प्रश्न: हमारा मन शांत कैसे होगा?
वक्ता: अशांति कहाँ से पाई? पूछ रहे हो कि “हमारा मन शांत कैसे होगा?” ये बताओ कि अशांति कहाँ से पाई?
श्रोता १: वातावरण से।
वक्ता: हाँ, तो ये पक्का है न कि “पाई”?
श्रोता १: जी सर।
वक्ता: ऐसा तो नहीं है कि स्वाभाव है तुम्हारा? कहीं से पाई, इकट्ठा करी। जिन बातों को ले कर अशांत हो, उन बातों को ले कर पैदा तो नहीं हुए थे? या पैदा होते ही चिल्लाए थे कि “नौकरी! नौकरी!” ऐसा तो नहीं। इकट्ठा करी न? ये याद रखो बस कि “ये मैं नहीं हूँ”। ये तो एक इकट्ठा की हुई चीज़ है, और जो भी कुछ मैंने इकट्ठा किया है वो मुझसे तो कम ही महत्वपूर्ण होगा। घर में आग लगी हुई हो – तुम हो, और तुम्हारी बहुत सारी चीज़े हैं, सब कुछ छोड़ सकते हो, एक चीज़ नहीं छोड़ सकते – क्या?
श्रोता १: सर,
वक्ता:



