हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ पर कोई तर्क हो ही नहीं सकता। हम वहाँ से शुरुआत करेंगे जहाँ कोई मान्यता हो नहीं सकती और कौन सी हैं वो जगह ‘मैं’। बिल्कुल हो सकता है कि ये दीवारे न हो, ये मेरी मान्यता हो, आँखों का धोखा हो, सब कुछ झूठ हो सकता है। लेकिन एक चीज तो है न, जो है और उसी की खातिर मैं बात कर रहा हूँ, मैं हूँ और मैं हूँ। मुझे मेरे होने का दुख नहीं पता चलता है। मैं दुखी हूँ। यहाँ से सारा अध्यात्म शुरू होता है। बाकी सब नकली हो सकता है। आपको सामने वाले से एक बात पूछनी है दुखी हो? और ‘हो’। दुखी हो। उसमें अस्तित्व भी आ गया तुम्हारा। अहम। हो, हो माने अस्तित्व है तुम्हारा। अहम और दुख है। हाँ यही है अध्यात्म सारा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: आज की बातचीत शुरू करने के लिए सबसे अच्छा तो यही होता कि हम आदिशंकराचार्य के निर्वाण षटकम् को गाने से शुरू करते, पर फिर मैंने कहा कि हम हर बार महाशिवरात्रि पर मिलते हैं और हर बार ही निर्वाण षटकम् का पाठ भी करते हैं। सरल संस्कृत है, वैसे तो समझ में आ जाती होगी। क्यों न वो करा जाए जो शंकराचार्य करते हैं निर्वाण षटकम् में। वो क्या करते हैं? जो कुछ सत नहीं है, जो कुछ भ्रम मात्र है, मान्यता मात्र है—उससे वो इनकार करते हैं, नकार करते हैं। वह शुरू ही इसी से करते हैं—
"मनो बुद्धि अहंकार चित्तान नाहम्, न च श्रोत्रं न च नेत्रं..."
सब कुछ काटते जाते हैं, सब कुछ काटते जाते हैं— मैं कौन हूं? मैं तो वही हूं जो शिव है। मैं वही हूं जो शिव है। शिव कौन है? यह जानना है, तो जान लो कि वास्तव में मैं कौन हूं— अपने भ्रमों और मान्यताओं से परे। इंद्रियां नहीं हूं मैं। अच्छा, तो बहुत! हमें असुविधा नहीं होती कह दिया जाए कि हां भाई, इंद्रियों का विषय नहीं, कान का विषय नहीं, नाक का विषय नहीं— "श्रोत्रं जिह्वा ग्राणं नेत्रं..." सब हटा दो। फिर वह आगे जाकर वेद, मंत्र, तीर्थ, यज्ञ— इनसे भी इनकार कर देते हैं। जिनको हम आमतौर पर बड़ी मान्यता दे देते हैं, हमारे चार पुरुषार्थ— धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष— इनको भी कह देते हैं निर्वाण षटकम् में ही कि "ये भी नहीं हूं।"




