प्रश्नकर्ता: समटाइम्स व्हेन देयर इज़ डीप इन्वॉल्वमेंट विथ रीडिंग, आई फ़ॉरगेट द सराउंडिंग्स। ऑनली द बुक रिमेंस। इज़ दैट इन्वॉल्वमेंट इन एस्केप फ़्रॉम व्हॉट इज़ हैपनिंग अराउंड और रियली बीइंग विथ ऑनसेल्फ़? (कभी-कभी जब पढ़ने से गहरा जुड़ाव होता है तो मैं अपने आस-पास का माहौल भूल जाता हूँ। केवल किताब रह जाती है। क्या ये आस-पास जो हो रहा है उससे बचने में शामिल होना है, या वास्तव में स्वयं के साथ होना है?)
आचार्य प्रशांत: जब भी कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिनका आपको बहुत ध्यान तभी तक रहता है, जब तक मन ज़बरदस्ती सक्रिय है। जो आदमी शान्त हो गया, उसको बहुत बातों की फ़िक्र छूट जाती है। क्या कहूँगा? तो जो आपने सराउंडिंग लिखी है कि आइ फ़ॉर्गेट द सराउंडिंग (मैं आस-पास को भूल जाती हूँँ)। सराउंडिंग (आस-पास) उन्हीं चीज़ों में से है।
जो आदमी शान्त हो गया। उसको बहुत बातें भूलने लग जाती हैं। एक तरीके की लापरवाही भी आने लग जाती है। बिलकुल हो सकता है कि वो किचन (रसोई) में दूध जला दे। बिलकुल हो सकता है कि वो अपनी गाड़ी की सर्विसिंग की डेट भूल जाए। क्योंकि उसको दिखने लग गया कि दुनिया में ये बहुत छोटी चीज़ें हैं। और कुछ है, जो बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत बड़ी बड़ी बातों को छोड़ने लग सकता है, दरकिरार करने लग सकता है।
आपके देश में जितने भी बुद्ध पुरुष हुए हैं किसी के जीवन की एग्ज़ैक्ट (समुचित) घटनाओं का ब्यौरा हीं नहीं मिलता। क्योंकि वो बातें छोटी थी। जो असली बात थी वो मिल गयी न। उन्होंने जो कहा वो मिल जाता है एग्ज़ैक्ट। पर उनकी ज़िन्दगी कैसी बीती ये नहीं पता चलेगा। आज तक किसी को ये नहीं पता कि कबीर ने शादी करी थी कि नहीं करी थी। कबीर के दोहे सारे संरक्षित हैं। पर कबीर की ज़िन्दगी का वृत्तान्त कुछ नहीं पता। किसी को नहीं पता। क्योंकि इस देश को ये अक्ल हमेशा से रही है कि क्या महत्वपूर्ण है, और क्या महत्वहीन है।




