प्रश्नकर्ता: रूह और आत्मा में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: आत्मा परम सत्य है, अचल है; न जन्म लेती है, न मरती है, न आती है, न जाती है; न उसके बारे में कुछ सोचा जा सकता है, न कहा जा सकता है। रूह जिसको आप कहते हैं वो आदमी की कल्पना है, झूठ है, असत्य है, एक आने-जाने वाली चीज़ है। रूह और आत्मा में कोई तुलना नहीं है, कोई समानता नहीं है; और ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि बहुत लोगों को रूह और आत्मा एक ही चीज़ लगते हैं।
आत्मा का मतलब है सच्चाई। किसकी सच्चाई? आप जो बने बैठे हैं उसकी सच्चाई। और दुनिया भी चूँकि आपको ही दिखाई देती है, इसलिए जब आपकी सच्चाई की बात होगी तो उसमें दुनिया की सच्चाई भी आ गयी। दुनिया का सत्य और आपका सत्य आत्मा कहलाता है, और ये दोनों सत्य एक हैं। जगत का सत्य और आपका सत्य आत्मा कहलाता है, और वो बदलता नहीं है। चूँकि वो बदलता नहीं है क्योंकि वो कभी शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि शुरुआत भी एक बदलाव होती है न, और इसलिए वो कभी ख़त्म भी नहीं होगा, क्योंकि अंत भी एक बदलाव होता है न। वो अनादि है और वो अनंत है, उसे आत्मा कहते हैं।
आत्मा किसी के शरीर में वास नहीं करती, और रूह को लेकर आपकी कल्पना है कि रूह तो शरीर में होती है और शरीर में घुस जाती है, निकल जाती है। आत्मा अनेक नहीं होती, आत्मा एक है, क्योंकि सत्य अनेक नहीं होते; और रूहें तो आपकी परिभाषा के अनुसार ही अनेक होती हैं। मैं कह रहा था कि खेद की बात है कि कुछ धार्मिक पंथ ऐसे रहे हैं जिन्होंने आत्मा को भी बिलकुल रूह के जैसा क़िस्सा बना दिया है, तो वो इस तरह की बातें करते हैं कि बहुत सारी आत्माएँ होती हैं और हम सब आत्माएँ हैं। और जो–जो बातें रूहों के बारे में करी जाती हैं, वो सब बातें उन्होंने आत्मा के बारे में करनी शुरू कर दी हैं।
वास्तव में जिस तरीके से आत्मा की बात आजकल ज़्यादातर लोग करते हैं, वो आत्मा की नहीं, रूह की बात कर रहे हैं। भारतीय धार्मिक दर्शन में रूह जैसी किसी चीज़ के लिए कोई जगह ही नहीं है! रूह माने क्या? कि कोई चीज़ जो आपके भीतर रहती है तब तक जब तक आप ज़िंदा हैं, फिर जब आप मरते हैं तो रूह निकल जाती है। ऐसा कहीं नहीं है! जी हाँ, ऐसा भगवद्गीता में भी नहीं है! बहुत लोग कहते हैं, ‘पर भगवदगीता में तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा आती-जाती है, वगैरह-वगैरह।‘ नहीं! उन्होंने न भगवद्गीता समझी है, न कृष्ण को समझा है।







