डिप्रेशन का पहला कारण है – कृत्रिम उपभोक्तावाद। वैज्ञानिक क्रांति के बाद उपभोग की वस्तुओं में बड़ी तेज़ी से वृद्धि हुई है। कुछ शातिर लोग हमें उन चीज़ों को चाहने पर मजबूर कर रहे हैं, जिन चीज़ों की कोई अहमियत नहीं है। चूँकि हम हर चीज़ पा नहीं सकते, इसीलिए फिर डिप्रेशन से घिर जाते हैं। डिप्रेशन का दूसरा कारण है – बोध का पतन। अगर हमारी ज़िंदगी में धैर्य, प्रेम, समझ, कर्मठता, ईमानदारी जैसे मूल्य नहीं हैं, तो हम चैन से नहीं रह सकते।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आज से पचास-साठ साल पहले एक मानसिक रोगी को जितनी ऐंग्ज़ायटी (उत्कंठा) महसूस होती थी, उतनी आज एक सामान्य युवा को महसूस होती है। आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि आपके अनुसार इसके कारण क्या हैं। और अगर हम इस समस्या का हल नहीं निकाल पाते हैं, तो हमारा भविष्य कैसा होगा?
आचार्य प्रशांत: बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। नाम क्या है तुम्हारा?
प्रश्नकर्ता: मोहित शर्मा।
आचार्य प्रशांत: मोहित ने कहा, “आज से पाँच दशक पहले जितनी ऐंग्ज़ायटी एक मानसिक रोगी को होती थी, उतनी ऐंग्ज़ायटी आज आम है – स्कूलों में, कॉलेजों में। और ये बात अनुमान के आधार पर नहीं है, ये आँकड़े हैं, ये नम्बर्स हैं, ये रिसर्च (अनुसंधान) है, ये डेटा (तथ्य) हैं। हम सब किसी-न-किसी तरीके से परेशान हैं, निराश हैं। कोई चिंता है, दिमाग पर बोझ है। ये बात कहने की नहीं है, ऐसा हो रहा है। परीक्षण करके अगर नापा जाए, तो हम सबका यही हाल निकलेगा। यहाँ भी यही हाल निकलेगा। कोई चीज़ है जो परेशान करे ही जा रही है, करे ही जा रही है। तो पूछा है कि बात क्या है? बात क्या है? दो पक्ष हैं उसके। दोनों को समझ लेंगे।




