विज्ञान का काम विज्ञान ही करेगा, अध्यात्म नहीं || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: सारा जगत किसके द्वारा व्याप्त है ऋषिवर? ऋषिवर ने कह दिया, ‘ब्रह्म के द्वारा’, ब्रह्म के द्वारा। छोटे उत्तर चाहिए तो हम तुम्हें बता सकते हैं कि भई, ये जो सब ग्रह-उपग्रह हैं, ये एक-दूसरे को पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण से बाँधे हुए हैं, हम बता सकते हैं। हम बता सकते हैं कि कितने तरीके के फिजिकल फोर्सेज़ (भौतिक बल) होते हैं, जिनके द्वारा, जो भी पदार्थ है दुनिया में, वो संचालित होता है। ज्यादा नहीं पाँच-सात तरीके के फोर्सेज़ (बल) होते हैं दुनिया में। और आप एक-दूसरे को समझा सकते हो, ‘अच्छा, ये होता है वो होता है’, पर उसमें कहीं भी अन्त नहीं आने वाला।
फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) भी इस समय उस जगह पर जाकर के खड़ी हो गयी है जहाँ पर क्या है, क्यों है, ये प्रश्न तभी हल होंगे, जब पहले पूछा जाए- किसके लिए है? किसके लिए है? तो जो वैज्ञानिक दृष्टि से भी चिंतन करते ही रहे, अब उनके सामने भी ये मजबूरी आ गयी है कि चेतना के सवाल का जवाब दें। फोॉर हूम इज़ दिस फिफ़िज़िकल फिनोमिना? (ये भौतिक घटना किसके लिए है?) हू इज़ द ऑब्ज़र्वर? (ये भौतिक घटना किसके लिए है? (दृद्रष्टा कौन है?)
और ये मैं अध्यात्म या साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) की किसी समस्या का आपको नहीं बता रहा हूँ। ये मैं फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) की आपको समस्या का बता रहा हूँं। फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) के सामने आज ये सवाल खड़ा है- हू इज़ द ऑब्ज़र्वर? (प्रेक्षक/दृ्रष्टा कौन है?) हाउ आर द ऑब्ज़र्वर एंड द ऑब्जर्व्ड फिनोमिना रिलेटेड टू इच अदर? (प्रेक्षक/दृ्रष्टा कौन है? प्रेक्षक और प्रेक्षित घटनाएँ एक दूसरे से किस प्रकार सम्बन्धित हैं?)
और ये कुछ और नहीं है, ये तो सीधे-सीधे यही बात पूछी जा रही है कि, चेतना क्या है।? समझ में आ रही है बात? और इसमें भी बहुत आगे आप बढ़ नहीं सकते। थोड़ा और आगे जाओगे तो अधिक- से- अधिक यही कह लोगे कि- जो दिख रहा है, जो देख रहा है, उनमें अन्तर्सम्बन्ध है।

