प्रकृति में पवित्र–अपवित्र कुछ नहीं होता, प्रकृति माने प्रकृति, यहाँ पवित्रता जैसी कोई चीज़ नहीं होती और कुछ अपवित्र भी नहीं होता। लेकिन जो प्राकृतिक है जब तुम उसको पवित्रता का नाम दे देते हो, तो वो अपवित्र हो जाता है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मुझे आपसे जुड़े हुए लगभग दो साल हो चुके हैं और मैं “प्रेम सीखना पड़ता है” किताब के माध्यम से ही आपसे जुड़ी थी।
आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि जो साधारण प्रेम है वो तो रासायनिक है और आपने समझाया कि प्रेम जो है अकारण होता है। और यही जो बुक है, जो आप हमेशा समझाते भी हैं कि प्रेम सीखना पड़ता है, तो फिर "प्रेम सीखना पड़ता है" में सीखना पड़ता है से क्या आशय है?
आचार्य प्रशांत: अनलर्न।
प्रश्नकर्ता: अनलर्न।
आचार्य प्रशांत: मैं सकारात्मक बात कभी कोई बोलता पकड़ा गया? दुनिया भर के सारे इल्ज़ाम लगे, आज तक कभी कोई पॉज़िटिव बात करने का इल्ज़ाम लगा मेरे ऊपर? तो मैं कहूँ कि अगर “सीखना पड़ता है” तो उसका अर्थ होगा भुलाना पड़ता है। जो कुछ सीख रखा होता है, उसको भुलाना पड़ता है। नहीं तो प्रेम क्या है, ये तो 3.5 साल वाले को भी पता होता है आजकल।




