
युवाओं में बढ़ते नशे की समस्या का मूल कारण केवल ड्रग्स नहीं, बल्कि दिशाहीन और अशांत जीवन है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व, उद्देश्य और भीतर की बेचैनी का सामना नहीं कर पाता, तो वह किसी-न-किसी नशे में शरण खोजता है—चाहे वह शराब हो, सोशल मीडिया, मनोरंजन, भोजन या प्रसिद्धि। स्थायी समाधान बाहरी रोकथाम नहीं, बल्कि आत्म-शिक्षा, जीवन की सही दिशा और स्वयं को समझने वाली शिक्षा है, जिससे ऊर्जा सार्थक कार्यों में लगे और नशे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।





आचार्य प्रशांत: ये जिसको आप एंग्ज़ायटी कहते हो, ये बस बीमारी ही है, परेशानी की लत है। इस लत को जब विषय मिल गया तो वो चिंता बन जाती है। फ़िर आप कहते हो—“फलानी चीज़ को लेकर मैं चिंतित हूँ”, और जब कोई विषय नहीं मिला तो आप बिना विषय




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अठारह साल का हूँ और मेरे मन में लगातार एक डर बना रहता है। यहाँ तक कि जब मैं आपकी वीडियो के अनुसार अपने डरों का सामना करने कि कोशिश करता हूँ, तो भी मैं हर बार स्वयं को असुरक्षित ही पाता हूँ। मैं एक सोशल…


इतनी बड़ी भारी तुम्हारे साथ त्रासदी हो गई कि तुम आत्महत्या की सोचने लग गईं? तुम्हारा जीवन इतना फ़िज़ूल है? एक फ़िज़ूल आदमी तुम्हारी ज़िंदगी में आता है तुम्हारे साथ कुछ फ़िज़ूल की हरकतें करता है और तुम आँसुओं में डूबी हुई हो कि, “अरे! मैं


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम स्वीकार करें। हाल ही में कश्मीर में एक छोटी बच्ची को बड़ी बर्बरता से मार दिया गया। मैं जब भी इस तरह की किसी घटना के बारे में सुनती हूँ तो बुरी तरह से बेचैन हो जाती हूँ और अपने-आप को असहाय, बेबस पाती हूँ, अवसाद

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरे मन में आंतरिक हलचल बनी रहती है, हमेशा ही डर-सा लगा रहता है। फोन बजता है तो लगता है कि कोई बुरी खबर ही आएगी। सोते समय यह प्रतीत होता है कि शरीर सो गया, पर मस्तिष्क लगातार चलता जा रहा है। कृपया राह सुझाएँ।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि तनाव गलत जीवन जीने का परिणाम है। पर यदि मेरा जीवन ही गलत है तो मुझे हर समय तनाव क्यों नहीं रहता?

स्वयंसेवकः दिल्ली से 26 वर्षीय टीपू हैं; उनकी समस्या कम शब्दों में यही है कि लगभग 5 वर्षों से अवसाद से पीड़ित हैं और दवाइयों पर रहे हैं। कह रहे हैं कि – जब-जब दवा छूट जाती है तब तक बेहतर महसूस करता हूँ पर कुछ समय बाद दवा की

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे जीवन में कोई उपलब्धि नहीं है। बड़ा दुःख है, कैसे बाहर निकलूँ? मेहनत ख़ूब करी है लेकिन नतीजे नहीं मिले। पढ़ाई को भी पूरी ज़िंदगी बहुत महत्व दिया, लेकिन घर वालों ने हमेशा सुनाया ही है। फ़िलहाल मेरी उम्र 32 वर्ष की है।



प्रश्नकर्ता: आत्मा क्या है? आत्मा को कैसे अभिव्यक्त करें?

स्वयंसेवक (प्रश्न पढ़ते हुए): आचार्य जी, जिस तरीक़े के परिवेश में मैं पला-बढ़ा हूँ और अभी-भी अपना दिन बिताता हूँ, और जैसा समाज भी है, उसमें छोटे-छोटे क़दमों पर असफलता और छोटे होने का भाव लगातार मेरे सामने आता रहता है। इतनी असफलताएँ दैनिक रूप से देखने के बाद मुझ

प्रश्नकर्ता: अर्जुन की भक्ति और सौभाग्य है कि उन्हें श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, वो कर्म और कर्त्तव्य के मार्ग पर चल सके। पर साधारण मन और जीवन के लिए ये इतना सरल नहीं लगता। अपनों के विरुद्ध जाकर विजय-उत्सव मनाना कैसे सहज है, कृपया कुछ स्पष्ट करें।


प्रश्नकर्ता: आत्मिक आज़ादी की ओर कैसे बढ़ें?
आचार्य प्रशांत: कसाई के पिंजड़े देखे हैं न? उसमें कुक्कड़ मुर्गा और गुटरी मुर्गी बैठकर चर्चा कर रहे हैं कि, "क्या महाराष्ट्र का हाल भी कर्नाटक जैसा होगा?” और थोड़ी ही देर पहले उन्होंने देखा है कि पिंजड़े में एक हाथ भीतर आया…



प्रश्न: आचार्य जी, क्या संकोच न करने का अर्थ है कि कुछ भी कर सकते हैं, बोल सकते हैं?

प्रश्न: हमें पता होता है कि जो लोग हैं उन्हें हमसे कोई मतलब नहीं है, तब भी हमारे मन में ये ख़याल आ जाता है कि लोग क्या सोचेंगे। ऐसा क्यों होता है?

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या विचारों का आना असहज है?
आचार्य प्रशांत: आप कहिए न! अभी आप यहाँ बैठे हुए हैं, तल्लीनता से सुन रहे हैं, कितने विचार उठ रहे हैं? कुछ ही समय पूर्व, करीब एक-डेढ़ घण्टे का सत्र हुआ था, विचार-मग्न थे क्या? या ध्यान-मग्न थे? दोनों का अंतर…




श्रोता: एक हँसता हुआ जीवन क्या है?

बड़े मैच में उतरते ही हाथ बेड़ियों में जकड़े लगते हैं, और हम घबराहट सँभालने की कोई तरकीब खोजते हैं। पर मैदान बदल जाता है, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। जो रोज़ की ज़िंदगी में हर काम से मनचाहा नतीजा माँगता है, वह बड़े दिन भी वही माँग लेकर उतरता है। मेडल पक्का होते ही दबाव उतर जाना भी यही बताता है, और जो जीत पर इतराता है, वही हार से घबराता है। ज़िंदगी की ऊँचाई हमेशा मेडल के रूप में सामने नहीं आती। क्या हम देख पाएँगे कि हम नतीजे को कितना पकड़े हुए हैं?

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?








आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।

भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।



उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों का तनाव केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि इतिहास, सामाजिक भय, आर्थिक असुरक्षा और प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है। परिवार, कोचिंग संस्कृति और सफलता की संकीर्ण परिभाषाएँ छात्रों पर भारी दबाव डालती हैं। समाधान केवल काउंसलिंग नहीं, बल्कि ऐसी समग्र शिक्षा है जो रचनात्मकता, खेल, कला, दर्शन, आत्मबोध और स्वतंत्र चुनाव को महत्व दे, ताकि विद्यार्थी केवल करियर नहीं, बल्कि संतुलित और सार्थक जीवन भी जी सकें।
डिप्रेशन का पहला कारण है – कृत्रिम उपभोक्तावाद। वैज्ञानिक क्रांति के बाद उपभोग की वस्तुओं में बड़ी तेज़ी से वृद्धि हुई है। कुछ शातिर लोग हमें उन चीज़ों को चाहने पर मजबूर कर रहे हैं, जिन चीज़ों की कोई अहमियत नहीं है। चूँकि हम हर चीज़ पा नहीं सकते, इसीलिए फिर डिप्रेशन से घिर जाते हैं। डिप्रेशन का दूसरा कारण है – बोध का पतन। अगर हमारी ज़िंदगी में धैर्य, प्रेम, समझ, कर्मठता, ईमानदारी जैसे मूल्य नहीं हैं, तो हम चैन से नहीं रह सकते।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं तीस वर्ष का हूँ। एक दशक से ज़्यादा से बाइपोलर डिसॉर्डर (दोध्रुवी विकार) की समस्या से जूझ रहा हूँ। ओशो जी द्वारा सुझाई विधियों ने कुछ मदद भी की। परिवार के साथ ही रहता हूँ। कोई काम नहीं करता हूँ। आप कोई विधि बताएँ। परिवार…
प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
प्रश्नकर्ता: मेरी उम्र अट्ठाइस वर्ष है, पिछले दस सालों से मेरा खराब स्वास्थ्य मेरे जीवन का केन्द्र रहा है। आचार्य जी, अक्सर स्वयंसेविओं के माध्यम से आपके जीवन के विषय में कुछ बातें सुनने को मिलती हैं कि किस तरीके से आप स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद भी जो करने…
आचार्य प्रशांत डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपनेआप को बहुत मजबूर अनुभव न करो। और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अन्धी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक्क़त नहीं है, अगर वो अन्धी न हों। जो कामना आपको अन्धेरे…
आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मैं तनाव, दबाव माने प्रेशर सिचुएशन (तनावपूर्ण स्थिति) झेल नहीं पाता हूँ। जैसे ही मुझ पर दबाव पड़ता है बाहर से, मैं टूट जाता हूँ अन्दर से। अभी जवान हूँ तो ये हालत है और पूरी ज़िन्दगी सामने पड़ी है। न जाने क्या-क्या चुनौतियाँ आनी हैं,…
डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपने-आप को बहुत मजबूर अनुभव ना करो । और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अंधी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक़्क़त नहीं है, अगर वो अंधी ना हों। कुछ ऐसा माँग रहे हो…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी ऐसा है, जब सबके साथ होते हैं या कोई काम कर रहे होते हैं तब तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही अकेले बैठते हैं तो बेचैनी जैसा होता है। मन में ऐसा होता है कि कुछ मिसिंग है, खालीपन सा है। समझने की कोशिश करता हूँ,…
आचार्य प्रशांत: यह हर समय मौजूद होता है नहीं तो कभी-कभार परिलक्षित क्यों होता? आपके घर में कभी-कभार साँप दिखाई देता…
आचार्य प्रशांत: तुम्हें…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, 2011 के आसपास मुझे डिप्रेशन की समस्या हुई थी। उस समय घर में अशांति की वजह से मानसिक संतुलन थोड़ा ख़राब हो गया। एकदम से 'डर' आ गया जीवन में, और उसके बाद से वैसे ही चल रहा है। डर एकदम से हावी होता ही रहा,…
प्रश्नकर्ता: मैंने बहुत घिनौने पाप किए हैं, क्या मेरा कुछ हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा ही कुछ हो सकता है। उनका नहीं हो सकता जो अपने आप को बड़ा पुण्यात्मा या धर्मी समझते हैं। देखो, पापी तो हम सारे ही हैं। जीसस कह गए हैं कि "सफरिंग इज़ सिन…
आचार्य प्रशांत:…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शिविर का तीसरा और आखिरी दिन है आज। इन तीन दिनों में खुद के बारे में बहुत कुछ जाना और समझा। इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद देता हूँ। मुझसे कहा गया कि शिविर तो अब शुरू होगा जब हम घर जाएंगे। मेरा सवाल है कि…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं साँस भी लेता हूँ तो हवा शरीर के अंदर जा रही है, हवा कोई और है, तो ऐसे तो मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता।
आचार्य प्रशांत: साँस किसके अंदर जा रही है?
प्र: शरीर के अंदर जा रही है।
आचार्य: तो शरीर तो अकेला…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ, और हमेशा बेचैन रहता हूँ। क्या नहीं पढ़ना ही मेरी बेचैनी का कारण है? या कोई और कारण है जिसे मैं समझ नहीं पा रहा हूँ?
आचार्य प्रशांत: पढ़ाई तो आप करते ही नहीं आए हो न। और आप इंजीनियरिंग में…
आचार्य प्रशांत: ये सिर्फ़ तुम्हारे नहीं, मेरे मन में भी आ जाता है। इसमें कौन-सी बड़ी बात…
~ गुरु कबीर
आचार्य प्रशांत: “लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति” — सवाल उठा रहे हैं कबीर, यह कौन सा प्रेम है, यह किसका प्रेम है, क्या प्रकार है इसका कि एक…
श्रोता: आचार्य जी, जब भी हमें खाली समय मिलता है, हम बातें शुरू कर देते हैं । ऐसा क्यूँ ?
आचार्य प्रशांत: मन को लगातार करने के लिए कुछ चाहिए, कुछ तो चाहिए । वो जो कुछ भी करता है उसका कोई विषय होता है; सब्जेक्ट । मन की ये…
श्रोता: आपने बोला कि गलत या बुरे को गलत बोलना सही होता है, लेकिन जब भी मैं ये करती हूँ, तो मैं ज़्यादा अशांत करती हूँ, जितनी किताबें मैंने अभी पढ़ी हैं या फिर पेरेंट्स ने जो सिखाया अगर आप कुछ गलत में भी अच्छाई ढूंढ सकते, तो वो ज़्यादा…
आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ आदमी है जो दुःख में जिये जा रहा है वरना अस्तित्व में दुःख कहीं भी नहीं है। ये सब कुछ तुमको अपने चारों ओर दिखाई देता है, ये कहाँ से आ रहा है? ये आ कहाँ से रहा है, इसको समझो, ध्यान से देखो।
तुम सब सुख…
दुःख- जहाँ पर आंसू हैं, जहाँ मन रोता है। दुःख से मन हमेशा बचना चाहता है।
दुःख से प्रियकर स्थिति मन को लगती है सुःख की। सुःख में हंसी है, मन सुःख की ओर आकर्षित होता…
35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।
डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।
डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
अकेलापन बाहर लोगों की कमी से नहीं, भीतर के अधूरेपन की मान्यता से पैदा होता है। जब व्यक्ति मान लेता है कि उसे पूरा होने के लिए किसी व्यक्ति, वस्तु या उपलब्धि की ज़रूरत है, तब वह लगातार खोज और निर्भरता में भटकता है। यह भावना सामाजिक मान्यताओं और बाज़ार द्वारा भी पोषित होती है। समाधान बाहर कुछ जोड़ने में नहीं, बल्कि इस झूठी धारणा को पहचानने में है कि हम मूलतः अधूरे हैं। आत्मज्ञान के साथ यह भ्रम टूटता है और अकेलापन स्वतः समाप्त होने लगता है।