
आमतौर पर हम जिस अर्थ में ‘मौन’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वह बहुत सतही होता है। हम केवल ना बोलने को मौन समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में मौन तब होता है जब मन की खटपट मिट जाए और मन पूरी तरह शांत हो जाए। हमारे होंठ भी इसी कारण अधिक चलते हैं, क्योंकि मन अशांत होता है। जब तक मन अशांत है, तब तक आप मौन होकर भी मौन नहीं होते। और जब मन शांत हो जाता है, तब होंठ चलें या न चलें, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।

आचार्य प्रशांत: सारा जगत किसके द्वारा व्याप्त है ऋषिवर? ऋषिवर ने कह दिया, ‘ब्रह्म के द्वारा’, ब्रह्म के द्वारा। छोटे उत्तर चाहिए तो हम तुम्हें बता सकते हैं कि भई, ये जो सब ग्रह-उपग्रह हैं, ये एक-दूसरे को पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण से बाँधे हुए हैं, हम बता सकते हैं। हम बता

आचार्य प्रशांत: आपके और इस आश्रम के बारे में, आपके और संसार के बारे में, आपके और मेरे बारे में, कुछ बातें समझ लेना ज़रूरी है। आप किसी बाहरी जगह पर नहीं आये हैं, लगता ऐसा ही है। पर इंसान की आँखों का कुछ खास भरोसा किया जा नहीं सकता।



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! जब डेढ़ साल पहले किताबें पढ़नी शुरू की थी तो पढ़ने में बहुत मज़ा आता था, लगता था रोज़ कुछ नया जानने को मिल रहा है। लेकिन अब न पढ़ने का मन करता है, न ही यूट्यूब पर सुनने का। मन को लगता है कि शब्द के






प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने आपका एक वीडियो देखा था जिसमें मौन साधना के बारे में कुछ सुना था, पर ज़्यादा समझा नहीं। तो क्या उसमें प्रार्थनाएँ और जो भी हम धन्यवाद देते हैं किसी को, वो नहीं होता है क्या? अगर मौन साधना का अभ्यास करना हो तो?



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पिछले एक महीने से मैं अष्टावक्र गीता पढ़ रहा हूँ। तो मैंने अपने जीवन में भी देखा, शांति के रास्ते में शरीर और मन बीच-बीच में बाधा बनते हैं। तो इसी विषय पर जब मैंने अष्टावक्र गीता देखा; उसमें दो श्लोक मिले जो इससे रिलेवेंट थे,

प्रश्न: आचार्य जी, आप कहते हैं कि शांत रहो, मौज में रहो। जब मैं देखता हूँ कि आसपास ग़लत हो रहा है और मुझे सही करने के लिए लड़ना भी पड़ेगा, तो वहाँ क्या मुझे लड़ाई लड़नी चाहिए, या सबकुछ परिस्थितियों के हाल पर छोड़ देना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: सिर्फ एक ध्यानस्थ आदमी ही प्रेम जान सकता है। वही स्रोत है, वहाँ से ही सब कुछ निकलता है। ये जो लाल खड़े मैदान हैं न, मैदान में बड़ी लड़ाईयाँ होती हैं। लड़ाई में वही खड़ा रह सकता है, जो अंदर से शांत हो।

आचार्य प्रशांत: उत्सव (सेलीब्रेशन) का मतलब ही होता है कि भीतर का ग़ुबार हट जाए, साफ़ हो जाए। शरीर की मैल नहाते वक़्त ही तो पता चलती है ना? ऐसे पता चलती है? जब नहाने जाते हो तभी पता चलता है ना, अच्छा, कुछ है। उत्सव अपने…


वक्ता: जो कुछ भी ज़िंदगी में कीमती है, इज्ज़त के लायक है, उसको अगर तुम कीमत देते हो, आदर देते हो तो उसका तुम कोई बहुत भला नहीं कर देते, उसका कोई हित नहीं हो जाता| क्योंकि वो ऊँचा है तभी तो कीमती है और जो पहले से ही ऊँचा

आचार्य प्रशांत: आँखें जो होती हैं शरीर में, ये बड़ी आक्रामक होती हैं। ये भेदती हैं; टांग किधर को बढ़े उससे पहले आँख वहाँ जासूसी करके आई होती है। देखते हो न, आँख जिधर देखती है, कदम उधर को बढ़ते हैं?

वक्ता: सवाल यह है कि अपने आप को एकांत में वियुक्त कैसे रखें कि हम शान्ति और खामोशी महसूस कर सकें?
अधिकांश समय जब हम अकेले होते हैं तो हम वास्तव में अकेले नहीं होते। मन तो हमेशा किसी के संग में ही रहता है, मन को तो कोई दूसरा…

आजा का घर अमर है, बेटा के सिर भार

प्रश्न: सर, अंतर्मुखी और शांत – दो शब्द होते हैं। इन दोनों शब्दों में क्या अंतर है और क्या समानता है?
वक्ता: अंतर्मुखी होने में और शांत होने में क्या सम्बन्ध है। बेटा, अंतर्मुखी, बहिर्मुखी – ये कुछ नहीं होता। ये हमने बस यूँ ही एक विभाजन बना दिया है।…


प्रश्न: ‘असंबद्ध’ होने का भाव महसूस होने लगा है। चाहे वो किसी जगह से हो, लोगों से हो, या अपने ही मन के भावों से हो। खोया-खोया सा महसूस करती हूँ। कहीं भी अपनेपन का भाव नहीं महसूस नहीं होता। अपने आप को कहीं से, या किसी भी चीज़ से…

मुमुक्षोर्बुद्धिरालंब-मन्तरेण न विद्यते। निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥


प्रश्न: सर आनंद नहीं मिल पा रहा है। आनंद कैसे पाएँ?


श्रोता: सर, एक बार आपने बात की थी, मन के तीन तलों की। मन की जो शरुआत होती है, वो है, ऊपर जो भी चलता है, थोडा-थोडा। उसके नीचे आपकी वृत्तियां आती हैं, और उसके नीचे वो शांत, मौन मन, जो स्थिर होता है, वो है। जब से मैं अपनी


प्रश्न- सर, मेरी समस्या ये है कि मैं बहुत बोलता नहीं। मुझे अकेले रहना पसंद है।

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?












आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।




प्रश्नकर्ता: समटाइम्स व्हेन देयर इज़ डीप इन्वॉल्वमेंट विथ रीडिंग, आई फ़ॉरगेट द सराउंडिंग्स। ऑनली द बुक रिमेंस। इज़ दैट इन्वॉल्वमेंट इन एस्केप फ़्रॉम व्हॉट इज़ हैपनिंग अराउंड और रियली बीइंग विथ ऑनसेल्फ़? (कभी-कभी जब पढ़ने से गहरा जुड़ाव होता है तो मैं अपने आस-पास का माहौल भूल जाता हूँ। केवल…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! कल के सेशन में आप एक बहुत ही एलिवेटेड स्टेट में लेकर गए, बहुत ट्रैंकफुल स्टेट(शान्ति की स्थिति) में लेकर गए। अब सवाल ये है कि वो स्टेट, वो मनोस्थिति को बरकरार कैसे रखें? डे टू डे ट्रिगर्स के बीच में वही पीसफ़ुलनेस कैसे मेंटेन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दीक्षा में पढ़ते हुए जो पहला श्लोक था, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,” तो इसमें पूर्ण का क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: जिसकी तुम्हें तलाश है।
प्र: पूर्ण किससे पूर्ण है?
आचार्य: पूर्ण किसी से पूर्ण नहीं होता। पूर्ण मात्र पूर्ण होता है।
प्र: क्या उसमें संसार…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ‘नाम’ के बारे में समझाइए, क्योंकि कबीर साहब बोलते हैं सद्गुरु नाम है। और कोई बोलते हैं कि सोऽहं ये नाम है, कोई बोलते हैं कि सुनने वाला जो नाद है वही नाम है। तो कृपा करके नाम के महत्व को समझाइए और बताइए कि नाम क्या…
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥ भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥ सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥ किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥ हुकमि रजाई चलणा नानक…
सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ ।। सुणिऐ धरति धवल आकास ।। सुणिऐ दीप लोअ पाताल ।। सुणिऐ पोहि न सकै कालु ।। नानक भगता सदा विगासु ।। सुणिऐ दूख पाप का नासु ।।८।।
सुणिऐ ईसरु बरमा इंदु ।। सुणिऐ मुखि सालाहण मंदु ।। सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद ।। सुणिऐ…
आचार्य प्रशांत:…
प्रश्नकर्ता: रूह और आत्मा में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: आत्मा परम सत्य है, अचल है; न जन्म लेती है, न मरती है, न आती है, न जाती है; न उसके बारे में कुछ सोचा जा सकता है, न कहा जा सकता है। रूह जिसको आप कहते हैं वो आदमी…
सभ महि जोति जोति है सोइ
सब में प्रकाश है
~ सोहिला (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: कल दोपहर जब हम लौट रहे थे कॉलेज से तो गाड़ी में कृष्ण कुछ बातें कह रहे थे, फिर मैंने सी.डी. प्लेयर बन्द कर दिया। जब तक वो जो कह रहे थे, वो चल रहा…
आचार्य प्रशांत जी:…
बाहर की गहरी अशांति…
आचार्य प्रशांत: कुछ अनजाना-अनजाना सा, कुछ नया-नया सा लग रहा है?
शान्ति और सुविधा में ये अंतर होता है।
शान्ति के साथ जैसे चुनौती जुड़ी होती है। सुविधा के साथ सब कुछ ज्ञात होता है। शान्ति नयी होती है बहुत, जैसे ये शाम नयी है। शामें बहुत आती हैं, जैसी…
आँख का काम ही है आक्रमण करना, सेंध लगाना…
वक्ता: आजा से आशय है—मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो ही कबीर का बिंदु भी है। बेटा मतलब? जिसकी उत्पत्ति उस मूल होती हो। बेटा है…
प्रश्न: हमारा मन शांत कैसे होगा?
वक्ता: अशांति कहाँ से पाई? पूछ रहे हो कि “हमारा मन शांत कैसे होगा?” ये बताओ कि अशांति कहाँ से पाई?
श्रोता १: वातावरण से।
वक्ता: हाँ, तो ये पक्का है न कि “पाई”?
श्रोता १: जी सर।
वक्ता: ऐसा तो नहीं है कि…
The mind of the man seeking liberation can find no resting place within.
But the mind of the liberated man is always free from desire by the very fact of being without a resting place.
(Ashtavakra Gita Chapter 18,…
श्रोता: सर, आपने एक बार कहा था कि “सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना”। इसका क्या मतलब है?
वक्ता: अभी का ही उदाहरण ले लो। पूछ रहे हो कि ‘सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना’, ये आपने क्यों कहा था? तो अभी का…
श्रोता १: अगर कोई काम ज़बरदस्ती करना पड़े, तो आनंद की कमी…
प्रश्नकर्ता: उपनिषद् के शुरू होने से पहले शांति-पाठ क्यों पढ़ाया जाता है?
आचार्य प्रशांत: ऐसा इसलिए क्योंकि तुममें और उपनिषदों में ज़मीन-आसमान का फासला है। जो ज़मीन पर रेंग रहा हो, जब उससे आसमान की बातें करो, तो उसे कुछ समझ नहीं आता। जो बिलकुल ठंडा पड़ा हो, उसको अगर…
वक्ता: ये जो हो रहा है, ये जो बात कही जा रही है इसको पा कैसे सकते हैं? मैं फिर वापस जाऊँगा कि ये पाने की चीज़े नहीं हैं क्योंकि ये तुम्हें उपलब्ध ही हैं।तुम्हारी भाषा विपरीत हो गयी है।
आज तक की शिक्षा ने तुम्हारी पूरी भाषा को पलट…
प्रश्न- सर, लेकिन इसी वजह से लोग…
सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।
समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।
तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।