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मेरी मर्ज़ी मैं कुछ भी करूँ || (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इंसान में इतना आजकल अपने आप को प्रूव (साबित) करने का इतना जोश क्यों होता है, कि दुनिया को प्रूव करके दिखाना है कुछ? मतलब जैसे आजकल टीवी पर भी देखते हैं, तो मैं एक शो में गया था; उसका ऑडिशन देने गया था, एम.टीवी पर आता है, रोड़ीज़, उसमें पूछता है, "आप क्यों बनना चाहते हो?" आजकल नौजवान पीढ़ी सब बहुत देखते हैं ये एम.टीवी या ये। "तो क्यों बनना चाहते हो?" वहाँ लोग कहते हैं, "मुझे दुनिया को प्रूव करना है, सोसाइटी (समाज) को प्रूव करना है, ये करना है।" तो क्यों इतना होता है कि प्रूव करना है? कोई आपको कह दे कि, "तू छोटा है, तू नहीं कर सकता!" तो इतना गुस्सा आता है कि, "हाँ भाई तेरे को दिखा दूँगा!"

आचार्य प्रशांत: ज़ाहिर तो है न! जब तुमको खुद विश्वाश नहीं है अपने ऊपर, तो तुम चाहते हो कि दूसरे तुमको विश्वास दिलाएँ कि तुम ठीक हो। तुम्हें खुद पता हो कि तुम ठीक हो या ऊँचे हो या पूरे हो या मस्त हो, सुंदर हो, तो तुम दूसरों से नहीं जाओगे न सत्यापन माँगने, वैलीडेशन (सत्यापन) नहीं माँगोगे न फिर? पर खुद ही अंदर एक खोखलापन है तो जा-जाकर के दूसरों से चाहते हो कि वैलिडेशन मिल जाए, कि कोई दूसरा बोल दे कि “हाँ, हाँ बड़े अच्छे हो, बड़े प्यारे हो, वाह साहब आप तो शानदार हो, आपका जवाब नहीं।“ हकीक़त क्या है? तुम्हें अंदर-ही-अंदर पता है कि तुम एक नंबर के घोंचू हो। जो जितना घोंचू होगा, उसे उतना ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी दूसरों से तारीफ़ पाने की, कि दूसरे मुझे प्रूफ कर दें या अप्रूव (अनुमोदित) कर दें; जो भी।

एकदम सीधी सी बात नहीं है? अगर मुझे पता है मैं ठीक हूँ, पूरा भरोसा है, तो मैं इधर-उधर जा करके दूसरों से गवाही थोड़े ही माँगूँगा, कि, "तुम आओ मेरे पक्ष में खड़े हो जाओ, समर्थन कर दो, या “ व्हाट डू यू थिंक अबाउट इट ? (तुम इस बारे में क्या सोचते हो?)" पर हमारी विडंबना ये है कि जो ज़िंदगी के हमारे एकदम मूल, हार्दिक, कोर मसले होते हैं, हमें उनमें भी अपना कुछ पता नहीं होता तो वो चीज़ें भी हम दूसरों से पूछ रहे होते हैं।

“भाई-भाई, ये-ये इस बंदी से आजकल चल रहा है मेरा।” यंग (जवान) लोगों की बात कर रहे हो न! उनकी भाषा में; इनका चल रहा है। "ये तेरे को कैसी लगती है? ठीक लग रही है।" और चार ने अगर बोल दिया कि भाई माल मस्त है। इसी भाषा में बात होती है बिलकुल यही है; भाई माल मस्त है, तो इनको एकदम मज़ा आ जाएगा और ये कूद पड़ेंगे कि, "एकदम कुछ मैंने आज कुछ तीर ही मार दिया दुनिया में।"

ये इनके प्रेम की गुणवत्ता है, ये प्यार भी दूसरों को दिखाकर और दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं कि, "देखो मेरे साथ ये चल रही है *आइटम*।" बंदियों का भी ऐसे ही होगा; उनका भी कि "देखो ये वाला है; बहुत बढ़िया, सही चीज़ पकड़ी है, मोटा असामी है।"

ख़ुद का अगर पता हो तो आदमी को इन सब बेवकूफ़ियों में नहीं उलझना पड़ता, उसी को शास्त्रीय भाषा में आत्मज्ञान बोल देते हैं। पर जब आत्मज्ञान बोला जाता है तो आप लोगों को लगता है कि ये कुछ टीका, तिलक और जनेऊ इत्यादि की बात हो रही है और इसमें कुछ पुरानी चीज़ आ गई, बैलगाड़ी आ गई। आत्मज्ञान बोल दिया “ ओ माय गॉड ! शू शू शू…”

आत्मज्ञान का यही मतलब होता है कि तुम्हें अपनी खबर पता है, तुम्हें पता है कि तुम डरे हुए हो। ये तुम जिसकी ओर जा रहे हो न, तुम्हें उससे प्यार नहीं है; वास्तव में तुम्हें उससे डर लगता है। लेकिन हमें नहीं पता होता कि हमारे ही भीतर क्या चल रहा है। हम सबसे ज़्यादा अपने ही प्रति अज्ञानी होते हैं, इग्नोरेंट (अनभिज्ञ) होते हैं। बाहर की चीज़ का तो तुम्हें कुछ नहीं भी पता तो वो तो चल जाएगा; गूगल है न! कर लो गूगल, बाहर का सब पता चल जाता है। पर अपना ना पता हो तो कौन बताएगा तुमको? तुम बोल दोगे कि तुमको प्यार हुआ है, जबकि तुम्हें प्यार हुआ ही नहीं है; वो चीज़ ही कुछ और है। लेकिन तुम वाकई नहीं जानते कि तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है। तुम्हें लग रहा है, "मुझे तो प्यार हो गया, मुझे तो प्यार हो गया!"

और जब युवा लोगों के साथ बात करता हूँ, और बात गहराई की ओर जाने लगती है तो वो अक्सर, उनसे अगर कुछ पूछो कि, "अच्छा ऐसा क्यों है?" तो वो बस ऐसे ही करेंगे, "होता है न!" शोल्डर शक (कंधे उचकाना)। “बस यूँ ही, जस्ट लाइक दैट * ।" मैं बोलता हूँ, "देखो बेटा, * जस्ट लाइक दैट कुछ नहीं होता; हर चीज़ के पीछे कुछ होता है", वो बोलते हैं, "आप ऐसा क्यों बोलते हैं, हर चीज़ के पीछे कुछ होता है? कुछ ऐसे भी तो हो सकता है न!” नहीं हो सकता है।

तुम मन को जानते नहीं, तुम्हारे साथ जो हो रहा है तुम उसके पीछे के कारण से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपनी अनभिज्ञयता को, अपनी इग्नोरेंस को छुपाने के लिए बोल देते हो कि ये तो ऐसे ही हो रहा है; वो ऐसे ही नहीं हो रहा है उसके पीछे एक वजह है, तुम उस वजह को जानो। जब उस वजह को जानोगे तो फ़ालतू चीज़ें ज़िंदगी से अपने आप हट जाएँगी, क्योंकि वो ग़लत वजह से आ रही थीं और फ़िर सही चीज़ें ज़िंदगी में आने लग जाती हैं।

और ये जो कल्चर (संस्कृति) है, कि, “बस ऐसे ही हो रहा है, मेरी मर्ज़ी है, जस्ट लाइक दैट , यूँ ही”, इसको बहुत बढ़ावा दिया है इस प्रोग्रेसिव (प्रगतिशील) विचार ने, वही कि, “ आई विल डू ऐज़ आई प्लीज़ (मैं जैसा चाहूँगा वैसा करूँगा)। भई मुझे जानने की क्या ज़रूरत है कि मेरे साथ जो हो रहा है वो क्यों हो रहा है? जो भी हो रहा है वो मैं हूँ न! तो मैं करूँगा। *आई विल डू एज़ आई प्लीज़*।"

ये आई (मैं) को जान तो लो; एक छोटे से वाक्य में दो-दो बार बोल दिया, पता कुछ नहीं है। “ आई विल डू एज़ आई प्लीज़ * ”। * यू डोंट इवन एक्सिस्ट टू डू एनीथिंग (तुम कुछ भी करने के लिए मौजूद नहीं हो)। तुम अभी हो ही नहीं। हाउ विल यू डू एज़ यू प्लीज़ ? (तुम अपने मन का कैसे करोगे?)। प्लेज़र (प्रसन्नता) और डिस्प्लीज़र (अप्रसन्नता) भी बहुत पीछे की बात है, तुम नॉन एक्सिस्टेंट (अस्तित्वहीन) हो।

तुम्हारे साथ जो हो रहा है उसमें तुम कहीं हो ही नहीं, इधर-उधर की पचास चीज़ें हैं, तुम नहीं हो बेटा अभी। तुम जो हो उससे तुम बहुत दूर हो, तो आई विल डू एज़ आई प्लीज़ बोलने का कोई मतलब ही नहीं है। और बोलते हो आई विल डू एज़ आई प्लीज़ और फ़िर जाते हो दूसरों से वैलीडेशन (अनुमोदन) लेने, रेटिफिकेशन लेने, यही न? एक तरफ़ तो ये आई विल डू ऐज़ आई प्लीज़ और दूसरी ओर बहुत बुरा लग जाता है कि नया टू पीस लिया था उस पर फोटो डाली थी अभी इंस्टाग्राम पर और सिर्फ दो-सौ लाइक आए। भाई यू डू ऐज़ यू प्लीज़ (तुम जैसा चाहते हो वैसा करते हो), यू वांटेड टू वियर दिस टू पीस , (तुम ये टू पीस पहनना चाहते थे) यू डिड , (तुमने पहना)। नाउ वाय डू यू केयर फॉर द लाइक्स? (अब तुम लाइक्स की चिंता क्यों करते हो?)

पर दिल-ही-दिल में बुरा बहुत लग जाता है। जब बुरा बहुत लग जाता है तो, “मुझे डिप्रेशन हो रहा है; चलो लेट्स गो आउट फॉर अ ड्रिंक (शराब पीने के लिए बाहर चलते हैं)।" और वो जो पूरा मूड डाउन हुआ है और सब कुछ हो रहा है और पैनिक (घबराहट) हो रही है; वो हो किसलिए रही है क्योंकि आज इंस्टाग्राम पर जो डाला था उसपर कुल दो-सौ लाइक आए हैं। और एकदम हॉटम हॉट डाली थी तस्वीर, लोगों ने बटन ही नहीं दबाया तो एकदम भेजा आउट हो गया। भाई यू डू ऐज़ यू प्लीज़, एंड लेट अदर्स डू ऐज़ दे प्लीज़ (तुम जैसा चाहते हो वैसा करते हो, दूसरों को भी जैसे वो चाहते है वैसा करने दो।) फिर काहे को चाहते हो कि लोग आकरके तुमको बात-बात में वैलिडेट करें?

तो ये बहुत इनर कंट्राडिक्शन (आंतरिक द्वंद) वाली बातें हैं, और जो इनमें फँसा हुआ है वो बहुत तकलीफ़ में होगा; इस बात से मुझे तकलीफ़ होती है।

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