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तनाव‌ ‌और‌ ‌मनोरोगों‌ ‌का‌ ‌मूल‌ ‌कारण‌
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
17 min
309 reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि तनाव गलत जीवन जीने का परिणाम है। पर यदि मेरा जीवन ही गलत है तो मुझे हर समय तनाव क्यों नहीं रहता?

आचार्य प्रशांत: यह हर समय मौजूद होता है नहीं तो कभी-कभार परिलक्षित क्यों होता? आपके घर में कभी-कभार साँप दिखाई देता है तो इसका मतलब क्या वो बाकी समय होता नहीं है? होता है, बस छुपा हुआ होता है इसलिए आपको दिखाई नहीं देता है। अगर आपका तनाव लगातार नहीं होता तो बीच-बीच में प्रकट कहाँ से हो जाता? कुछ नहीं से कुछ तो पैदा नहीं हो सकता न! कारण से ही कार्य आता है। कई बार कार्य बिल्कुल दृश्य रूप में प्रस्तुत होता है और कई बार जो कार्य होता है वो पीछे जाकर कारण में समाहित हो जाता है।

जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना रह गया होता तो आप तनाव से मुक्त हो गए होते। क्योंकि तब आप तनाव से आज़ाद हुए बिना जी नहीं पाएँगे। हम गलत जीवन जी ही इसलिए पाते हैं क्योंकि गलत जीवन का दुष्परिणाम लगातार अपना अनुभव नहीं कराता। अगर कोई ऐसी व्यवस्था हो पाती कि जो गलत जीवन जी रहे हैं, उनको उसी समय तत्काल अपनी गलती का फल मिल जाता तो गलतियाँ होनी ही बंद हो जातीं।

ये दुनिया का खेल, ये सब मायावी कार्यक्रम चल ही इसलिए रहा है क्योंकि गलती करके भी हम सुख पाते हैं। यही तो दुनिया की धुरी है, इसी के इर्द-गिर्द दुनिया नाच रही है। इसी चीज़ ने तो दुनिया का समीकरण पूरा बिगाड़ रखा है। अगर ऐसा होता कि तुम गलत काम करते और उसकी सज़ा तुरंत पा पाते लेकिन ऐसा नहीं होता। हमें और ज़्यादा भ्रमित करने के लिए एक चीज़ और होती है। आप बिल्कुल सही काम करके भी दुःख पा सकते हो। यदि ऐसी व्यवस्था होती कि सब सही काम करके अनिवार्यतः सुख ही पाते तो सब सही काम करते।

यहाँ पर कर्म और कर्मफल का खेल थोड़ा उलझा हुआ है, आदमी की समझ से बाहर का है। इसलिए कृष्ण ने कहा है, तुम कर्म और कर्मफल में मत उलझना बल्कि तुम कर्मफल की परवाह ही मत करना। कर्मफल कर्म से सीधे-सीधे आनुपातिक है, यह तुमको सदा प्रत्यक्ष नहीं दिखेगा। तुमने यदि कर्मफल के आधार पर कर्म चुनना शुरू कर दिया तो तुम बड़ी मुसीबत में फँस जाओगे क्योंकि गलत काम करने पर सुख मिल रहा है और सही काम करने पर दुःख मिल रहा है। अब तो तुम गलत कर्म का ही चयन करोगे। तुम देखोगे अपने चारों तरफ़ और कहोगे कि जो घटिया काम कर रहे हैं, केवल वही सुखी नज़र आ रहे हैं।

जब श्रीमद्भागवत् गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्मफल मुझे समर्पित होकर कार्य करो तो उसका अर्थ यही है, मुझे दे दो और तुम भूल जाओ। तुम तो सही कर्म करो, अंज़ाम की बात छोड़ो। परिणाम का ख्याल करने लग गए, तौलने लग गए, नापने लग गए कि क्या पाया और क्या खोया। कितना मिला, कितना गँवाया तो फिर तुम अनिवार्यतः गलत काम ही चुनोगे। माया ने समय का खेल चला रखा है।

समय का वास्तविक मतलब जानते हो?

कारण और कार्य के बीच की दूरी। जो तुम काम करते हो, उसका वास्तविक अंज़ाम मिलने में समय लग जाता है। इससे हमें लगता है कि काम तो घटिया करा और अंज़ाम बहुत बढ़िया मिला जैसे चोरी की और कितने पैसे आ गए।

यदि तुमने काम घटिया करा है तो उसका अंज़ाम निश्चित रूप से घटिया होगा, हाँ पर उसके अनुभव में समय लग सकता है। जिस क्षण तुमने गलत काम किया, उसी क्षण सजा तय हो गयी। लेकिन तुम सजा का अनुभव करोगे, उसमें अभी समय लगेगा। ये समय ही हमें धोखा दे जाता है, हमें लगता है कि सजा तो मिली ही नहीं। सज़ा जरूर मिलेगी, थोड़ा समय लगेगा। अगर तुम थोड़े संवेदनशील आदमी हो तो तुम जल्दी समझ जाओगे कि सज़ा मिल गई। तुम जितने ज़्यादा मोटी चमड़ी के आदमी हो, तुम्हें उस सज़ा का अनुभव करने में उतना ज़्यादा समय लगेगा। लेकिन मोटी चमड़ी का होना अपने आप में एक सज़ा है। तो बताओ सज़ा देर से मिली या ज़ल्दी मिल गयी।

मूलतः एक ही तनाव होता है। कुछ है तुम्हारे भीतर जो जाना चाहता है सच की तरफ़ और कुछ है तुम्हारे भीतर जो उसे जाने नहीं देता। इसी का नाम तनाव है। ये तो जानते ही हो कि तनाव के लिए दो विपरीत ताकतों का होना ज़रूरी है। हम सबके भीतर वो दोनों ताकतें मौज़ूद हैं इसलिए हम सब ही तनाव के पुतले हैं। तनाव मनुष्य की अनिवार्यता है क्योंकि उसे दो विरोधी चीज़ें अपनी-अपनी दिशा में खींच रही हैं। सोचो तुम्हारे दिल के दो फाड़ हो गए हैं, एक हिस्सा इधर को जा रहा है और एक हिस्सा उधर को जा रहा है। आदमी इसी तनाव का ही नाम है।

ये तनाव दो-तीन तरीकों से दूर किया जा सकता है। पहला सुविधाजनक तरीका है कि जो तुम्हें सच की ओर खींच रहा है, वो तुम्हें कहीं बहुत दूर ले जाना चाहता है। तो तुम कहो कि उतनी दूर कौन जाए, तुम अपने जीवन में उसी ताकत को जीत जाने दो जो तुम्हें तुम्हारे बहुत करीब के झूठ से बाँध रही हो। सच और झूठ की लड़ाई में तुमने झूठ को जिता दिया और तनाव दूर हो गया। झूठ को जिताना ज़्यादा सरल है क्योंकि सच दूर का है और झूठ करीब का है। सच कमाना पड़ता है और झूठ हम लेकर पैदा होते हैं।

सच अविश्वसनीय है, अकल्पनीय है, अप्रत्याशित है, अदृश्य है। झूठ सामने का है, प्रकट है। झूठ सप्रमाण है, सच अप्रमेय है। झूठ को जिताने के लिए हमारे पास कई तर्क हैं और सच सब तर्कों से परे है। झूठ को जिताना ज़्यादा आसान है। तुम अपनी ज़िन्दगी में झूठ को जिता दो, तनाव कम हो जाएगा। ज़्यादातर लोग यही तरीका निकालते हैं। तुम प्रायः देखते ही होगे कि कितने सारे घूम रहे होते हैं। वो ठट्टे मारकर हँस रहे हैं। बिल्कुल सुख-विभोर लग रहे हैं। तुम्हें ये भी पता है कि वो आदमी एकदम सड़ी-गली ज़िन्दगी जीता है, एकदम दुष्ट-दुरात्मा है। उसके अंतर्जगत में सनांध भरी हुई है, एकदम घटिया ज़िन्दगी जीता है। फिर भी तुम देखते हो कि उसके गाल लाल हैं, उसकी खाल चमक रही है। वो बार-बार अपनी तौंद पर हाथ मारकर ठट्टा मारते हुए हँसता है। उसके पास सब तरह की सुख-सुविधाएँ हैं। वो आत्मविश्वास से भरपूर है। वो दूसरों को भी ज्ञान बाँटता फिरता है। एक ये तरीका है सुख अर्जित करने का। तुम अपनी ज़िन्दगी से सच को बिल्कुल ही प्रतिबंधित कर दो, तनाव मिट जाएगा। एक प्रतिशत भी सच नहीं चाहिए जीवन में, तनाव बिल्कुल मिट जाएगा।

अभी लोकडाउन के दिनों में टेलीविज़न पर रामायण का पुनः प्रसारण हो रहा था। किसी ने मुझसे कहा, पूरी रामायण में न राम को एक भी बार ठट्टा मारकर हँसते हुए देखा और न ही लक्ष्मण को, न सीता को। जबकि जितने भी राक्षस आते हुए दिखाई देते हैं, वो सभी अट्टहास करते हुए दिखाई देते हैं। यदि आप रामायण को देखने के बजाय सिर्फ़ सुन भी रहे हों, तब भी आप समझ जाएँगे कि मंच पर किसी राक्षस का प्रवेश हुआ है। कैसे? वो हा-हा-हा..... करता हुआ ही प्रवेश करेगा। अब देख लो, दुनिया में ज़्यादातर लोग किस तरह के हैं, रामचंद्र की तरह सुमधुर, गंभीर या ठहाके मारते नज़र आते हैं हर समय। ये हमेशा से राक्षसों की पहचान रही है हमेशा से। क्या? उन्हें हँसी बहुत आती है। उनकी हँसी ही उनका ट्रेडमार्क रहती है। उनकी हँसी बड़ी बेवकूफ़ी भरी होती है। देखते नहीं हो, युद्ध हो रहा है, वो खड़े हुए हैं राम के आगे-लक्ष्मण के आगे। उनके हथियार भी काट दिए गए हैं, वो तब भी हँस रहे हैं। वो इतने मूर्ख हैं कि उनको इतना भी समझ नहीं आ रहा है कि अगला बाण उनका गला काटने वाला है। वो तब भी हा-हा-ही-ही कर रहे हैं। चाहे वो राक्षस हों या राक्षसियां हों, तड़का को देखा था, वो क्या कर रही थी? गला फाड़ के हँस रही थी।

राम-लक्ष्मण तुम्हें हँसते हुए नहीं दिखाई दिए तो कहीं पर उनका कुरूप चेहरा भी नहीं दिखाई दिया। राक्षस एक पल तो हँस रहे होते हैं और अगले ही पल उनकी शक्ल कैसी होती थी? खूँखार, हिंसक। और फिर जब बाण लग जाता था तो एक नई शक्ल होती थी। ये आम आदमी की कहानी है। राक्षसों की ज़िन्दगी में शायद कोई तनाव नहीं रहता होगा। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी से राम को अलविदा कर दिया था। वो तो राम के ख़िलाफ़ ही खड़े हो गए थे। बस वो हर समय हँसते ही रहते थे। जिन्हें हर समय हँसना हो, वो राक्षस हो जाएँ। इसी को ऐसे भी कह सकते हो कि जो हर समय हँसते ही नजर आ रहे हों, वो राक्षस ही हैं। जिन्हें बहुत हँसी आती हो, उन्हें राक्षस योनि का ही जानना।

ये नया-ताजा रिवाज़ पूरब में डाला गया है कि हँसो। नहीं तो पूरब में, कम से कम भारत में ये प्रथा कभी नहीं रही कि ठट्टा मारकर हँसो। भारत सौम्य रहा है, मृदुल रहा है, गंभीर रहा है। क्यों? क्योंकि भारत ने राम को पूजा है, जीवन से राम को विदा नहीं किया है। जब तुम जीवन से राम को विदा कर देते हो, तो तुम्हें बड़ा सुख प्रतीत होता है। तुम्हें अचंभा हो रहा होगा कि ऐसा नहीं हो सकता, राम के बिना तो दुःख ही होगा। नहीं भाई, ऐसा नहीं है, देखो न राक्षसों को। उन्होंने राम को विदाई दे दी, तुम्हें वो दुखी नज़र आ रहे थे। वो हर समय मस्त माँस खा रहे होते थे और हँस रहे होते थे। माँस खाओ और हँसो। चिकन खाओ और अट्टहास करो। जितने जानवर मिलें, खाते जाओ, हँसते जाओ। माँसभक्षी हो जाओ, देहभक्षी हो जाओ। देहभक्षी होने का मतलब जितने पदार्थ मिलें, उन सबका भक्षण करते जाओ। दुनिया की सारी चीज़ों का भक्षण करते जाओ और जोर-जोर से अट्टहास करते जाओ। जो भोग करे और जोर से हँसे।

(व्यंग्य करते हुए)

लाइए-लाइए, दो समोसे और लाइए, लाइएगा जरा चिकन लेग पीस और खाकर अट्टहास कर रहा है। इसी को राक्षस बोलते हैं। ऐसों का ही वध करने के लिए राम अवतरित होते हैं। ऐसों के लिए ही श्रीकृष्ण बोलते हैं:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा$$त्मानं सृजाम्यहम्।।

अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

(~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय-४, श्लोक-७)

बात समझ में आ रही है?

तनाव जीवन से हटाने का एक तरीका यही है कि तुम राक्षस हो जाओ, बड़ी हँसी में जियोगे, हर समय हँसी-ही-हँसी रहेगी तुमको। देखते नहीं हो लोगों के फोटो वगैरह! कोई होता है जो तुम्हें अपनी गम्भीर छवि दिखाना चाहे, कोई नहीं होता। कोई अपनी सहज, साधारण या सामान्य छवि नहीं दिखाना चाहता। सब तुम्हें अपनी कैसी तस्वीर भेजते हैं? दाँत फाड़ रहे हो, अट्टहास कर रहे हो। यदि तस्वीर में दांत न दिखाओ तो लगता है कि इसकी ज़िन्दगी में कुछ छूट गया, अच्छे से जीवन को भोग नहीं पाया। कुछ कमी है, ये पिशाच या राक्षस योनि की निशानी है।

तनाव कम करने का दूसरा तरीका है पाखण्ड। दो चीज़ें तुम्हें विपरीत दिशाओं में खींच रही थीं। तुमने दोनों को आधा-आधा दे दिया। तनाव अब नहीं रहेगा। किसी रस्सी के दोनों सिरों को खींचा जा रहा है, उस रस्सी को ही बीच से काट दो। अब तनाव नहीं बचेगा। ये तरीका भी बहुत लोग आजमाते हैं। वो आधे सच के हो जाते हैं और आधे झूठ के हो जाते हैं। वो सुबह - सुबह बैठकर ध्यान लगाते हैं, क्रिया करते हैं, न जाने किस-किस तरह के पाखण्ड करते हैं और उसके बाद दुकान में-बाजार में जाकर के तमाम तरह के काण्ड करते हैं। वो नौदुर्गा के दिनों में कहते हैं कि इन दिनों हम चिकिन-मटन नहीं खाएंगे और उसके बाद वो..... । ये पाखण्ड का तरीका है कि आधे-आधे बंट जाओ। दफ़्तर यदि घूस लेने भी जा रहे हो तो दही शक्कर खाके जाओ।

(व्यंग्य करते हुए) अरे क्या हो रहा है? पतिदेव दफ़्तर की ओर निकल रहे हैं, इन्हें दही-शक्कर चटाना है। और दफ़्तर में जाकर ये करेंगे क्या? घूस खाएंगे।

ये पाखण्ड है कि एक तरफ़ धार्मिक भी कहला रहे हैं और दूसरी तरफ़ सारे पाप भी करे जा रहे हैं। ये तरीका भी बहुत लोग आजमाते हैं। इससे ये होता है कि तुम बच जाते हो अपनी नज़रों में राक्षस होने से। जब तुम खुलेआम राम के ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हो तो फिर तुम पर एक बंदिश लग जाती है, क्या? तुम्हें ये कहना पड़ेगा कि तुम राक्षस हो।

दूसरा तरीका इस मामले में ज़्यादा उपयोगी है। तुम अब अपने आप को सम्माननीय बोल सकते हो। तुम साल में एक-दो बार मन्दिर हो आते हो, एकाध बार तीर्थ भी कर आते हो, तुम जाकर किसी मन्दिर में चंदा दे आते हो। तुमने अपने जीवन का कुछ हिस्सा सत्य या धर्म को दे रखा है और बाकी हिस्सा दे रखा है.... अब तुम तनाव में नहीं रहोगे। तुम कहोगे, करता हूँगा मैं बहुत काली करतूतें पर मैं ध्यान भी तो लगाता हूँ। मैं पूरे हफ्ते नारकीय जीवन जीता हूँ पर मैं हर शनिवार को मन्दिर भी तो जाता हूँ। मेरे मन में तमाम तरह की विकृतियाँ होंगी, मलिनताएँ होंगी लेकिन मैं सब धार्मिक रस्मों-रिवाजों का पालन तो करता हूँ। ऐसे बहुत लोग मिलेंगे तुम्हें। ये लोग अपनी ही नजरों में खूब बढ़े-चढ़े रहते हैं। ये मानेंगे ही नहीं कि इन्होंने भीतर एक पाखण्ड रच रखा है। एक मामले में ये राक्षसों से भी ज़्यादा टेढ़ी खीर होते हैं। राक्षसों को तो राम सद्गति देते गए। क्योंकि राक्षसों में इतनी ईमानदारी थी कि वो सीधे-सीधे राम के विरुद्ध जाकर खड़े हो गए। रावण ने भी यही कहा, “हम रावण हैं, हमारी ख़ातिर नारायण को स्वयं उतरना पड़ा धरती पर। नारायण आए हैं, अब हमें मुक्ति देकर जाएँगे।”

पूरी रामायण, महाभारत या किसी अन्य धर्मशास्त्र में ऐसा उल्लेखित नहीं है कि ये जो पाखंडी किस्म के धूर्त लोग होते हैं, इन्हें किसी ने मुक्ति दी हो। वे लोग जो आधे-आधे बंटे होते हैं, ये दिन में राम के होते हैं और रात में काम के होते हैं। इनके आगे कोई राम या कोई कृष्ण सफल नहीं हो पाता। जब राम इनके सामने आएँगे तो ये तुरंत राम के पाँव पर लोट जाएँगे। कोई ज्ञानी या ऋषि या गुरु इनके सामने आ जाए तो ये तुरंत उसकी वन्दना शुरू कर देते हैं, “आपकी बात बिल्कुल सही है।” जैसे ही वो ज्ञानी या ऋषि या गुरु इनके सामने से हटे, ये फिर अपनी घटिया हरकतों में तल्लीन हो जाते हैं। वास्तव में ये दोनों तरफ़ के हैं। इन्होंने बड़ी ज़बर्दस्त चाल चली है। ये कहते हैं, जिधर जिसका पलड़ा भारी देखेंगे, उधर के हो जाएँगे। दीवाली के दिन दीप जला लेंगे और दीवाली बीतते ही पशु हत्या कर लेंगे, प्रकृति का, लोगों का असहायों का उत्पीड़न कर लेंगे। तमाम तरीके के भोग कर लेंगे। इनसे निपटना बड़ा मुश्किल है। रामायण में भी इतना ही दिखा दिया कि राक्षस को मार दिया, पाखंडी से निपटना बड़ा मुश्किल काम है। पाखंडी से निपटने के लिए तो बहुत ही विशिष्ट अवतार चाहिए। पाखंडियों में तो ये ताकत होती है कि वो बड़े-बड़े ज्ञानियों को- ऋषियों को हरा दें, पैगम्बरों को मिटा दें।

जीसस को उनके दुश्मन ने थोड़े ही हराया था। कोई राक्षस थोड़े ही आया था। राक्षस में एक बात बहुत मासूमियत की होती है। वो खुलकर विरोध में खड़ा हो जाता है। जीसस को उनके ही एक शिष्य ने बेंच दिया था चांदी के तीस सिक्कों के एवज। जुडास को जीतना बहुत मुश्किल है। राम रावण से जीत गए पर जीसस जुडास से हार गए, कम-से-कम शारीरिक तौर पर। अंततः विजय जीसस की है, पर वो बात दूर की है। ये जुडास केवल ऊपरी तौर पर ही जीसस का था पर अंदर ही अंदर ये बिका हुआ था।

तो इस तरह मैंने दो तरीके बताये तनाव कम करने के। अब तीसरा तरीका तनाव कम करने का। वास्तव में ये इतनी सीधी-सहज बात है कि मैं इसको तरीका भी क्यों बोलूँ। जिसके हो, उसके हो जाओ भाई। कोई तनाव नहीं रहेगा। ये सबसे सरल तरीका है। हाँ, यदि तुम्हारी बुद्धि अगर भ्रष्ट हो तो तुम्हें ये तरीका सबसे मँहगा लगेगा। है ये तरीका सबसे आसान। तुमको बाकी दोनों ही तरीके खूब सुहाएँगे।

तुमने कहा है, तनाव रहता है। मैंने तुम्हें तनाव कम करने के तीनों तरीके बता दिए, अब चुनाव तुम्हारा है, तुम्हें जो तरीका चुनना हो, चुन लो।

वो उधर से (एक श्रोता की तरफ़ इशारा करते हुए) देखकर पूछ रहे हैं कि क्या पहले दो तरीकों में तनाव वास्तव में कम होता है? इतनी ज़ोर से वो राक्षस हँसते क्यों यदि उनमें छुपा हुआ तनाव न होता? मैंने बोल तो दिया कि तीन तरीके हैं तनाव कम करने के पर हकीकत में है एक ही तरीका। कौन सा? जो तीसरा बताया मैंने। पहले दोनों तरीकों से झाँसे में मत आ जाना। कोई बहुत जोर से हँसेगा क्यों यदि उसके भीतर तनाव नहीं है। कोई यदि हर समय दांत फाड़े हँसता हुआ ही नजर आता हो तो समझ लो इसके भीतर तनाव बहुत है। छुपा रहा है कुछ ये। तनाव है, दुःख है, संशय है, डर है। नहीं तो ज़रुरत ही क्या है इतना दाँत दिखाने की। कई तो सोते भी हँसते हुए हैं, आदत लग गई है। चेहरा ही बिगड़ गया है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि रोते रहो। हँसना और रोना तो एक ही सिक्के के पहलू हैं। मैं सहजता की बात कर रहा हूँ, सहज रहो। सहजता में ही सौन्दर्य है। जो ये दूसरी कोटि के दो फाड़ जीवन जीने वाले लोग होते हैं, आधे इधर के – आधे उधर के। ये ऊपर–ऊपर तो तनावमुक्त रहते हैं और भीतर ही भीतर ये कँपे हुए होते रहते हैं बिल्कुल। क्योंकि इन्होंने चोरी करी है बिल्कुल। इन्हें डर लगता रहता है कि दोनों तरफ़ से पिटेंगे। इधर बांये वाले को इन्होंने बता रखा है कि हम पूरी तरह तुम्हारे हैं और दांए वाले को बता रखा है कि हम पूरी तरह तुम्हारे हैं।

राक्षस का तो एक ही दुश्मन है, राम। पाखंडी के तो दो दुश्मन हैं, राम भी और माया भी।

इसने राम के साथ भी बेईमानी करी है और माया के साथ भी।

राक्षस ने कम से कम माया के साथ वफ़ादारी तो करी है। पाखंडी तो दोनों तरफ़ से पिटने के डर में जीता है। तरीके मैंने तीन बताए पर वास्तव में तरीका एक ही है और बाकी आपकी बुद्धि पर है।

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