आचार्य प्रशांत: विपिन पाल हैं यूट्यूब से, कह रहे हैं, ‘आचार्य जी की बातें वैसे तो ठीक होती हैं, लेकिन बताते बहुत ऐटीच्यूड से हैं। एक दोस्त की तरह नहीं बोलते, ये बात मुझे खटकती है।’
हाँ है ऐटीच्यूड, तो? तुम्हें कैसे पता एक दोस्त होता कैसा है? ये समझाओ मुझे विपिन पाल! तुम कह रहे हो, ‘आचार्य जी ऐटीच्यूड के साथ बोलते हैं और दोस्त की तरह नहीं बोलते।’ ‘दोस्त की तरह नहीं बोलते’, ज़रा अपने खोपड़े के भीतर जाओ। जब तुम कहते हो कि मैं ‘दोस्त की तरह’ नहीं बोलता तो इसका मतलब तुम जानते हो कि दोस्त कैसा होता है, है न? तुम्हारे पास एक छवि है, एक इमेज है कि दोस्त ऐसा होना चाहिए और दोस्त इस तरीक़े से बातचीत करता है। और फिर तुम कहते हो तुलना करके कि नहीं, ये आचार्य जी तो वैसे नहीं बोलते।
तुम्हारे पास दोस्त की एक छवि है। और तुम मुझे देखते हो और मेरी बातचीत, और मेरा बोलने का ढंग और मेरा तुम्हारे प्रति जो रवैया है माने ऐटीच्यूड, वो तुम्हारे मन में दोस्त की जो छवि है उससे मैच नहीं करता, नहीं मिलता। तो तुम कह रहे हो, आचार्य जी दोस्त की तरह नहीं बोलते। तुम्हें कैसे पता वो जो तुम मन में रखकर बैठे हो दोस्त की छवि, वो ठीक है? तुम्हें कैसे पता कि दोस्त वैसे ही होना चाहिए जैसी तुमने उसकी छवि बना रखी है? तुम्हें कैसे पता कि वो जिसको तुम दोस्त बोल रहे हो वो वाक़ई तुम्हारा दोस्त है?
दोस्त की परिभाषा ये है कि वो है तुम्हारा दोस्त जो वाक़ई तुम्हारा हित करे। जो वाक़ई तुम्हारा हित कर दे। जो हमारी ज़िन्दगी को यहाँ (चेतना के निचले तल) से उठाकर यहाँ (ऊँचे तल पर) ले जाये। जो तुम्हारे मन को नीचे से उठाकर ऊँचा ले जाये उसको कहते हैं दोस्त। और तुम्हारे मन में जो दोस्तों की छवि है क्या उन्होंने ऐसा करा है तुम्हारे साथ? कि उन्होंने तुम्हारी ज़िन्दगी को नीचे से उठाकर ऊँचाई पर रख दिया है। तुम्हारी चेतना को, तुम्हारे पूरे सोचने समझने के तरीक़़े को उठाकर नीचे से ऊपर कर दिया है। क्या उन्होंने ऐसा करा है?




