
प्रश्नकर्ता: हेलो सर, नमस्ते। मेरा नाम पूजा है। मैं यूपी, मेरठ से हूँ। सर, मैंने आपको बेसिकली तीन साल पहले सुनना शुरू किया था और सर, आपने बचा लिया। मतलब मुझे लगता है कि, मतलब, मेरी फैमिली बेसिकली गाँव से आती है, बिलॉन्ग करती है, जिसमें माना जाता है कि लड़की 20 की हुई कि शादी कर दो। लेकिन मैंने आपको सुनना स्टार्ट कर दिया, तो मतलब बहुत हिम्मत आई। घर से बाहर निकली, मेरठ से देहरादून आई। अकेले आना मतलब बहुत मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे डर खत्म हुआ। बहुत ज़्यादा चीज़ें सही हुईं। जॉब करने लगी।
बचपन से मन था कि फिजिकल एक्टिविटीज़ में जाऊँ, स्पोर्ट्स में जाऊँ, लेकिन वही गाँव का परिवेश था, तो जा नहीं पा रही थी। जा नहीं सकते। शहर दूर है, हर चीज़, और कुछ रिस्ट्रिक्शंस होते हैं कि लड़की हो, शादी कर लो, बस घर बसा लो। ये सब चीज़ें होती हैं। लेकिन आपको सुना, तो सच में बहुत सारी चीज़ें हुईं। वरना ऐसा होता कि सच में दो बच्चे होते मेरे पास अब, मैं जॉब-वॉब कुछ नहीं कर रही होती और बस वही होता।
तो सर, मेरा बेसिकली क्वेश्चन ये है कि जैसे कि मैं देहरादून में हूँ। तो यहाँ पर लगभग डेली सुनने को मिल रहा है कि आसपास क्राइम हो रहे हैं। खुल्लम-खुल्ला कोई किसी को मार दे रहा है। और यहाँ के जो स्टूडेंट्स हैं, यहाँ पर बेसिकली बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ने आते हैं, लेकिन बहुत ज़्यादा ड्रग्स वग़ैरह के बारे में सुनने को मिलता है कि यहाँ पर बहुत ज़्यादा नशा फैला हुआ है। तो सर, एक तरफ़ तो देहरादून शहर मतलब लोगों को अपनी तरफ़ अपनी सुंदर चीज़ों के लिए अट्रैक्टिव... मतलब, प्रकृति की गोद में बसा हुआ एक प्यारा शहर है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ स्टूडेंट्स आते हैं, जिनके अंदर बहुत टैलेंट भी होता है, लेकिन वो यहाँ आकर नशा वग़ैरह में डूब जाते हैं, या बहुत ज़्यादा क्राइम होने लगा है। तो सर, इसी के ऊपर क्वेश्चन था।
आचार्य प्रशांत: देखिए, नशा माने क्या होता है? नशा माने बेहोशी होता है। ठीक? एकदम सीधे-सीधे समझ लेते हैं।
होश जब बुरा लगता है तो आदमी को नशा करना ही पड़ेगा।
होश क्या चीज़ होती है? ठीक है? अब आपने सवाल ऐसा पूछा है कि समझाना पड़ेगा। होश का मतलब होता है, मैं और मेरे द्वारा देखा जा रहा संसार। जब ये दोनों होते हैं, तो आप कहते हैं, होश है। ठीक है न? ये दुनिया है। मुझे पता चल रही है इन दुनिया। तो आप कहते हो, इंसान होश में है। इसे दुनिया पता चल रही है। तो होश के हमेशा दो छोर होते हैं। वो संसार, ये अहंकार, और यह अहंकार है, जिसे यह संसार अभी अनुभव हो रहा है। इसको हम कहते हैं होश, कॉन्शियसनेस। द ईगो एक्सपीरियेंसिंग द वर्ल्ड। इसे कॉन्शियसनेस बोलते हैं।
होश अहंकार को ही बर्दाश्त नहीं होगा, अगर वह फूला बैठा है, अगर वह गड़बड़ बना बैठा है। हममें से ज़्यादातर लोग, जब होश में होते हैं न, तो बड़ी बेचैनी में होते हैं। बड़े दुख में होते हैं। हम कहते हैं, इससे अच्छा यह है कि नशा कर लो। कई तरह के नशे, सिर्फ़ वही नहीं कि शराब या ड्रग्स का नशा। अच्छा, आपके साथ हुआ होगा कभी। तनाव जब बहुत बढ़ जाता है, तो आप कहते हो न कि चलो, सोने चले जाएं।
प्रश्नकर्ता: यस सर। या सोशल मीडिया चला लो, इंस्टाग्राम चला लो।
आचार्य प्रशांत: हाँ।तो क्यों? क्योंकि होश बर्दाश्त नहीं हो रहा होता तो आप कहते हो, सो ही जाओ। सोने से होश चला जाएगा। होश झेला नहीं जा रहा, चलो, सो ही जाते हैं वो बेहतर है। तो हर आदमी होश से भागने की कोशिश तो करता ही है। क्यों करता है? क्योंकि हमने अपनी ज़िंदगी ऐसी कर ली है कि उसमें होश में रहने का मतलब होता है दुख में रहना। तो आदमी फिर बेहोशी की तरफ़ भागता है।
बेहोशी सोने से मिल सकती है, इंस्टाग्राम से मिल सकती है, शॉपिंग से मिल सकती है, फ़ास्ट ड्राइविंग से मिल सकती है, मूवी देखने चले गए, उससे मिल सकती है, गॉसिप कर ली, उससे मिल सकती है, या फिर सिगरेट, शराब, जो भी आप और करना चाहते हो नशे उससे मिल सकती है। नशे की ज़रूरत ही इसलिए पड़ती है क्योंकि हमारी ज़िंदगी गड़बड़ है। नशे की ज़रूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि जिसको हम अपनी होश की हालत कहते हैं, वो होश की हालत ही गड़बड़ है।
क्योंकि हम अपने होश के केंद्र में होते हैं और हमने ही अपने चारों तरफ़ अपने लिए दुख और बेचैनी का जाल बुन रखा होता है। तो फिर आप नशे की ओर भागते हो, क्योंकि ये जाल बर्दाश्त नहीं हो रहा, आप फंस गए हो इसी में। जैसे कहते हैं न कि कई बार मकड़ी अपने ही जाले में फंस जाती है। वैसे ही अहंकार, जो अपने चारों तरफ़ संसार रचता है, उसी में फंस जाता है। अब कहता है, जिया नहीं जा रहा, जिया नहीं जा रहा। तो कहता है, चलो किसी तरह का कोई नशा करते हैं।
कोई पावर का भी नशा करता है, कोई प्रसिद्धि का भी नशा करता है, हर तरह के नशे होते हैं। धर्म के भी नशे होते हैं कि ज़िंदगी में कुछ नहीं है, तो चलो तीर्थ कर आते हैं। हर तरह के नशे होते हैं। इतने तरह के नशे करने से बेहतर यह नहीं है कि ज़िंदगी सुधार लो।
ज़िंदगी जब तक गड़बड़ रहेगी, नशे की ज़रूरत पड़ेगी ही पड़ेगी। अब एक जवान आदमी है, आप युवाओं की, स्टूडेंट्स की बात कर रहे हो। उसके पास इतनी ऊर्जा है और उसके पास इतना समय है, उसके लिए आगे ज़िंदगी पूरी खुली पड़ी हुई है। पर वो कुछ जानता ही नहीं कि वो कौन है और उस ऊर्जा का, समय का, ज़िंदगी का करना क्या है। तो वो घबराता है, उसे तनाव होता है, उसे समझ में नहीं आता, मैं हूँ कौन? मैं ज़िंदा क्यों हूँ और मुझे आगे करना क्या है? मैं अभी भी जो कर रहा हूँ, मैं क्यों कर रहा हूँ? और उसे कोई जवाब नहीं मिलते अपने इन सवालों के। ये सवाल जो हैं, उसको होश में खाने लग जाते हैं। तब वह किसी तरह के नशे की ओर भागता है।
ज़्यादातर लोग नहीं करते शराब वगैरह का नशा। ज्यादातर लोग दूसरे तरह का नशा कर लेते हैं कि फोन घुमा दिया और दो घंटे किसी से बात कर रहे हो; यह भी नशा है। या ज़बरदस्ती ज़्यादा सो रहे हो; यह भी नशा है। या जब भूख नहीं लगी है, तब भी खा रहे हो; यह भी नशा है।
ये सारे नशे सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि ये जो जवानी है, उसे सही दिशा नहीं मिल रही है। उसे सही दिशा दे दो, जिसमें वो अपनी ऊर्जा लगा सके। उसे किसी नशे की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
इसीलिए स्कूलों में, कॉलेजों में, एजुकेशन ऑफ द सेल्फ होनी चाहिए। कितने ही कॉलेजेस शिकायत करते हैं कि हमारे कैंपस पर ड्रग मेनेस है, ड्रग एब्यूज़ है, ड्रग्स की समस्या है। क्या करें? क्या करें? उसका समाधान करिकुलम में है। इतनी चीज़ें पढ़ाते हो, मैं कौन हूँ? यह भी पढ़ाने लग जाओ कैंपस पर नशे की समस्या कम हो जाएगी।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, सर।