प्रश्न: सर, अंतर्मुखी और शांत – दो शब्द होते हैं। इन दोनों शब्दों में क्या अंतर है और क्या समानता है?
वक्ता: अंतर्मुखी होने में और शांत होने में क्या सम्बन्ध है। बेटा, अंतर्मुखी, बहिर्मुखी – ये कुछ नहीं होता। ये हमने बस यूँ ही एक विभाजन बना दिया है। हम कहते हैं कि जो थोड़ा बातूनी है वो एक्सट्रोवर्ट है – बहिर्मुखी। और जो थोडा लजाता है, सकुचाता है, वो इनट्रोवर्ट है – अंतर्मुखी। ये सब कुछ नहीं है।
ये तो दोनों मन की अवस्थाएं हैं। एक के मन को संस्कार ऐसे मिले हैं, वृत्तियाँ ऐसी हैं कि वो चक-चक, चक-चक करता रहता है। कुछ नहीं है! संस्कार हैं, कंडीशनिंग है। और दूसरे के मन को कुछ ऐसे अनुभव मिले हैं, कुछ ऐसे संस्कार मिले हैं कि वो अपने में सिमट कर रह गया। अपने ही विचारों में, अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। इन दोनों ही स्थितियों में कोई श्रेष्ठतर नहीं है। तुम ये नहीं कह सकते कि एक, दूसरे से बेहतर है, क्योंकि दोनों ही मन के खेल हैं। एक खेल दूसरे खेल से बेहतर नहीं होता।
शांत होने का मतलब है- ना अंतर्मुखी ना बहिर्मुखी। ना बाहर का खेल चला रखा है, ना भीतर का खेल चला रखा है। हम खेल से आज़ाद हैं। अंतर्मुखी व्यक्ति अन्दर वाले से बात करता है; बहिर्मुखी व्यक्ति बाहर वाले से बात करता है। लेकिन जो शांत है, वो ना अंतर्मुखी है ना बहिर्मुखी है – वो मौन है।




