प्रश्नकर्ता: मैं अपनी ऊर्जा और समय को कैसे दिशा दूँ, ताकि मैं सबसे अलग और अनूठा बन पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: जो तुमने सवाल पूछा है, उत्तर बिलकुल इसी में बैठा हुआ है, सामने ही है। तीन बिन्दुओं का उत्तर है और तीनों तुम्हारे सवाल से ही निकल कर आ रहे हैं। जो पहली बात तुमने कही, वो कही, "हम कैसे दिशा दें अपनी समय और ऊर्जा को, ताकि हम भीड़ से अलग खड़े हो सकें?"
पहली बात; ‘हम’ की भाषा में सोचना छोड़ो और ‘मैं’ की भाषा में सोचना शुरू करो, कोई भी सवाल ‘हम’ से शुरू न हो; ‘मैं’ के लिए हो, ‘मैं’ द्वारा हो। ‘मैं’ माने अपना समय कैसे बचाऊँ। हम माने किस-किस का समय बचाना चाहते हो? भीड़ का कोई समय नहीं होता, भीड़ की कोई चेतना ही नहीं होती। भीड़ का कोई जीवन ही नहीं होता, तो समय कैसे होगा? हाँ, जब तुम ‘हम’ की भाषा में बात करते हो, तो समय निश्चित रूप से नष्ट करते हो क्योंकि जैसे ही तुमने ‘हम’ कहा, ‘मैं’ मिट गया। जैसे ही तुमने ‘हम’ कहा, ‘मैं’ मिट गया, अब समय किसको बचाना है? ‘मैं‘ को या ‘हम’ को बचाना है? समय बचाना है, आयुष को, पर आयुष, भाषा बोल रहा है कि, उसने संबंध बना रखे हैं १० और लोगों से, हम सब १०।
उसने संबंध १० लोगों से बना रखे हैं। अब आयुष (श्रोता को इंगित करते हुए) क्या करता है? क्या सोचता है? किससे प्रभावित होता है? ये सब तो उन १० लोगों पर निर्भर करता है न? समय बचाना है, आयुष को, पर आयुष चलेगा बाकि ९ के इशारे पर क्योंकि ९ भी हम हैं, मैं तो है नहीं, हम हैं, संयुक्त हैं, पूर्ण हैं, और जहाँ हम हैं, वहाँ भीड़ है और जहाँ भीड़ है, वहाँ निजता नहीं है, जहाँ निजता नहीं है, वहाँ निजता का समय नहीं है, समय का नष्ट होना पक्का है। तुम्हारे आस-पास के ‘हम’ आएँगे तुम्हारे पास और कहेंगे, ‘’चल-चल क्यों पढ़ रहा है, थोड़ा खेल कर आते हैं’’ और चूँकि तुम ‘मैं’ नहीं हो तो, तुम उनके साथ चल पड़ोगे क्योंकि तुम्हें भीड़ का हिस्सा होने में मज़ा आ रहा है।
कहा जाता है कि दुनिया के जो सबसे बड़े अपराध होते हैं, वो कभी व्यक्ति नहीं करता, वो हमेशा भीड़ करती है। दुनिया के जो सबसे जघन्य अपराध होते हैं, वो कभी व्यक्ति द्वारा नहीं किये जाते, वो भीड़ द्वारा, ‘हम’ द्वारा किये जाते हैं, सामूहिक समझ द्वारा किये जाते हैं। व्यक्ति भी करता है, जब उसके अंदर ‘हम’ जागृत होता है, तब करता है। जिसका ‘मैं’ जाग्रत है, वो कभी अपराध नहीं कर सकता, न अपने प्रति न अस्तित्व के प्रति।




