बात थी; ये बहुत सोच-समझकर और तार्किक तरीके से संबंध बनाया गया। क्योंकि वो संबंध अगर नहीं बनाया जाएगा तो आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ जो इधर-उधर घचम-पचम चलता रहता है, यही याद रहेगा।

समझ रहे हो?

तो इसलिए उसको नाम ‘रुद्राक्ष’ दे दिया गया है। वो अकेला नहीं है, और भी बहुत सारे बीज हैं, फल हैं जिनको दैवीय नाम दिए गए हैं। इसका लेकिन ये मतलब नहीं है कि तुम स्टिकी नोट से ही चिपककर रह जाओ, इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि रुद्राक्ष में कोई विशेष शक्ति होती है; रुद्राक्ष में कोई शक्ति नहीं होती! रुद्राक्ष क्या है?

जैसे प्रकृति में इतनी चीज़ें पैदा होतीं हैं वैसे रुद्राक्ष भी पैदा होता है, कोई उसमें अपनेआप में विशेष शक्ति नहीं होती। लेकिन अगर रुद्राक्ष को देखकर के आपको शिवत्व की याद आ जाती है, तो रुद्राक्ष का काम सफ़ल हुआ।

आप सोचो कि जीवन में रुद्राक्ष लाने भर से कुछ बदल जाएगा, तो कुछ नहीं बदलेगा; शिवत्व असली चीज़ है। अब आप शिवत्व से दूर हो और रुद्राक्ष को पकड़े हुए हो, तो आप अपनेआप को ही धोखा दे रहे हो! और ये बहुत लोग करते हैं। तुम स्टिकी नोट अपने माथे पर चिपका लो, उससे तकदीर थोड़े-ही बदल जाएगी! या बदल जाएगी? तुम घर की दीवारों पर हर जगह लिख दो - टुडू-टुडू - अपना जो भी है, तो उससे हो थोड़ी जाएगा कुछ! तो रुद्राक्ष एक रिमाइंडर है, एक अलार्मबेल है! कुछ और भी हो सकता था वो (रिमाइंडर)। आप पीपल को, बरगद को, आप अनार को भी इस्तेमाल कर सकते हैं अपनेआप को कुछ याद दिलाने के लिए; और करना चाहिए।

संतों ने करा भी यही है, उन्होंने तो जो कुछ देखा उसी का प्रयोग कर लिया अपनेआप को जगत के सच की याद दिलाने के लिए। “चलती चक्की देखके, दिया कबीरा रोय।“ लो! ‘रुद्राक्ष नहीं था कोई बात नहीं, हमने चक्की को देखकर ही याद कर लिया कि गड़बड़ है मामला, इस दुनिया की सच्चाई हमने इस चक्की से ही पता कर ली।‘ अब उनके समय में चक्की थी। उनके समय में अगर मोबाइल फ़ोन होता तो उन्होंने मोबाइल फ़ोन पर भी ज़बरदस्त दोहे बोले होते, वो इसको भी देखकर न जाने कितना कुछ समझ जाते और कितनी दूर की बात कह जाते!

तो आपके पास जो कुछ भी है, उसका इस्तेमाल करिए पार निकलने के लिए; और आप करोगे क्या, आपका जन्म ही इसीलिए हुआ है!

जो भी दिख रहा है, जो भी पकड़ में आ रहा है, जो भी सहायता उपलब्ध है, जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उन सबका एक ही दिशा में इस्तेमाल करना है। और ये बिलकुल नहीं सोचना है कि जैसी आप ज़िंदगी चला रहे हो वैसी ही ज़िंदगी चलाने में कोई फल, कोई बीज, कोई रुद्राक्ष आपकी मदद कर देगा। नहीं!

शिवत्व का तो मतलब ही होता है विध्वंस! जो कुछ भी होना नहीं चाहिए उसको हटाने के प्रतीक हैं शिव। और सच्ची बात ये है कि हमारी ज़िंदगियों में ज़्यादातर वही है जो नहीं होना चाहिए। अब आपकी ज़िंदगी में जो कुछ है वो आप हटाना तो चाहते नहीं, और रुद्राक्ष पकड़कर बैठ गए हैं, तो कुछ नहीं मिलने वाला; जीवन में परिवर्तन लाना होगा।

रुद्राक्ष आपको अधिक-से-अधिक याद दिला सकता है कि परिवर्तन लाना ज़रूरी है और अभी बाक़ी है। वो परिवर्तन असली चीज़ है।

देखिए, सब धर्म का, अध्यात्म का उद्देश्य जो है वो कभी भूलना नहीं चाहिए। धर्म का, अध्यात्म का उद्देश्य है आपकी शांति, आपकी ख़ुशहाली और अंततः आपकी मुक्ति। जब तक आप जिएँ, आप शांत रहें, और मृत्यु से पहले ही मानसिक मुक्ति को प्राप्त हो जाएँ - ये अध्यात्म का उद्देश्य है। अध्यात्म है ही इसीलिए क्योंकि आदमी परेशान है, कष्ट में है, बिलखता रहता है, इसीलिए अध्यात्म की ज़रूरत है; अन्यथा अध्यात्म की कोई आवश्यकता नहीं! तो आप इधर-उधर की चीज़ों में अटक जाएँ, प्रतीक को ही असली बात मान लें, तो उससे कुछ मिलने नहीं वाला है।

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