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सारा जहाँ मस्त, मैं अकेला त्रस्त
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शिविर का तीसरा और आखिरी दिन है आज। इन तीन दिनों में खुद के बारे में बहुत कुछ जाना और समझा। इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद देता हूँ। मुझसे कहा गया कि शिविर तो अब शुरू होगा जब हम घर जाएंगे। मेरा सवाल है कि अगर हम सही काम कर रहे हैं तो क्या ज़रूरी है कि वो काम हमें हल्का रखे, शांति दे, आंनद दे — जैसा कि सुनने में आता है? जो काम सही होता है, उसे करने में भीतर से कष्ट और विरोध क्यों उठता है? मैं अभी कच्चा साधक हूँ, नई शुरुआत हुई है, खुद को बहुत बार कमज़ोर होता पाता हूँ, लड़खड़ाता हुआ देखता हूँ। क्या मुझे कोई एक बात, एक मंत्र, एक शब्द आपसे मिल सकता है जिसे याद करके, सुनके, मैं जब भी फिसलूँ तो दोबारा खड़ा हो जाऊँ।

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि क्या ज़रूरी है कि सही काम करने पर शांति का, हल्केपन का और आनंद का ही अनुभव हो। बिलकुल ज़रूरी है पर कुछ बातें ध्यान में रखनी होंगी। आपके पास एक थर्मामीटर था। वो कब का खराब हो गया था। उसे शायद जानबूझकर खराब कर दिया गया था। और उसकी सुई, उसका कांटा, 98.4 फ़ारेनहाइट पर रोक दिया गया था, बाँध दिया गया था। आप जब भी उससे अपना ताप नापते, थर्मामीटर उत्तर देता — “सामान्य है, 98.4 है”। आप गलत ज़िन्दगी जीते रहे, जीवन में ताप बढ़ता रहा, उत्तेजना बढ़ती रही, बुखार, ज्वर बढ़ता रहा। थर्मामीटर आपको झांसा देता रहा। वो आपको लगातार यही बताता रहा — “98.4 — सामान्य है, 98.4 — सामान्य है”। आप 101 पर पहुँच गए, वो अभी आपको यही बता रहा है कि “सामान्य है”। और चूंकि वो बता रहा है कि सामान्य है, आप उसकी बात मान रहे हैं। तो आपको लगा कि अभी तो सब ठीक है, जैसी हम ज़िन्दगी जी रहे हैं, इसको और ज़्यादा ऐसे ही जिया जा सकता है। तो वो गलत ज़िन्दगी जिसने आपका ताप बढ़ा दिया, उसी को आपने और बढ़ा दिया। जिन गलत धारणाओं, मान्यताओं के कारण आपका जीवन जलने लगा, आपने उन गलत मान्यताओं, धारणाओं को गलत जाना ही नहीं क्योंकि थर्मामीटर तो आपको लगातार यही बता रहा था कि सब — सामान्य है। 101 जब था, उसी समय आपको पता चल जाता कि 101 है, तो शायद आप थोड़ा-सा चेतते, कुछ सावधानी करते, कुछ होश बरतते, किसी तरीके से अपना तापमान गिराते। पर 101 पर भी आपको यही कहता रहा कि सब ठीक है — “सामान्य हो तुम। जो तुम कर रहे हो, जैसे तुम जी रहे हो, ये बिलकुल ठीक है। यही तो सामान्य है, ऐसे ही तो होना चाहिए।” तो नतीजा ये हुआ कि आपका बुखार, आपकी ही हरकतों से और बढ़ता रहा — 102 हो गया, 103 हो गया। और आपकी आदत लग गयी है 102-103 में जीने की। और कोई तरीका नहीं था आपको ये ज्ञात होने का कि आप बहुत बीमार हैं। आप दूसरों का हाथ पकड़ते, उनके हाथ भी उतने ही जल रहे थे। क्योंकि सबके थर्मामीटर एक ही हैं। वो थर्मामीटर किस फैक्टरी से निकले हैं, जानते हैं आप?

वो थर्मामीटर निकले हैं शरीर एंड समाज एंड सन्स प्राइवेट लिमिटेड। ये वहाँ के उत्पाद हैं। एक ही थर्मामीटर है पूरे समाज के पास। एक ही थर्मामीटर है उन सबके पास जो शरीर धारण करके घूम रहे हैं। तो आपको कभी- कभार शक भी होता कि ज़िन्दगी लगता नहीं कि कुछ ठीक चल रही है। भीतर कुछ उबलता सा रहता है। कुछ धुआँ सा उठता रहता है लगातार। तो आप जाते हैं अपने प्रियजनों के पास। हाथ छूकर कहते हैं, “ज़रा बताना, मेरा शरीर कुछ गर्म है क्या?” आप 103 पर हैं। लेकिन बात इतनी-सी है कि आप जिसका हाथ पकड़ रहे हैं, वो भी 103 पर है, बल्कि हो सकता है वो 104 पर हो। आप उससे पूछ रहे हैं कि “बताना ज़रा, क्या मुझे बुखार है?” और वो जवाब में कह रहा है कि “अरे! तुम्हारा शरीर तो ठंडा पड़ा है”। और बिलकुल सही बात है, 104 की तुलना में 103 तो ठंडा ही पड़ा हुआ है। तो बोलता है, “तुम्हारा शरीर तो ठंडा पड़ा हुआ है। ज़रा गर्मी लाओ। ज़रा तेज़ी लाओ जीवन में। थोड़ी उत्तेजना बढ़ाओ। कुछ ताप नहीं है तुम्हारे पास, बड़े ठंडे आदमी हो।” तो आप कहते हैं, “अरे, हम ही पीछे रह गए। लगता है हम असामान्य हुए जा रहे हैं।” तो आप कहते हैं, “अभी तो और बढ़ सकते हैं”। आप 104 पर पहुँच गए। अब ये 104 आपके लिए सामान्य बन चुका है क्योंकि जन्म से आपने देखा ही यही है। ये जो 104 है, ये आपके लिए पूर्णता है, सामान्य है।

मन-ही-मन इससे सामंजस्य स्थापित कर चुके हैं। आप पूरी तरह से समायोजित हो चुके हैं। हालत यहाँ तक पहुँच चुकी है कि आपको वाकई कोई मिलता है जो 98.4 वाला ही है, तो उसको आप मुर्दा घोषित कर देते हैं। आप कहते हैं, जैसे मुर्दे का शरीर ठंडा पड़ जाता है, इसका शरीर ठंडा पड़ा हुआ है। आप कहते हैं, “देखो 98.4 पर हम हैं, और ये हमसे 6 डिग्री नीचे है, तो ज़रूर ये 92 पर है।” हकीकत ये है कि आप 104 पर हैं, वो 98 पर है। लेकिन आपकी ज़िद्द है कि आप 98 पर हैं। और अगर आप 98 पर हैं तो आपके अनुसार वो आपसे 6 डिग्री नीचे, माने वो 92 पर है। तो जो सामान्य है, उसको आपने असामान्य घोषित कर दिया। कह दिया कि ये मुर्दा लोग हैं, इन्हें ज़िन्दगी जीना नहीं आता। इनकी ज़िन्दगी में कुछ ऊष्मा नहीं है, कुछ तेजाइ नहीं है। ज़रा भी गर्मी नहीं है भई। बड़े ही बर्फ जैसे गड़े हुए मुर्दे हैं ये।

तो ये सब चल रहा है।

अब एक दिन कोई मिलता है आपसे, उसका धंधा ही है थर्मामीटर ठीक करना। उसने मिशन ही यही चला रखा है कि बेटा तुमको ठीक करूँ उससे पहले तुम्हारा थर्मामीटर ठीक करना ज़रूरी है। तुम्हारी ज़िन्दगी बदले, इससे पहले तुम्हारी ज़िन्दगी के पैमाने बदलना ज़रूरी हैं। तुम्हारे जीवन में सरलता आए, शांति आए, सच आए, उससे पहले तुम्हारे स्टैंडर्ड्स बदलने ज़रूरी हैं। तुम्हारे मापदंड बदलने ज़रूरी हैं। तो उसने आपका थर्मामीटर लिया और थर्मामीटर ठीक कर दिया। थर्मामीटर जैसे ही ठीक हुआ, वैसे ही आपको पता चला कि आप तो 103 पर बैठे हैं। असल में थर्मामीटर ठीक होते ही एक डिग्री तापमान अपनेआप कम हो जाता है। वो बीमारी है ही धोखे की और भ्रम की। जैसे ही भ्रम का पहला चरण मिटा, थोड़ा तापमान तो अपनेआप घटा। तो आपने फिरसे ज़रा मुँह में थर्मामीटर लिया और तापमान मापा, और आया 103। आप चौंक कर खड़े हो गए, बोले, “ये क्या हो गया मेरे साथ?” और आपके दिमाग में तूफान चलने लगे, बिजलियाँ कड़कने लगीं। आपने कहा, “इस आदमी ने मेरे साथ कुछ बहुत गलत कर दिया है। इसने मुझे बुखार में धकेल दिया है।” उसने बुखार में नहीं धकेल दिया है। उसने तो बल्कि बुखार कम करने की शुरुआत कर दी है।

तुम पूछ रहे हो कि क्या अध्यात्म के रास्ते पर, क्या सच्चाई के रास्ते पर, क्या समझदारी और बोध के रास्ते पर शांति, आनन्द और हल्कापन निश्चित रूप से मिलते हैं? वो इसपर निर्भर करता है कि तुम अपनी तुलना किससे कर रहे हो। आज तुम 103 पर खड़े हो और अपनी तुलना 98 से करोगे तो तुम कहोगे, “नहीं, अध्यात्म ने तो मुझे बर्बाद कर दिया। मैं पहले 98 पर था और अब 103 पर आ गया।” लेकिन अगर अपनी तुलना तुम अपने वास्तविक तापमान से करोगे, तो तुम 104 पर थे, 103 पर आए हो। तुम्हें शांति मिली है, तुम्हें हल्कापन मिला है। लेकिन आमतौर पर लोगों में इतनी ईमानदारी नहीं होती कि वो अपनी वास्तविक हालत से अपनी बेहतर हालत की तुलना कर सकें।

शिविर में तुमने तीन दिन लगाए हैं — कुछ तुम को बेहतरी मिली है, कुछ तुम्हारी प्रगति हुई है, कुछ तुम में शीतलता आई है। तुम 104 पर थे, 103 पर आ गए हो। लेकिन ये 103 शांति कहलाएगा, हल्कापन कहलाएगा, आनन्द कहलाएगा या नहीं कहलाएगा, वो उसपर निर्भर करता है कि तुम 103 की तुलना 104 से कर रहे हो या 98 से कर रहे हो। सच्चे आदमी हो अगर तुम तो इस 103 की तुलना तुम 104 से करोगे। तुम कहोगे कि “मेरे जीवन में बड़ी ज़बरदस्त गड़बड़ थी — 104 डिग्री की गड़बड़ थी, अब वो 103 डिग्री की हो गई। हाँ, मुझे शांति मिली, मुझे हल्कापन मिला। मेरा ताप, मेरा ज्वर कुछ कम हुआ।” तुम्हारे मन में अनुग्रह रहेगा। लेकिन अगर तुम झूठे आदमी हो तो तुम कहोगे, “मैं तो 98 पर था पहले। इन्होंने न जाने क्या कर दिया कि मैं 103 पर आ गया। ये अध्यात्म का रास्ता ही गड़बड़ है। ये साधना वगैरह, स्वाध्याय वगैरह बड़ी खतरनाक बातें हैं। ये आदमी को बीमार कर देती हैं। मुझे देखो न, मैं अच्छा भला आया था, एकदम चंगा आदमी था मैं। 98 पर मैं आया था, जब से मैंने अवलोकन शुरू किया, जब से मैंने ज़िंदगी को जानना-समझना शुरू किया, जब से मैंने दूध-का-दूध और पानी-का-पानी करना शुरू किया, जब से मैंने सच-को-सच और झूठ-को-झूठ बोलना शुरू किया — मैं 98 से 103 पर पहुँच गया। अरे! ये सच का रास्ता ही बेकार है, ये आदमी को बीमार कर देता है।”

अब वो तुम्हारी ईमानदारी पर निर्भर करता है कि तुम मानते हो कि तुम बीमार कर दिए गए हो या तुम ये स्वीकार करते हो कि तुम्हारा उपचार शुरू हो चुका है। ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि जब से सच के रास्ते पर चले हैं, जब से ज़िन्दगी की हकीकत से रू-ब-रू हुए हैं, जब से आँखें ज़रा खोली हैं, जब से होश ज़रा सा दृढ़ हुआ है — जीवन में दुःख, उदासियाँ, संघर्ष, कलह, कलेश बढ़ ही गए हैं। ये ज़्यादातर लोगों का अनुभव है, वो यही कहते हैं। वो कहते हैं — “पहले ही सही था। नशे से भरी हुई ज़िन्दगी थी, पर हस्ते थे, गाते थे, औरों की तरह चहकते थे, सामान्य कहलाते थे — 98.4। जैसे सब हैं, वैसे ही हम भी थे। वीकेंड पर दारू पीते थे। हर 2-3 महीने में एक बार घूमने चले जाते थे। जितनी घटिया पिक्चरें रिलीज़ होती हैं, सब में मुँह मार आते थे। औरों की तरह सोशल मीडिया पर छितराए-छितराए पड़े रहते थे। जैसे ज़माना चल रहा है, ज़माने के पीछे-पीछे हम भी चल लेते थे। कोई दुःख नहीं था बहुत, कोई असुविधा नहीं थी बहुत। बीच-बीच में भीतर कुछ दर्द सा उठा करता था पर उसे हम दबा दिया करते थे। कभी-कभी उठता था। कोई बड़ी दिक्कत की बात नहीं है। और उस दर्द को दबाने के विशेषज्ञ ज़माने में बहुत मौज़ूद हैं। हम उनसे सलाह लिया करते थे। वो जो भी गोलियां दे देते थे — कभी एनालजेसिक, पेनकिलर, कभी कुछ और। वो हम ले लेते थे। कभी मनोरंजन, कभी नशा, कभी पैसा, कभी भृमण, कभी रोमांच, कुछ थ्रिल, कुछ सेक्स — ये सब मिल जाते थे तो भीतर जो दर्द उठ रहा होता था वो दब जाता था। और कभी-कभार ऐसा होता था जब साल-दो साल में एनालजेसिक भी काम नहीं करते थे तो छोटा-मोटा एनेस्थीसिया ले लेते थे। हो जाता था सब। लेकिन ये जब से ग्रन्थों को पढ़ा है, जब से कृष्ण की बात सुनी है, जब से उपनिषदों की वाणी हम तक पहुँची है, जब से संतो के गीत कानों से टकराए हैं — तब से बड़ी गड़बड़ हो गयी है। सारा जहाँ मस्त, मैं अकेला त्रस्त। मेरी ही हालत खराब है, सब मौज कर रहे हैं, हैप्पी-हैप्पी हैं। मेरी हालत देखो, मैं ही अकेला सिकन्दर-साधक निकला हूँ। बड़ी खराब हालत है मेरी।”

ज़्यादातर लोगों का यही अनुभव रहता है। वो ऐसे ही आपबीती बयान करते हैं। तुम भी ये कर सकते हो। खुद को बेवकूफ बनाने के बहुत तरीके हैं, जो चाहो वो चुन लो। नए-नए तरीके ज़माना ईजाद भी करता रहता है। एक तरीके से ज़्यादातर चीज़ें जो ईजाद होती हैं, वो खुद को बेवकूफ बनाने का एक नया बाज़ारू ज़रिया ही होती हैं, और कुछ नहीं। जिसको तुम कहते हो ‘प्रगति’, जिसको तुम कहते हो ‘टेक्नोलॉजिकल इन्नोवेशन’ (तकनीकी नवाचार), अगर गौर से देखोगे तो पाओगे कि उसमें से ज़्यादातर और कुछ नहीं है, आदमी के मन को बहलाए रखने की कोशिश है। वो बहलाए रखने की कोशिश बहुत ज़रूरी है नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन किसी ज़रा भोले-भाले आदमी को पता चल जाए कि 98, 98 नहीं है, 104 है! उसको मूर्ख बनाए रखने के लिए बाज़ार में नई-नई चीज़ों का उतरना बहुत ज़रूरी है। वो मूर्ख बना रहे और भ्रमों में ही उलझा रहे, इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि जीवन में उसको एक के बाद एक प्रलोभन देते रहो। जीवन में एक के बाद एक तुम उसको संकल्पों, कर्तव्यों में बाँधते रहो। उसको बताते रहो कि अब ये काम कर लिया बेटा, अब अगला काम ये कर। अब ज़िन्दगी में ये चीज़ निपटाली बेटा, अब अगली चीज़ ये निपटा। बहुत ज़रूरी है कि उसको किसी-न-किसी झूठे तरीके से व्यस्त रखो, नहीं तो ज़िन्दगी की हकीकत खुल जाएगी उसपर। और ऐसा आदमी खतरनाक हो जाता है एक बार वो जान गया 98, 98 नहीं 104 है — फिर वो घूम-घूम कर सबको बताएगा।

झूठ का कितना भी प्रचार कर लो, झूठ डरा हुआ ही रहता है। और सच का जैसे ही थोड़ा सा प्रचार होने लग जाता है, झूठ तिलमिला उठता है।

शिविर के बाद निश्चित रूप से जीवन में शांति आएगी। लेकिन जब तुम शांति कहते हो तो तुलनात्मक रूप से कहते हो न? वो तुलना बस तुम सही करना। 103 की तुलना 104 से करी तो पता चलेगा कि हाँ जीवन में शांति आयी है। और 103 की तुलना अगर तुम 98 से कर बैठे तो तुम्हें लगेगा कि अध्यात्म ने बर्बाद कर दिया तुमको। मेरे पास लोग आते हैं और कई बार धोखे से ईमानदारी के किसी क्षण में कह ही जाते हैं कि आचार्य जी आपके पास आए, बड़ी संगत की बड़ी बातें सुनी, बड़ा पालन भी किया लेकिन वो सब नहीं मिला जो हमें चाहिए था। बड़ा दर्द रहता है लोगों के दिलों में। मैं पूछता हूँ कि इस बात के लिए शुक्रगुज़ार नहीं हो तुम मेरे कि तुम्हें वो सब नहीं मिला जो तुम्हें चाहिए था? मेरा काम तुम्हें वो देना नहीं है जो तुम चाहते हो। तुम बस ये बता दो कि जैसे तुम थे मेरे पास आने से पहले, और जैसे तुम आज हो मेरे पास आने के बाद, क्या तुम दोबारा वैसा होना चाहोगे जैसा यहाँ आने से पूर्व थे? बोलो?

और अगर होना चाहते हो तो मेरे पास है एक जादुई डंडा। आजकल ये सब बहुत चलते हैं। मेरे पास भी है एक जादुई डंडा। मैं तुमको फिर वैसा ही करे देता हूँ जैसा तुम आने से पहले थे, बोलो चाहिए?

कहते हैं, “नहीं, नहीं, वैसा तो अब हम किसी भी हाल में नहीं होना चाहेंगे जैसे हम पहले थे। वो आदमी ही बड़ा मूर्ख था। न जाने कैसे-कैसे हास्यास्पद भ्रम पाले बैठा था। जो बातें बिलकुल प्रत्यक्ष हैं, स्पष्ट, वो भी उसको दिखाई नहीं देती थी। तो वैसा तो हम किसी हालत में नहीं होना चाहते जैसा हम आपसे मिलने से पहले थे आचार्य जी।” मैं कहता हूँ कि बस मुँह बन्द रखो और ज़िन्दगी को सही दिशा में आगे बढ़ाते रहो।

शांति की तुम्हारी जो परिभाषा है वो एक अशांत मन से आ रही है — तो तुम्हारी शांति की परिभाषा ही गलत है।

हल्केपन की तुम्हारी जो परिभाषा है वो बड़े भारी केंद्र से आ रही है — तुम्हारी हल्केपन की परिभाषा ही गलत है। हित की और आनंद की जो तुम्हारी परिभाषा है वो बड़े नशे, बड़े बेहोशी के केंद्र से आ रही है — तो तुम्हारी हित की और आनंद की परिभाषा ही गलत है।

मैं यहाँ पर तुम्हें तुम्हारी गलत परिभाषाओं के अनुसार झूठी शांति, झूठा आनंद, झूठा हल्कापन देने के लिए नहीं हूँ। मेरा काम है तुम्हारा थर्मामीटर ही ठीक कर देना, तुम्हारे पैमाने ही बदल देना। तुम्हारा जो भीतर वैल्यू सिस्टम है, जीवन के मूल्यांकन की भीतर जो व्यवस्था बैठी हुई है, मेरा काम है उसपर रोशनी डालना ताकि तुम सही चीज़ को मूल्य देना सीख सको और मूर्खताओं को कीमत देना बंद कर सको। तुम कहते हो, “आचार्य जी, क्या ज़रूरी है सच के रास्ते पर शांति मिले?” — अच्छा ठीक है, चलो थोड़ा इसी बात की विवेचना कर लेते हैं। पिछली बार तुम्हें शांति कहाँ मिली थी? तुम कहोगे, “पिछली बार बड़ी शांति मिली थी जब वो एक फलाना दुश्मन है मेरा, उसको दो पड़वाये मैंने किसी से। बड़ा सुकून मिला, दिल बिलकुल ठंडा हो गया।” ये तो तुम्हारी शांति की परिभाषा है। किसी से प्रतिस्पर्धा करके आगे निकल गए तो तुम कहते हो कि ठंडक मिल गई, शांति मिल गई। तुम्हारी मनचाही मुरादें, जिन में से ज़्यादातर भोगकेंद्रित होती हैं, वो पूरी हो जाएं तो तुम कहोगे बहुत शांति मिली। कोई व्यर्थ की चीज़ पकड़े बैठे हो, उसके छिन जाने का तुमको डर था। संयोगवश वो चीज़ तुमसे छिनी नहीं, तुम कहते हो, अब शांति मिली नहीं तो हम तो डर से पगलाए जा रहे थे।

पिछले एक हफ्ते ठीक से नींद नहीं आई, बड़ा अशांत रहा।

क्यों?

वो लग रहा था कि मेरी फ़लानी चीज़ छिन न जाए। वो चीज़ दो धेले की नहीं, जीवन में उसकी कोई कीमत नहीं लेकिन उसकी सुरक्षा को लेकर तुम बड़े अशांत थे। वो चीज़ें संयोगवश नहीं छिनी अभी और तुम कह देते हो शांति मिल गई। ये तुम्हारी शांति की परिभाषा है। अब तुम पूछ रहे हो कि सच के रास्ते पर शांति मिलेगी कि नहीं मिलेगी? वो पुरानी वाली नहीं मिलेगी भाई। तुम्हारी परिभाषा ही गलत थी।

जब तुम मुझसे कहते हो, “आचार्य जी, आपकी बात सुनेंगे तो क्या शांति मिलेगी?” नहीं, वो वाली शांति नहीं मिलेगी जो तुम्हें पहले मिला करती थी, क्योंकि वो शांति ही झूठी थी। लेकिन आज भी जब तुम शांति शब्द का प्रयोग करते हो तो तुम्हारा आशय वो पुराना वाला ही होता है। मेरा काम है तुम्हारे आशयों को बदल देना, मेरा काम है तुम्हारी परिभाषाओं को बदल देना — ताकि तुम जान सको कि पहले जिसको तुम शांति कहते थे, वो शांति थी ही नहीं; ताकि तुम जान सको पहले जिसको प्रेम कहते थे वो प्रेम नहीं था; पहले जिसको आनन्द कहते थे वो आनन्द नहीं था; पहले जिसको तुम सामान्य कहते थे, वो सामान्य नहीं था। पहले तुम जिसको 98.4 कहते थे, वो 98.4 था ही नहीं। तुम्हारे साथ धोखा किया गया था।

इसी तरीके से आनन्द। आनन्द को लेकर भी तुम्हारे पास एक छवि है। मैं पूछूँ, ज़रा बताना पिछली बार आनंदित कब हुए थे, तो तुम बता दोगे। तुम कहोगे, “पिछली बार जब नए फ्लेवर का मटन पिज़्ज़ा उतरा था मार्केट में और उसमें मैंने अपने वहशी दाँत गड़ाए थे, तब तो अहा हा हा हा हा! क्या आनन्द आया था, पूछिए ही मत।” ये तो तुम्हारी आनन्द की परिभाषा है। अब तुम चाहते हो कि सच के रास्ते पर भी तुम्हें आनन्द मिले, ऐसा आनन्द मिले। नहीं, बिलकुल नहीं मिलेगा। अगर आनन्द वो है जो तुम्हें मटन पिज़्ज़ा में दाँत गड़ाने से मिलता था तो फिर तो सच के रास्ते पर तुमको बिलकुल आनन्द नहीं मिलेगा, बल्कि तुम्हारा पिछला आनन्द छिन जाएगा। और लोग यही तो शिकायत करते हैं। कहते हैं, “पहले जीवन आनन्दित चल रहा था आचार्य जी। जब से आपकी काली छाया ज़िन्दगी पर पड़ी है, सब आनन्द छिन गया है।” तुम्हारे आनन्द का मतलब ही है मटन पिज़्ज़ा। जिसको तुम ‘जॉय’ बोलते हो, देखो न वो कितनी घटिया चीज़ है। हम ऐसे लोग हैं जिन्होंने ‘जॉय’ शब्द को ही विकृत कर दिया है। हम ऐसे शख्स हैं जिन्होंने ‘जॉय’ शब्द को ही बाज़ारू बना दिया है। कुछ तुम्हें भोगने को मिल जाए, तुम कहते हो ‘जॉय’ — उसी से आता है ‘एन्जॉय’। कैसी-कैसी चीज़ों को तो तुम एन्जॉय कर लेते हो। ये तुम्हारे आनन्द की धारना है। इस धारना को तो टूटना होगा न, इस धारना को मैं आगे थोड़े ही बढ़ने दूँगा। मैं ये थोड़ी कहूँगा कि पहले जिस तरीके से तुम जॉय और आनंद भोग रहे थे दुनिया में, मेरे पास आओगे तो मैं उसी तरह का और अतिरिक्त तुम्हें जॉय या आनंद दे दूँगा। बिलकुल भी नहीं।

इसी तरीके से ‘हल्कापन’। तुमने कहा — “आचार्य जी, क्या ये सही है कि जो सच के रास्ते पर चलते हैं उनकी ज़िंदगी में एक हल्कापन रहता है?” हल्कापन तो बिलकुल रहता है लेकिन तुम्हारे ‘हल्केपन’ की परिभाषा ही गज़ब है। फिर पूछता हूँ, जैसे दो बार पूछा है, तीसरी बार।

पिछली बार बताना हल्कापन कब महसूस हुआ था?

हमारे लिए हल्केपन का मतलब क्या है?

हल्केपन का मतलब है पूरा हफ्ता तनाव में बीता। पैसे के लिए और सुरक्षा के लिए और समाज के और लोगों के दबाव में आकर के घटिया नौकरी कर रहे थे। पूरा हफ्ता ही पूरे तनाव में बीता। किसी घटिया बॉस की गाली खा रहे हैं, और उसके बाद शनिवार की रात को दोस्तों के साथ बैठकर के खूब दारू पी, और कहे, “हल्के हो गए”। ये तो तुम्हारे हल्केपन की परिभाषा है। अब इसी परिभाषा को आधार बनाकर तुम मुझसे पूछते हो, “आचार्य जी, सच के रास्ते पर भी हल्कापन मिलेगा क्या?” भाई, वो वीकेंड की दारू वाला हल्कापन नहीं मिलेगा सच के रास्ते पर। तुम अपनी परिभाषा ठीक करो। तुम अपने शब्दों में पहले सही अर्थ भरो, फिर बात करो। और क्या है हल्केपन की परिभाषा? कि कुँवारे हैं, घूम रहे हैं, कोई मिल गई, उसके साथ वन नाइट स्टैंड कर लिया। शरीर में जो ताप भरा हुआ था, शरीर में जो तमाम रस-रसायन भरे हुए थे उनका थोड़ा उत्सर्जन कर दिया। जैसे किसी आदमी का ब्लैडर बिलकुल फूला हुआ हो और उसको मूत्रालय दिख जाए, तो वो कहेगा — बड़े हल्के हो गए। हल्के होने का इसी आशय में सुना है न उपयोग? बहुत लोग करते हैं। टट्टी आ रही है, पेशाब आ रही है और कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा कि कहाँ जाकर के मूत्र त्याग, मल त्याग करें — फिर एक झाड़ दिख जाता है तो कूद के झाड़ पर चढ़ जाते हैं और बाहर निकलते हैं थोड़ी देर बाद, उनके चेहरे पर अद्भुत हल्कापन रहता है और कहते हैं, “आ हा हा हा हा, फ़ीलिंग सो लाइट, बड़ा हल्का अनुभव कर रहा हूँ।” ये तो तुम्हारे हल्केपन की परिभाषा है। सच के रास्ते पर हल्कापन फिर थोड़े ही मिलेगा तुमको, परिभाषाएँ ही गलत हैं। ठीक तो करो पहले परिभाषाएँ।

हल्कापन मिलेगा, असली हल्कापन मिलेगा। और हल्कापन तुम तभी अनुभव कर पाओगे, इस नए हल्केपन को तुम तभी सम्मान दे पाओगे जब पहले तुम मानोगे कि तुम अध्यात्म से पहले कितने भारी थे। 103 तापमान में भी तुम अनुग्रह से तभी भरे रहोगे जब पहले तुम मानोगे कि तुम पहले 104 पर थे, अन्यथा तुम्हारे मन में किसी तरह का कोई अनुग्रह नहीं उठेगा। तुम तो बल्कि किसी झूठे 98 वाले सपने से तुलना करोगे और कहोगे, “बर्बाद हो गए। ठीक ही तो चल रहा था सब कुछ।”

तो अध्यात्म निश्चित रूप से जीवन में हल्कापन लाता है लेकिन हल्के तुम हुए हो या नहीं हुए हो, मैं कह रहा हूँ, ये समझने के लिए तुम्हें पहले देखना पड़ेगा कि तुम्हारा वर्तमान जीवन ही कितना भारी है। एक बार इस बात की अभिस्वीकृति उठेगी भीतर से, तब कहोगे कि, “हाँ हाँ हाँ, पहले मैं अपने ऊपर 250 किलो का वज़न रख के चल रहा था और अब वो वज़न 225 किलो का है तो मैं हल्का हो गया”। लेकिन 225 किलो का वज़न तो अभी भी है तुम्हारे ऊपर। अगर तुम अपनेआप को यही सांत्वना देते रहोगे कि नहीं मेरे ऊपर तो कोई वज़न था ही नहीं, तो अब तुमको लगेगा नया-नया तुमपर 225 किलो का वज़न डाल दिया गया है और तुम बड़े रोष से भर जाओगे। तुम्हारे भीतर सच के प्रति बड़ा विरोध उठेगा। तुम कहोगे कि पहले तो मेरे ऊपर कुछ वज़न था ही नहीं, अभी-अभी 225 किलो डाल दिया गया है। बाबा, तुमपर 225 किलो डाल नहीं दिया गया, तुम्हारा 25 किलो वज़न घटा दिया गया है। यहाँ आने से पहले तुम 250 किलो का वज़न अपने सर पर रख के चल रहे थे मानो पहले।

मुझे इतनी बार क्यों तुम्हें समझा-समझा के कहना पड़ रहा है कि मानो पहले, कारण बताए देता हूँ। अहंकार को ये मानने में बड़ी तकलीफ होती है कि आज से पहले वो एक बहुत घटिया और बड़ा मूर्खतापूर्ण जीवन बिता रहा था। लेकिन कोई सुधार तुम्हारे जीवन में आ सके, इसके पहले तुम्हें मानना पड़ेगा न कि ज़िन्दगी घटिया जा रही है, बेमकसद जा रही है — न ओर है न छोर; न कोई तर्क है न तुक। अंधी बेहोशी में बस जिए जा रहे हैं। ये मानना पड़ेगा न। हमें ये मानने में बड़ी तकलीफ होती है। हम कैसे मानें कि हमने अपनी पिछली 20 साल की, 30 साल की, 50 साल की, 70 साल की ज़िन्दगी अंधी बेहोशी में गुज़ार दी है। तो हम मानते ही नहीं है, हम कहते हैं, “नहीं, हम ठीक ही जी रहे थे। 98.4 पर जी रहे थे, सामान्य थे।” हम मानते ही नहीं। जब तुम अभी तक ठीक ही जी रहे थे तो फिर अब तुम्हें किसी नए उपाय की, किसी नए रास्ते की ज़रूरत क्या है? भइया, जीते जाओ वैसे, जैसे जी रहे थे, मेरे पास मत जाओ। मेरे पास आओ तो पहले ईमानदारी से ये स्वीकार करके आओ, ये मान के आओ कि हाँ जीवन में समस्या है, जीवन में बड़ी नादानियाँ, बड़ी बेवकूफियाँ करी हैं। उसके बाद फिर यहाँ जो सुधार होगा, उस सुधार को तुम सम्मान दे पाओगे।

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