
प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, मैं पंजाब से हूँ। मेरा सवाल लो सेल्फ़स्टीम, प्रोकास्टिनेशन (कम आत्मसम्मान, टालमटोल) पर्सनल-प्रोफेशनल फ़्रन्ट (व्यक्तिगत-व्यावसायिक अग्रता) पर है।
आचार्य जी, फ़्रॉम लास्ट सो मैनी ईयर्स, आई एम लिसनिंग टू सो मैनी स्प्रिचुअल गुरूज़ एण्ड इन्सपिरेशन वीडियोज़ आई एम सीइंग (अन्तिम बहुत से सालों से…

प्रश्नकर्ता: आपने जो बात बतायी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, तो अमृतबिन्दु उपनिषद् में तीसरे पेज पर ग्यारहवाँ श्लोक है, वहाँ पर बताया गया है कि ये तीनों अवस्था में आत्मा को एक ही जानो। पर मेरे अनुभव में जाग्रत अवस्था में कोई और होता हूँ, स्वप्न में — पता नहीं




प्रश्नकर्ता: मैं आज अमृतबिंदु उपनिषद पढ़ रहा था, जो आज भेजा गया था। उसमे लिखा है, “विषय-भोगों के संकल्प से रहित होने पर ही इस मन का विलय होता है। अतः मुक्ति की इच्छा रखने वाला साधक अपने मन को सदा ही विषयों से दूर रखे। इसके अनन्तर जब मन…

न निरोध है, न प्रवृति न मैं बद्ध हूँ, न साधक न मैं मुमुक्षु हूँ, न मुक्त


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपको करीब-करीब सात-आठ महीनों से सुन रहा हूँ। करीब आपके बीस-पच्चीस कोर्सेज़ भी किये। मेरे तीन बच्चे हैं। एक अट्ठाइस साल का बेटा है, एक बाईस साल की और एक अठारह साल की बेटीयाँ है। तो आपसे मिलने के पहले मैं बच्चे से ये कह रहा…
आचार्य प्रशांत: कोई भी सच्ची प्रार्थना सदा स्वयं से ही की जाती है। प्रार्थना अगर सच्ची है तो वह स्वयं से ही की जा रही है क्योंकि हमें बनाने या बिगाड़ने वाला है कौन? हम ही हैं न। कहते हैं उपनिषद कि तुमसे बड़ा तुम्हारा कोई मित्र नहीं और तुमसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न अमृतबिंदू उपनिषद् से है। सत्रह्वे श्लोक में ध्यान के विषय में बताया गया है। कृपया उसे स्पष्ट करें।
द्वे विधे वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परम् च यत्।
शब्दब्राह्मणि निष्णात: परम् ब्रह्माधिगच्छति।।
शब्दार्थ: दो विद्याएँ जानने योग्य हैं, प्रथम विद्या को ‘शब्द ब्रह्म' और दूसरी विद्या को…
~ अमृतबिन्दु उपनिषद
आचार्य प्रशांत: प्रवृत्ति का मतलब – लिप्त हो जाना। निरोध का मतलब – बंधन लगा देना। दोनों ही नहीं हैं। और मैं आपसे कह रहा हूँ, एक…
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।

आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा तू, जन्म लिया तो मरेगा। ये मृत्यु का नहीं, अमरता का गीत है। इसका मतलब है: अजन्मे रहो, अमर रहो। देह का ही तो कहते हो कि जन्म हुआ। तो अजन्मे रहने का अर्थ है: देह मत बनना, चेतना बनना, जानना। जानना, नहीं तो एक्शन-रिएक्शन के ही खेल में फँस जाओगे और फिर उसमें दुख आ जाता है ज़िंदगी में। तो दुख से बचने का गीत है ये। ये आशीर्वाद है; अजन्मे रहो, अमर रहो।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

हम जो लगातार चुनाव करते रहते हैं, वही हमारा बंधन है और चुनाव के इसी अधिकार में हमारी मुक्ति की कुंजी भी है। उपनिषद् हमें सही चुनाव करने का तरीका बताते हैं। ऋषियों का एक-एक शब्द बेचैन मन की शांति हेतु ही है। यही उपनिषदों का एकमात्र उद्देश्य है। जहाँ कहीं भी पाओ कि जो रास्ता तुम चुन रहे हो वह तुम्हें और अधिक आश्रित बना देगा — बचो। और अगर कोई ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर तुम्हारे बंधन टूटेंगे, तुम स्वावलंबी होते जाओगे — उस रास्ते पर आगे बढ़ जाओ।

जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!

मात्र विशिष्ट संगीत है, जो बंधनों को काटता है। अधिकांशतः संगीत उत्तेजक ही होता है, क्योंकि वो तुम्हें नए तरीक़े के अनुभव दे जाता है। जबकि शास्त्रीय संगीत अलग आयाम का होता है, इसीलिए वो बाज़ारू नहीं होता। संगीत का सबसे सुंदर और प्रभावी मेल होता है — शास्त्रीय संगीत पर संतों के वचन। इनके अलावा, बाकी सबकुछ जो संगीत के नाम पर चल रहा है, वो तुम्हारे आंतरिक कोलाहल को ही बढ़ाएगा।

जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।

वेदांत समझने के लिए ज़ोर लगाना पड़ता है, बुद्धि लगानी पड़ती है, जबकि आम आदमी को एक बिलीफ़ सिस्टम ज़्यादा आसान लगता है। फिर वेदांत को समझाने वाले लोग भी बहुत ज़्यादा नहीं हुए हैं। धर्म, जिसमें बढ़िया कुछ मनोरंजन और स्वार्थ-पूर्ति होती हो, लोगों को आकर्षक लगता है — वहाँ मूल्य नहीं चुकाना होता, जबकि वेदांत, अगर जो समझेगा, तो मिटेगा — और समझने वाला मिटने के लिए तैयार नहीं होता। इसलिए वेदांत इतना नहीं प्रचलित हो पाया।

जीवन को सँभालकर रखो तब तक, जब तक मुक्ति नहीं मिल जाती; लेकिन जीवन को सँभालने का उद्देश्य जीवन को लंबा ही करना कभी नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य जीवन की लंबाई नहीं है; जीवन का उद्देश्य जीवन से मुक्ति है।

मेडिटेशन "करा" नहीं, "जीया" जाता है। "करने" वाला मेडिटेशन तो झुनझुना है, कि गए और तीस मिनट मेडिटेशन करके आ गए। जो तुम्हारी ज़िंदगी चल रही है, उसी में देखो कि तुम्हारे संदर्भ तथा संबंध में ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य क्या हो सकता है। अपने बंधन पहचानो और देखो कि उनके कारण कितना दुख है। उसे मिटाना ही लक्ष्य बनेगा तुम्हारा। और फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरे जीवन को झोंक दो, यही ध्यान है।

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में रहना और वैसे ही अपनी ज़िंदगी बिताना अगर सही तरीका है, तो हम लोग अपने तरीके से, जितना भी हमलोगों को पता है उस हिसाब से या आपको जैसे सुनते हैं, तो कोशिश करते हैं। पर लगता है कि कुछ हो नहीं रहा या हमसे…

प्रश्नकर्ता: मैं एक सर्जन (शल्य चिकित्सक) हूँ। क्या ध्यान में होने से सर्जरी सफल हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में होने पर ही सर्जरी सफल हो सकती है। नहीं तो ध्यान का फ़ायदा क्या? ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के पास भटकने के लिए कोई ठिकाना,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं काफ़ी समय से मेडिटेशन (ध्यान) कर रही हूँ। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ समय के लिए टाइमलेसनेस (कालहीनता) का अनुभव होता है। मैं ऐसा क्या करूँ कि ये अनुभव पूरे दिन रहे?
आचार्य प्रशांत: अगर आपको पता न होता कि मेडिटेशन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुपचाप…

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

जीवन माने वृत्तियाँ और विकार, तो ऐसे जीवन से हटना है। माने किससे हटना है? वृत्तियों और विकारों से। तो मृत्यु का अर्थ ये नहीं होता कि कब तुम्हारी देह मिटेगी, जलेगी; मृत्यु का अर्थ होता है कि कब तुम्हारे जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटेंगे। यही ज़िन्दगी जीने का उचित तरीका भी है — प्रतिपल ऐसा बिताओ कि तुम्हारे भीतर जो मलिनताऍं हैं, जो दोष हों वो कम, कम और कम होते जाऍं। ये सब वही पुराना चक्र है, वो चले जा रहा है। हाँ, तुम जान गये कि ये पुराना चक्र है, तो ये अनुकम्पा है, ये बोध है।

बस ये देखिए कि क्या है जो चुभ रहा है। उसको हटाना ही जीवन का उद्देश्य है। सबसे पहले देखो कि अभी क्या है जो तुम्हें तंग कर रहा है? उसी से आज़ाद हो जाओ यही उद्देश्य है और कुछ नहीं।

जिसने ब्रह्म को जाना, अब वो ये नहीं कहेगा कि मुझे ब्रह्म की आरती उतारनी है। भक्त भगवान की आरती उतारेगा, भजन-कीर्तन करेगा, प्रार्थना करेगा, झुकेगा। ब्रह्मविद् कहीं नहीं झुकता, वो कहता है, ‘अब किसके चरण स्पर्श करूँ, दूसरा कोई है ही नहीं!’

आत्मा न अलग-अलग है, न एक-जैसी है। नहीं कहा जा रहा है कि वो अलग-अलग है, नहीं कहा जा रहा है कि वो एक-जैसी है; नहीं कहा जा रहा है वो एक भी है। क्योंकि अगर वो एक है तो आत्मा नहीं हो सकती; वो होगा कोई मानसिक विचार, होगी कोई धारणा। इतना ही समझ लीजिए कि हम सबका अलग-अलग प्रतीत होना भ्रम है; पर वहाँ तक मत जाइए कि हम सब एक हैं। न ही अलग हैं, और एक भी नहीं हैं।

करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अभी बैंक में जॉब कर रहा हूंँ, लगभग सात-आठ साल हो गये हैं। शुरुआत तो मैंने आजीविका के लिए करी थी; जैसे परिवार जो सोचता है कि आप पढ़ो और काम करो, उस हिसाब से।
लेकिन अभी, मतलब पिछले कुछ तीन से चार सालों में…

मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित…

होश का मतलब यही होता है — अपनी वर्तमान हालत के प्रति ईमानदारी। सब जानते हैं पर भीतर इतनी तामसिकता भरी हुई है कि कौन संघर्ष करे इस कैद, इस पिंजड़े, इस कसाई के ख़िलाफ़।मदद मिलती है, सहारे आते हैं, चमत्कार होते हैं थोड़ा भरोसा तो रखो। और नहीं होंगे चमत्कार तो अधिक–से–अधिक क्या होगा? मर ही तो जाओगे, मर तो वैसे भी रहे हैं। तो भविष्य की नहीं सोचनी है, वर्तमान के ख़िलाफ़ विद्रोह करना है। जो भविष्य की सोचते हैं, उनका वर्तमान वैसा ही चलता रहता है जैसा चल रहा है।

लाओ त्सु चीनी इतिहास में एक रहस्यमय व्यक्ति हैं, जो रहस्य और किंवदंतियों से घिरे हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि वह एक दार्शनिक, सलाहकार और शिक्षक थे और उनकी विरासत ज्ञान और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि में से एक है। उन्हें ताओवाद की दार्शनिक प्रणाली की स्थापना का श्रेय दिया…

🔥 "मेरा नाम 'आज़ाद' है, बाप का नाम 'स्वाधीनता' है और मेरा घर है 'जेल'” 🔥
भगत सिंह ने जब अपना घर छोड़ा, तो चिट्ठी के अंत में लिखा, "मेरी शादी की चिंता मत करना, मेरी दुल्हन आज़ादी है"।
एक ओर, जहाँ दुनिया को ये मुद्दा बड़ा गंभीर…

आचार्य प्रशांत: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है…

प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…

प्रश्नकर्ता: प्र: तो आचार्य जी, अंजन, अंजनों के घर्षन से निरंजन निकल रहा है, ऐसा कुछ हो रहा है?
आचार्य प्रशांत: निरंजन क्या है कि जो निकलेगा?
प्र: या फिर मतलब उसमें...
आचार्य प्रशांत: निरंजन कुछ है कि जो निकलेगा?
प्र: यहाँ पर आप इतनी देर से एक्सप्लेन (समझा) कर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपको लगभग एक साल से सुन रहा हूँ। आपकी अनेक बातों में जो मूल एक सिद्धांत मुझे दिखता है वो ये है कि जीवन को वैज्ञानिक रूप से जियें, तथ्यों को देखें, और तथ्य ही सत्य का द्वार है।
अभी हाल-फ़िलहाल में हिन्दूओं और मुस्लिमों के…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। सर, दुनिया में दो तरह के सिद्धांत चलते हैं — एक ये कि जवान लोग कहते हैं कि खाओ-पियो बिंदास जियो, और दूसरी ये कि बुज़ुर्ग या दार्शनिक लोग कहते हैं कि जीवन क्या है इसको समझो, अपना पुरुषार्थ दिखाओ, अपनेआप को जानो, इस तरह की बातें।…

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त…