सिर्फ़ इसलिए कि आपकी काया में कोई हिस्सा कम है या त्रटिपूर्ण है, दुख आवश्यक नहीं है। उसकी अपनी तरह की चेतना होगी, उसे जीने दो न, उसका अपना एक संसार होगा, समस्त जीवों की चेतना वैसे भी एक जैसी नहीं होती। तुम्हें स्वीकार ही नहीं हो रहा कि तुम्हारे सामने जो है, वो भी परमात्मा की ही एक अभिव्यक्ति है।
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प्रश्नकर्ता: मेरे चाचा का एक लड़का हुआ था, तो करीबन तीन साल हो गये, तीन साल, चार साल हो गये होंगे, उसका न ब्रेन का एक पार्ट (दिमाग का एक हिस्सा) नहीं है। तो डॉक्टर्स ने बोला हुआ है कि इसका कुछ हो नहीं सकता। बट (लेकिन) वो लोग बहुत ज़्यादा डेस्पेरेट (निराश) हैं कि नहीं कुछ तो, मतलब चक्कर काटते रहते हैं कहीं-न-कहीं, कहीं कुछ हो, कहीं कुछ हो। तो कोई थोड़ा सा भी कहता कि ठीक है, मतलब साल लगेगा ठीक हो जाएगा, ये दवा ले लो, वो दवा ले लो। तो सीधा वहीं पर सब हो जाता। सिचुएशन (स्थिति) बहुत ऐसी कि न तो उन्हें समझा सकते हैं और न उसका सोल्यूशन (हल) दे सकते हैं। बट परेशान वो लोग बहुत ज़्यादा हैं। तो मतलब वही बात है कि समझा भी नहीं सकते और उनको कुछ कहेंगे तो वो लोग न तो समझेंगे। तो इस केस (मामले) में क्या किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: समझाया जा सकता है।
प्रश्नकर्ता: और वो जो मेरी चाची हैं, उनकी कंडीशन (हालत) ऐसी हो गई है कि वो सुबह-शाम तक बस उसी में लगी रहती हैं, सब मतलब, जो अपनी जो खुद की हेल्थ (स्वास्थ्य) है, वो सब जा रही है।




