प्रश्नकर्ता: आपने जो बात बतायी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, तो अमृतबिन्दु उपनिषद् में तीसरे पेज पर ग्यारहवाँ श्लोक है, वहाँ पर बताया गया है कि ये तीनों अवस्था में आत्मा को एक ही जानो। पर मेरे अनुभव में जाग्रत अवस्था में कोई और होता हूँ, स्वप्न में — पता नहीं कुछ — कोई और होता हूँ और गहरी नींद में तो होता ही नहीं। तो फिर आत्मा को कैसे जानें कि तीनों में एक है?
आचार्य प्रशांत: जिसको तुम अलग-अलग देख रहे हो तीनों अवस्थाओं में वो आत्मा थोड़े ही है। आत्मा को कौन देख सकता है? तीनों अवस्थाओं में कौन बदल जाता है? वही जो बदल सकता है, अहम्।
ये तीन अवस्थाएँ चेतना की हैं न! चेतना की प्यास का नाम है आत्मा। चेतना के आधार का नाम है आत्मा। लेकिन चेतना के केन्द्र का नाम है अहम्। वो केन्द्र झूठा है तभी तो चेतना प्यासी है। हमारी चेतना के केन्द्र पर कौन बैठा है? तभी तो चेतना प्यासी है न! तभी तो हर आदमी तड़प रहा है आन्तरिक रूप से।
यही अहम् जगते समय कुछ और होता है, सोते समय कुछ और होता है और सुषुप्ति में कुछ और हो जाता है। और जगते समय भी वो अहम् किसी एक अवस्था में नहीं रहता। तुम जाग्रत हो अभी, अभी तुम श्रोता बनकर बैठे हो, जिज्ञासु बनकर बैठे हो, शिष्य बनकर बैठे हो। थोड़ी देर पहले तुम खाना खा रहे थे न? तब तुम क्या थे? तब तुम भोग कर रहे थे, भोक्ता थे, अहम् दूसरा था तब। अभी तुम वो नहीं हो जो तुम आधे घंटे पहले थे। उससे आधे घंटे पहले जो तुम थे वो तुम अभी नहीं हो।
ये तो मैं आधे-आधे घंटे का अन्तराल ले रहा हूँ। जिन्होंने जाना है उन्होंने कहा है कि अहम् तो पल-पल बदल रहा है; आधा घंटा तो बहुत दूर की बात है। तो जाग्रत अवस्था में भी अहम् लगातार बदल रहा है। अहम् लगातार बदल रहा है माने क्या? अहम् का विषय लगातार बदल रहा है। अहम् बेचारा तो खोखला होता है, उसकी अपनी तो कोई सत्ता ही नहीं होती है। उसको तो जानने वालों ने कहा है, ‘झूठ है, मिथ्या है।’







