
Questioner (Q): What’s the difference between conspiracy and belief?
Acharya Prashant (AP): A conspiracy is a belief that you are quite clever. A belief is a conspiracy that is not known as a conspiracy.
A conspiracy is a belief that you are quite clever. A belief is a conspiracy that…


प्रश्नकर्ता: आपने जो बात बतायी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में, तो अमृतबिन्दु उपनिषद् में तीसरे पेज पर ग्यारहवाँ श्लोक है, वहाँ पर बताया गया है कि ये तीनों अवस्था में आत्मा को एक ही जानो। पर मेरे अनुभव में जाग्रत अवस्था में कोई और होता हूँ, स्वप्न में — पता नहीं



प्रश्नकर्ता: मैं आज अमृतबिंदु उपनिषद पढ़ रहा था, जो आज भेजा गया था। उसमे लिखा है, “विषय-भोगों के संकल्प से रहित होने पर ही इस मन का विलय होता है। अतः मुक्ति की इच्छा रखने वाला साधक अपने मन को सदा ही विषयों से दूर रखे। इसके अनन्तर जब मन…


आचार्य जी, फ़्रॉम लास्ट सो मैनी ईयर्स, आई एम लिसनिंग टू सो मैनी स्प्रिचुअल गुरूज़ एण्ड इन्सपिरेशन वीडियोज़ आई एम सीइंग (अन्तिम बहुत से सालों से…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपको करीब-करीब सात-आठ महीनों से सुन रहा हूँ। करीब आपके बीस-पच्चीस कोर्सेज़ भी किये। मेरे तीन बच्चे हैं। एक अट्ठाइस साल का बेटा है, एक बाईस साल की और एक अठारह साल की बेटीयाँ है। तो आपसे मिलने के पहले मैं बच्चे से ये कह रहा…
आचार्य प्रशांत: कोई भी सच्ची प्रार्थना सदा स्वयं से ही की जाती है। प्रार्थना अगर सच्ची है तो वह स्वयं से ही की जा रही है क्योंकि हमें बनाने या बिगाड़ने वाला है कौन? हम ही हैं न। कहते हैं उपनिषद कि तुमसे बड़ा तुम्हारा कोई मित्र नहीं और तुमसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न अमृतबिंदू उपनिषद् से है। सत्रह्वे श्लोक में ध्यान के विषय में बताया गया है। कृपया उसे स्पष्ट करें।
द्वे विधे वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परम् च यत्।
शब्दब्राह्मणि निष्णात: परम् ब्रह्माधिगच्छति।।
शब्दार्थ: दो विद्याएँ जानने योग्य हैं, प्रथम विद्या को ‘शब्द ब्रह्म' और दूसरी विद्या को…
~ अमृतबिन्दु उपनिषद
आचार्य प्रशांत: प्रवृत्ति का मतलब – लिप्त हो जाना। निरोध का मतलब – बंधन लगा देना। दोनों ही नहीं हैं। और मैं आपसे कह रहा हूँ, एक…
This is a trick question!
Whether you are “meditating” one hour per day or six, you are not truly meditating. This is because meditation is not something you do to escape life. Meditation is a way of life.
Meditation is to…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: विधियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सत्य को तो पाना है और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है ख़ुद को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…

आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको…

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

द सॉन्ग ऑफ द टवेल्व डिसेप्शंस। वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव; सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।
"संसार के सभी क्रियाकलाप तो मायारूपी हैं, अतः मैं सत्य की शरण में जाता हूँ।"
आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहीं से होती है—जो तुमने कहा न मैं जानवर हूँ—ये जानने से। शुरुआत वहीं…

Acharya Prashant (AP) All the diversities that you see are the world. And these diversities are what make the mind suffer and here the sages have picked up all the diversities and have said that all these diversities are actually one. The distinctions are merely apparent. Actually, there is an…

भाषा हमें बहुत सारे देती है नाम। और ये जो सारे नाम हैं, ये हमें भरोसा दिला देते हैं कि अपूर्ण अहंकार, पूर्ण हो सकता है। ‘इस नाम से बात नहीं बनी तो उस नाम से बात बनेगी; तो उस नाम से बात बनेगी, तो उस नाम से बात बनेगी।…

n some sense, spirituality is all about unleashing yourself, which is freedom from bondage. The leash is the bondage. Read more....

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमारे सामने जब कोई परिस्थिति आती है तो हम उसके तथ्य को देखने के बजाय, उसे उसके अतीत से जोड़कर देखते हैं। इसका कारण क्या है? जैसे कि कभी हम कोई लड़ाई हार जाते हैं तो आगे की लड़ाइयों में संशय और…

प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम। अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो समझ में तो आ रहा है कि कंडिशनिंग (संस्कारों) से अहम् का निर्माण है, अगर इसको, कुछ-कुछ हल्की सी झलक भी आने लगी है कि मानसिक स्तर पर नहीं हूँ।
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…

प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

आचार्य प्रशांत: प्रकाश से आशय होता है — वस्तुओं का संज्ञान। प्रकाश न हो तो ऑंखें किसी भी वस्तु का संज्ञान नहीं ले सकतीं; और जब प्रकाश होता है तो प्रकाश स्वयं नहीं देखा जाता, प्रकाश में वस्तु देखी जाती है। तो जैसे हम हैं, हमारे लिए वस्तु तभी है…

प्रश्नकर्ता: विशुद्ध चक्र की साधना करता था और एक दिन ऐसा लगा जैसे पार जा ही रहा हूँ, पर मन ने डराकर वापस कर दिया। फिर हिम्मत बाँधकर कोशिश की लेकिन वो मौक़ा दोबारा नहीं मिला। फिर शादी हुई और बाद में कोई दुर्घटना भी हुई जिसकी वजह से घुटने…

Questioner: Why think so much about decisions? Shouldn’t our decisions be spontaneous? I like to decide in a free flow.
Acharya Prashant: So the questioner is stressing on the spontaneity of decisions. He says that he likes to decide in a flow. It's a good thing, your intention is good.…

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं…

प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जीवन में क्या लक्ष्य बनाने योग्य है? क्या है जो मन, शरीर दोनों को सुकून दे सकता है?
आचार्य प्रशांत: वह तो आप पर निर्भर करता है न। अगर बिलकुल खरी बात पूछेंगे तो जीवन को किसी लक्ष्य कि ज़रूरत ही नहीं है। पर वह इतनी…

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ ख़ास दिन जैसे नवदुर्गा के नौ दिनों में सब द सेक्रेड फेमिनिन (पवित्र स्त्रीत्व) वगैरह की बहुत बातें करते हैं। हर जगह स्त्री शक्ति का ही ज़ोर रहता है। पंडालों में भी देवी और अखबारों में भी नारी का, स्त्री का महिमामंडन रहता है और तब…

प्रश्नकर्ता: सुबह ध्यान करने के लिए जाते हैं पहाड़ी पर, अच्छा रहता है, सुबह ध्यान होता है। शाम को भी जाते हैं। फिर बीच में ऑफिस से आने के बाद, दोपहर में एक घंटा घर पर बैठे तो उस तरह का नहीं हो पाता।
आचार्य: तुम कह रहे हो कि…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने देखा पिछले कुछ सालों में, तो मैं थोड़ा सा रिलेशनशिप को लेकर थोड़ा ब्लंटली (दो टूक) अपनी चीज़ें शेयर करना किसी भी टॉपिक को लेकर डिस्कशन हो रहा है। तो रिलेटिव्स भी मुझसे कतराने लगे फिर बात करने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…

प्रश्नकर्ता: जो वासनाओं का दमन करने की पहले जो कोशिश होती थी, तो उसमें केवल यह होता था कि नियमों का अनुसरण करने के लिए हुआ करता था। उस पर आवरण गिराएँ ताकि दिखाई न दे लोगों को। जब यह बोध हुआ, जब बुद्धि को यह समझ आया कि वासनाओं…

Questioner: You have said that individual liberation is not possible: that either we go together, or nobody can go. So, we have to help others to cross over. But I can’t help even the people close to me; they are caught up in routine work or indulge in entertainment; no…

Questioner: Earlier you said that there has been no inward evolution, nothing has changed inwardly, so we are essentially the same people who were roaming the jungles once. But still, somewhere in the course of evolution, we did become this human species with a higher capacity of consciousness compared to…

करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जब कोई कामना बहुत हावी हो जाती है तो उससे मिलने वाले तात्कालिक सुख के अलावा कुछ नहीं दिखता। लेकिन उस कामना को पूरी करने के बाद ग्लानि अनुभव होती है। जब चुनाव करना होता है, तब छोटे सुख की तरफ़ खिंच जाते हैं। उस…

Acharya Prashant: Observing the daily ordinary actions of the mind, that is the only way. Observing it as an impartial observer. There is no other method that is going to work because all other methods are ‘isolations.’ The method does something to life. The method excludes life; the method…

Acharya Prashant: You have to ask yourself what your primary identity is. If your primary identity is that of the body, then do what the body commands you to do. Good. The body has an inbuilt software of its own, and it’s a self-improving software. Its capacity to keep improving…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…

आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी, मेरा प्रश्न हैप्पीनेस (खुशी) के बारे में है कि व्हाट एग्ज़ेक्टली हैप्पीनेस इज़? (खुशी वास्तव में क्या है?) और हमें खुशी चहिए क्यों होती है। जैसे कि बचपन से ही जब हम किसी के पैर छूते हैं अपने से बड़ों का, तो सभी लोग बोलते हैं, "खुश…