घरवाले मेरी बात क्यों नहीं समझते?

Acharya Prashant

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घरवाले मेरी बात क्यों नहीं समझते?
लोग भी न बंदा देख कर और शक्ल देख कर बोलते हैं। तुम शेर की तरह रहो, शेर की तरह जियो, किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुम पर आक्षेप या आपत्ति करने की। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: तुम छोटे से बच्चे हो क्या, कि मम्मी-पापा की शिकायत दूसरे डैडी जी से करने आए हो। और 26 की उम्र में जिससे तुम बात कर रहे हो, वो भी अगर ऐसे ही किसी की शिकायत किसी से कर रहा होता, तो आज मैं तुम्हारे सामने बैठा होता? मैं क्यों इस बात पर ध्यान दूँ कि तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हारी रुचियों को पसंद करते हैं या नहीं करते हैं, ये उनका मामला है वो जब शिविर में आएँगे उनसे बात कर लूँगा, तुम अपनी बताओ।

प्रश्नकर्ता: वो मुझे रोकते हैं।

आचार्य प्रशांत: तुम 26 साल के हो, तुम छोटे से बच्चे हो? ऐसे शिकायत कर रहे हो खड़े होकर के, ये लाज की बात है। "मम्मी-पापा रोक रहे हैं, मम्मी-पापा रोक रहे हैं।" 2 साल के हो, 6 साल, नहीं 26 साल के हैं, कैसे रोक रहे हैं? उन्हें दिख ही रहा होगा कि तुम रोकने लायक हो, इसलिए रोक रहे हैं।

एक जवान शेर को कौन रोक सकता है, तुम जवान हुए ही नहीं इसीलिए तुम्हें रोक रहे हैं। मैं रोकने वालों की बात करूँ या रुकने वाले की? हाँ, तो अपना बताओ ना तुम्हें कैसे कोई भी रोक लेता है। ये जो तुमने पूरी कहानी सुनाई, ये सुनने में ही भद्दी थी। ये कहानी 8, 10, 12 साल तक शोभा देती है, उसके बाद नहीं।

"मैं नौकरी कर रहा हूँ, मैं 26 वर्ष का हूँ, मैं अध्यात्म की ओर बढ़ रहा हूँ, मैं जो भी कुछ कर रहा हूँ मम्मी ने मना कर दिया।”

प्रश्नकर्ता: आसपास का जो भी।

आचार्य प्रशांत: अरे, तो क्यों हैं तुम्हारे आसपास? और अगर तुम्हारे आसपास भी हैं, तो उनकी हिम्मत कैसे पड़ जाती है तुमसे उल्टी-पुल्टी बातें बोलने की।

लोग भी न बंदा देख कर और शक्ल देख कर बोलते हैं। तुम शेर की तरह रहो, शेर की तरह जियो, किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुम पर आक्षेप या आपत्ति करने की।

पहली शर्म तो तभी आ जानी चाहिए, जब कोई आकर तुम्हारे मसलों में हस्तक्षेप करे। बात ये नहीं है कि उसने जो भी कहा वो सही है या ग़लत, बात ये है कि उसने जो भी कहा, उसने कह कैसे दिया? ज़रूर तुमने ही ऐसे *सिग्नल*दिए हैं कि "मैं कमज़ोर आदमी हूँ और मुझसे कोई भी कुछ भी कह सकता है।" तुमने अपना ब्रैंड ऐसा लुचर-पुचर बना क्यों रखा है, और ऊपर से दूसरों की शिकायत कर रहे हो, "फलाँनो ने आकर मेरे साथ बड़ी ज्यादती कर दी।"

प्रश्नकर्ता: उस चीज़ से लड़ना कैसे है?

आचार्य प्रशांत: लड़ने की ज़रूरत ही नहीं है, तुम्हें ऐसा हो जाना है कि किसी की हिम्मत ही न पड़े तुमसे ऐसी बातें बोलने की।

देखो, बीमारी भी कमज़ोर व्यक्ति पर हमला करती है। सबसे पहले ये समझो कि दूसरे तुममें कमज़ोरी देख रहे हैं ना, इसलिए तुम पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वो तुममें कमज़ोरी देखेंगे ही नहीं, तो तुम पर चढ़ने की कोशिश भी नहीं करेंगे। और अगर तुम्हारे ही माँ-बाप हैं और कमज़ोरी देख रहे हैं, तो कमज़ोरी होगी भी। वो तुम्हारी असलियत से वाक़िफ़ हैं, उन्हें दिख रहा है कि "ये लड़का तो है ही कमज़ोर, तो इसका हाथ उमेट सकते हैं, इसके कान भी खींचे जा सकते हैं।" नहीं तो 26 वर्ष के जवान पर कौन धौंस चला सकता है।

देखो, अध्यात्म ऐसे ही नहीं होता कि हल्की-फुल्की चीज़ है कोई भी कर ले, बैठ के कहीं भजन ही तो गाने हैं, उसके बाद बूंदी के लड्डू खाने हैं। ये पंजीरी वाला अध्यात्म किसी काम का नहीं होता, कि छुन्नू गया मंदिर घंटी बजाई और वहाँ चरणामृत और पंजीरी लेकर लौट आया और धार्मिक कहला गया।

जिगर चाहिए, हौसला चाहिए, भीतर थोड़ी आग चाहिए,आँखों में तेज चाहिए। किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुमसे फालतू बात करने की।

पहला अपमान तो यही है कि वो ऐसी बात कर कैसे गया, उसके बाद तुम उसको सज़ा दे लो चाहे मना कर दो, इससे नुकसान की भरपाई नहीं होने वाली। सबसे पहले तो यही पूछो अपने आप से कि, "इसने ऐसी बात करी, माने इसने मुझमें ज़रूर कोई कमज़ोरी देखी है, कर कैसे दी ऐसी बात?"

इसीलिए कहा जाता है ना, कि महावीर जब चलते थे तो हिंसक पशु भी उनके निकट आकर गाय जैसे शांत हो जाते थे।

प्रश्नकर्ता: जो अपने एकदम निकटतम है, अगर कहीं ऐसा मन में आता है कि उनको ठेस नहीं पहुँचानी है।

आचार्य प्रशांत: हाँ तो बस यही तो कमज़ोरी है जो उन्होंने देख ली है। अरे, किसी अच्छी चीज़ को ठेस नहीं पहुँचाई जाती भाई। तुम्हारे घर में जाले लगे होते हैं तुम क्या बोलते हो, "उनको ठेस नहीं पहुँचानी है।" तो अगर आँखों में जाले हों कैटरैक्ट, उसको भी ठेस नहीं पहुँचानी है। जब घर के जाले भी हटा देते हो, आँखों के जाले भी हटा देते हो, तो मन के जाले क्यों नहीं हटा सकते? वहाँ क्यों बोलते हो "अरे, मैं किसी के मन को ठेस कैसे पहुँचा दूँ।" वहाँ क्यों बोलते हो?

तुम मन को ठेस नहीं पहूँचा रहे, मन के जालों को ठेस पहुँचा रहे हो और तुम जिसके मन के जाले साफ़ कर रहे हो, उस पर एहसान कर रहे हो। ठसक के साथ करो, इसमें शर्मिंदा होने की क्या बात है कि "मैंने फ़लाने को ठेस पहुँचा दी।" सर्जन प्रायश्चित करने गया है, क्या? "मैंने फ़लाने का पेट फाड़ दिया।" भाई, तुमने एहसान करा है उसकी सर्जरी करके तुम प्रायश्चित किस बात का कर रहे हो।

पर फिर वही ना, जो कहा, हम यथार्थ में तो जीते ही नहीं हैं, हम तो आदर्शों और कल्पनाओं में जीते हैं और तुम हो आदर्श पुत्र, जो माँ-बाप से बहस नहीं लड़ा सकता। ना सच बड़ा है, ना आज़ादी बड़ी है, क्या बड़े हैं? — मध्यमवर्गीय संस्कार, और वही है घर में रामायण-महाभारत चलती थी।

प्रश्नकर्ता: हाँ मैं मानता हूँ मैं डरपोक हूँ, कह सकता हूँ। इस बात पर ग्लानि भी आती है, बहुत बार आती है कि कई बार उनसे जो चीज़ कहनी है वह नहीं कह पा रहा हूँ। जैसे कि अभी मैंने आकर थोड़ा दूध वग़ैरह, डेयरी वग़ैरह बिल्कुल एक तरीक़े से छोड़ दिया है, ना के बराबर है। तो कभी-कभार इस बात पे बहस करने का मन चाहता है कि करी जाए, पर वो एक बात पर सुनते ही नहीं हैं। मतलब सिर्फ़ पैरेंट्स को लेकर नहीं है, किसी के साथ भी डिस्कस करो तो, "या तो ये बात करो या बात ही मत करो।" ऐसे करते-करते काफ़ी लोगों से, सर्कल अब बहुत गिने-चुने लोगों का ही हो गया है। मैं खुश भी हूँ उनसे पर एक गिल्ट की भावना भी आती है, कि मैं उनसे क्यों नहीं कह पा रहा जो एकदम निकटतम हैं, मैं उनसे क्यों नहीं कह पा रहा?

आचार्य प्रशांत: कहना तुम्हारे हाथ में है, पर मानना या ना मानना उनके हाथ में है क्योंकि मानने की कीमत देनी पड़ती है भाई। तुम उन्हें कोई चीज़ दिखा सकते हो और बता सकते हो कि इसकी इतनी कीमत है, पर तुम उनके लिए उस चीज़ की कीमत ख़ुद तो नहीं अदा कर सकते ना। मम्मी जी चाय नहीं छोड़ना चाहतीं, तुम उन्हें बार-बार बता रहे हो कि दूध पीने में क्रूरता है। अब चाय तो मम्मी जी को ही छोड़नी है, मम्मी जी के लिए तुम थोड़ी छोड़ सकते हो। तुम अपने लिए छोड़ सकते हो, तुमने शायद छोड़ भी दी होगी।

अब तुम लाख बताते रहो मम्मी जी को कि ये जो दूध निकाला जा रहा है, और जो पूरा दुग्ध उद्योग है ये मांस उद्योग से जुड़ा हुआ है, ये क्रूरता है। मम्मी जी को अगर चाय और लस्सी और खीर की लत लगी हुई है, तो वो नहीं छोड़ेंगी। अब तुम क्यों परेशान हो, उनकी करनी उनके साथ।

प्रश्नकर्ता: जैसे मैं कभी-कभार दोस्तों के साथ बाहर खाने वग़ैरह जाता हूँ, तो मेरे साथ कुछ वेज दोस्त भी हैं कुछ नॉन-वेज भी हैं।

आचार्य प्रशांत: अरे दूसरे दोस्त बना लो यार, क्या इतना परेशान क्यों हो रहे हो।

प्रश्नकर्ता: नहीं, पर मैं चाहता हूँ कि वो।

आचार्य प्रशांत: उन्हीं को काहे को चाहते हो, दुनिया में 800 करोड़ लोग हैं उनको क्यों नहीं चाहते?

प्रश्नकर्ता: जो एकदम मेरे आसपास हैं।

आचार्य प्रशांत: ये भी तो आसपास बैठे हैं उनको चाह लो, ये हैं पाँच-सात लोग। वो जो आसपास हैं वो आसपास नहीं हैं, उनसे तुम्हें मानसिक सुरक्षा मिलती है। तो तुम ये कह रहे हो कि, "इनको छोड़ना भी ना पड़े यही सुधर जाएँ तो इससे बढ़िया क्या होगा।" और वो हो ही ना सुधरने लायक तो? और सुधरना है या नहीं सुधरना ये हर व्यक्ति का निजी निर्णय होता है क्योंकि कीमत उसे ही अदा करनी है। फिर बता रहा हूँ, उसके लिए, उसके बिहाफ़ पर तुम कीमत नहीं अदा कर पाओगे, कर सकते ही नहीं नियम है। चाय उसे ही छोड़नी है, मांस उसे ही छोड़ना है। तुम कैसे छोड़ दोगे उसकी जगह?

अब वो नहीं छोड़ने को राज़ी है, तो अब ये उसका अपना स्वाधीन फैसला है। तुम बस ये कर सकते हो कि वो मांस नहीं छोड़ रहा, तुम उसे छोड़ दो।

प्रश्नकर्ता: हाँ, मतलब उनका ये कहना था कि "हमारे इस चीज़ में दखलअंदाज़ी नहीं।" इन चीज़ों में दखलअंदाज़ी मतलब एक तरीक़े से तुम इनटॉलरंट हो रहे हो।

आचार्य प्रशांत: तो तुम्हें ये सुनना क्यों ज़रूरी है? वो जो भी बोल रहे हैं "इनटॉलरंट हो रहे हो," कुछ भी बोल सकते हैं। वो बोल सकते हैं, कि "तुम कुछ और हो रहे हो, तुम एलियन हो रहे हो, तुम यूएफ़ओ (अनआइडेंटिफ़ाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट) हो गए" वो तुम्हें कुछ भी बोल सकते हैं, तो उससे क्या हो गया।

बात ये नहीं है कि वो बोल रहे हैं, बात ये है कि तुम्हें कौन सी मजबूरी है कि तुम बैठे-बैठे सिर झुकाए सुन रहे हो, उठ के चल दो। वो बोल भी इसीलिए पा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि तुम सिर झुकाकर सुनते रहोगे वो कुछ भी बोलें। और जब आपको पता है कि आप कुछ भी बोलेंगे सामने वाला सिर झुकाकर सुनता ही रहेगा, तो फिर आप वास्तव में कुछ भी बोलेंगे। आपकी बेहूदगी की, आपके झूठ की, आपकी बदतमीज़ी की फिर कोई सीमा ही नहीं रहेगी।

जो सामने बैठा है वो तो ऐसा ही है रीढ़ के बिना, लुचर-लुचर बैठा है, उसे कुछ भी बोलो सुनता ही रहेगा। ज़ाहिर-सी बात है बेटा क्योंकि ये सुनने-सुनाने की बात नहीं है, ये कीमत अदा करने की बात है। जो भीतर से तैयार ही नहीं है कीमत देने को, उसकी कोई प्रगति या सुधार कोई दूसरा कैसे कर देगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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