प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने आपका एक वीडियो देखा था जिसमें मौन साधना के बारे में कुछ सुना था, पर ज़्यादा समझा नहीं। तो क्या उसमें प्रार्थनाएँ और जो भी हम धन्यवाद देते हैं किसी को, वो नहीं होता है क्या? अगर मौन साधना का अभ्यास करना हो तो?
आचार्य प्रशांत: मौन साधना क्या है? है क्या मौन साधना? (प्रश्नकर्ता कोई उत्तर नहीं देतीं)
मौन रहना (व्यंग्य करते हुए)? किसको कहते हो मौन साधना? (प्रश्नकर्ता पुनः कोई उत्तर नहीं देतीं)
तो फिर ये पूछो न, मौन साधना है क्या? आगे की बात क्यों पूछ रहे हो कि उसमें प्रार्थना और ये और वो? ये ऐसी सी बात है कि तुम पूछो कि एक जगह है 'टमाटू', वहाँ लौकी-बैंगन मिलता है कि नहीं मिलता। मैं पूछूँ, 'टमाटू' है क्या? किस दिशा है? कौन देश है? तुम कहो, वो सब नहीं पता। मौन साधना माने क्या?
माने मैं समाधान न दिया करूँ, सवाल भी मैं ही दिया करूँ (व्यंग कसते हैं)! तो पहले मैं सवाल बताऊँ, और फिर मैं उसका जवाब बताऊँ? मन बातूनी होता है। कैसा होता है? बक-बक-बक-बक, वाचाल। बोलना मन के लिए ज़रूरी है, क्योंकि बोलने का अर्थ ही है — कोई दूसरा। कोई है जिससे बात करनी है, तो बोलना ज़रूरी है मन के लिए। आत्मा मौन होती है।
मौन साधना का अर्थ होता है — मन को बोलने दो, तन को बोलने दो, तुम आत्मा में स्थापित रहो। ठीक है?




