आमतौर पर हम जिस अर्थ में ‘मौन’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वह बहुत सतही होता है। हम केवल ना बोलने को मौन समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में मौन तब होता है जब मन की खटपट मिट जाए और मन पूरी तरह शांत हो जाए। हमारे होंठ भी इसी कारण अधिक चलते हैं, क्योंकि मन अशांत होता है। जब तक मन अशांत है, तब तक आप मौन होकर भी मौन नहीं होते। और जब मन शांत हो जाता है, तब होंठ चलें या न चलें, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: तो सवाल आया है कि साइलेंस क्या है? साइलेंस को मौन या शून्य, जो भी कहो, समझने की जरूरत है। आमतौर पर हम जिस अर्थ में ‘मौन’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वो बड़ा ही सतही अर्थ है। होंठ ना चल रहे हों, तो हम कह देते हैं कि मौन है। ये बड़ी ही छोटी बात हुई। ये बड़ा सीमित अर्थ हुआ।
कबीर ने कहा है:
कबीरा यह गत अटपटी, चटपट लखि न जाए।
जब मन की खटपट मिटे, अधर भया ठहराय।
अधर मतलब होंठ। होंठ वास्तव में तभी ठहरेंगें, तभी शांत होंगे, जब मन की खटपट मिट जाएगी। हमारे होंठ भी ज्यादा इसीलिए चलते हैं क्योंकि मन अशांत है, और जब तक मन अशांत है तब तक होंठ चलें या न चलें, कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि मूल बात तो मन की अशांति है। वो बनी हुई हैl



