शरीर भले बीमार हो, ज़िंदगी बीमार नहीं होनी चाहिए || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: मेरी उम्र अट्ठाइस वर्ष है, पिछले दस सालों से मेरा खराब स्वास्थ्य मेरे जीवन का केन्द्र रहा है। आचार्य जी, अक्सर स्वयंसेविओं के माध्यम से आपके जीवन के विषय में कुछ बातें सुनने को मिलती हैं कि किस तरीके से आप स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद भी जो करने योग्य है उसको करते रहते हैं। मेरा प्रश्न इसी सम्बन्ध में है कि क्या करें अगर स्वास्थ्य रोज़मर्रा के कामों में भी बाधा बनने लग जाए? अगर आपका स्वास्थ्य और शरीर धर्म के मार्ग पर बाधा बनने लग जाए?
तमाम डॉक्टर्स हैं, उनके पास भटकने के बाद पता चला कि मेरी जो बीमारी है वो बहुत हद तक साइकोसोमेटिक (मनोदैहिक) है। मैंने बीटेक आइआइटी रुड़की से किया है लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वो सारी मेहनत, सारा टैलेंट (प्रतिभा) जैसे बर्बाद ही हो रहा है। मुझे जो करना है उसे करने की प्रबल इच्छा है, लेकिन मेरा स्वास्थ्य इसमें आड़े आता है।
आचार्य प्रशांत: कब के पास आउट हो?
प्र: २०१४
आचार्य: देखो बेटा, ओलम्पिक्स का उदाहरण ले लेते हैं। एक जैवलिन थ्रोअर (भाला फेंक) हो, जैवलिन थ्रो जानते हो? क्या होता है जैवलिन थ्रो में? (इशारे से समझाते हुए) और एक टेबल टेनिस का खिलाड़ी हो, और एक भारोत्तोलक हो, एक हैवीवेट बॉक्सर (वज़नदार मुक्केबाज़) हो, और हॉकी टीम है, और रिले रेस (बदल दौड़) है, और टेनिस सिंगल्स (एकल) है और मिक्स्ड डबल्स (मिश्रित युगल) है। इनमें से किसी भी प्रतियोगिता को जीतो तो क्या मिलेगा? जो जीतेगा उसे क्या मिलेगा? तो स्वर्ण पदक ही मिलेगा न? और किसी भी प्रतियोगिता में मिला हुआ स्वर्ण पदक किसी भी अन्य प्रतियोगिता में मिले हुए स्वर्ण पदक के बराबर ही होता है न? बराबर ही होता है न?



