प्रश्नकर्ता: सर, बचपन से सुनते आए हैं ‘स्वयं से पहले सेवा’। पर यहाँ आकर सुना कि ‘सेवा से पहले स्वयं’। तो सर ये…
आचार्य प्रशांत: तो फँस गए!
प्र: हाँ, सर।
आचार्य: बैठो। बात ठीक है। भ्रम पैदा होना लाज़मी है। सेवा करेगा कौन? अब छह लोग तुम्हारे आसपास सोए हुए हैं और तुम भी सोए हुए हो और तुम उनकी सेवा करना चाहते हो। कर सकते हो? दूसरों की मदद कर लो। पर दूसरों को जगा सको इसके लिए क्या ज़रुरी है?
श्रोतागण: (एक स्वर में) पहले ख़ुद जाग जाओ।
आचार्य: पहले ख़ुद जगना होगा। पर हमें बड़ा उल्टा हिसाब पढ़ाया गया है। हमें कहा गया है कि “तुम जैसे हो वैसे ही रहो और दूसरों के काम आ जाओ।”
मैं ख़ुद बीमार हूँ। मैं दूसरों को स्वास्थ्य दे सकता हूँ क्या?
श्रोतागण: नहीं, सर।




