
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मुझे आपसे जुड़े हुए लगभग दो साल हो चुके हैं और मैं “प्रेम सीखना पड़ता है” किताब के माध्यम से ही आपसे जुड़ी थी।
आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि जो साधारण प्रेम है वो तो रासायनिक है और आपने समझाया कि प्रेम जो है अकारण होता है। और यही जो बुक है, जो आप हमेशा समझाते भी हैं कि प्रेम सीखना पड़ता है, तो फिर "प्रेम सीखना पड़ता है" में सीखना पड़ता है से क्या आशय है?
आचार्य प्रशांत: अनलर्न।
प्रश्नकर्ता: अनलर्न।
आचार्य प्रशांत: मैं सकारात्मक बात कभी कोई बोलता पकड़ा गया? दुनिया भर के सारे इल्ज़ाम लगे, आज तक कभी कोई पॉज़िटिव बात करने का इल्ज़ाम लगा मेरे ऊपर? तो मैं कहूँ कि अगर “सीखना पड़ता है” तो उसका अर्थ होगा भुलाना पड़ता है। जो कुछ सीख रखा होता है, उसको भुलाना पड़ता है। नहीं तो प्रेम क्या है, ये तो 3.5 साल वाले को भी पता होता है आजकल।
एक 5 साल का आया था, "मेरा ब्रेकअप हो गया है, डिप्रेशन में हूँ।" प्यार तो सभी ने सीख रखा होता है और 3 भी इसलिए क्योंकि 3 में वो ठीक से बोलने लायक होता है, नहीं तो वो और पहले बोल देता। हम तो जन्मजात वो नकली वाला प्यार सीखकर आते ही हैं ना। सोचो शिशु अगर बोल सकता तो माँ को बोलता? "आई जस्ट लव द शेप ऑफ यू।" वो भी बोलता, ये तो अब उसके ना दाँत हैं ना ज़ुबान है तो क्या, नहीं तो वो भी बोल देता।
नकली प्यार तो सब सीखकर आते हैं, कोख से सीखकर आते हैं।
तो जब मैं कहूँ “प्यार सीखना पड़ता है,” तो मानें जो कुछ तुम प्यार माने बैठे हो, वो प्यार जैसा कतई नहीं है, ये जानना। लव मस्ट बी लर्न्ड, मानें लव मस्ट बी अनलर्न्ड। आप जिसको प्यार समझते हो, वो प्यार नहीं है, बात ख़त्म।
अब ये बात ऐसा लगता है, ज़्यादातर लोगों के मुँह पर जूता भिगो के मार दिया किसी ने। क्योंकि पूरी ज़िंदगी प्यार के ही नाम हमने लिख रखी होती है, पूरी ज़िंदगी। सबको गुमान होता है, मेरे माँ-बाप ने मुझसे बहुत प्यार किया, फिर मैंने अपनी बीवी से प्यार किया तो उससे मेरे बच्चे आए। फिर मैंने अपने बच्चों से प्यार किया, फिर मैंने ये किया, फिर वो किया। मैंने अपनी पड़ोसन से प्यार किया, सब। मैंने अपने जूतों से प्यार किया, सब।
प्यार के अलावा कुछ है?
पूरी ज़िंदगी यही करते रहे, प्यार के दरिया बहा दिए, रुपया-पैसा भी इसीलिए कमाते हो, “देखो, अपनों के लिए तो कमाना पड़ता है न, हमारे प्यारे।” और जब पता चले कि ये सब जिसको प्यार समझते थे, ये तो उसमें कहीं से इतना-सा भी नहीं है प्यार! बात उनकी नहीं है कि वो प्यार के क़ाबिल हैं कि नहीं, बात हमारी है।
हम स्वार्थ जानते हैं, और मज़े की बात समझते हो? जैसे स्वार्थ हम जानते हैं, वैसे ही स्वार्थ सब जानवर जानते हैं क्योंकि वो और हम हैं तो एक ही जंगल की पैदाइश। पर अपने स्वार्थों को हम प्यार का नाम देते हैं, तो जब हम जानवरों को भी देखते हैं कुछ करते हुए तो हम कहते हैं, “सी, दे आर मेकिंग लव।” हम जानवरों के भी स्वार्थों को प्यार का नाम दे देते हैं।
एक रील चलती है कि एक माँ जाती है अपने बच्चे को लेके, और वो चिंपैंज़ी के पास खड़ी हो जाती है, मादा चिंपैंज़ी या गोरिल्ला कुछ है। तो वो देखती है वो चिंपैंज़ी कि ये अपने बच्चे को लेकर खड़ी है, इंसानों की मादा। तो वो पीछे दौड़ कर जाती है वो भी अपना बच्चा ले आती है, दिखाने लगती है, “देखो, मेरा भी है।” और वो बिल्कुल वायरल है, उस पर न जाने कितने मिलियन व्यूज़ हैं। कहते हैं, “देखा इंसान की तरह जानवर भी अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं।”
ये तुम कुतर्क की इंतिहा देखो।
तुम मान ये रहे हो कि इंसान तो प्यार करता है और चूँकि जानवर भी यहाँ पर इंसान जैसा व्यवहार कर रहा है तो इसलिए जानवर को भी हम कहेंगे कि वो भी प्यार करता है। इसमें धारणा पहले ही क्या है? इंसान तो करता ही है प्यार। अब जानवर भी अगर इंसान जैसा व्यवहार करे तो फिर हम जानवर को भी कहेंगे कि इंसान जैसा प्यार। भाई, तुम ही नहीं करते जानवर क्या करेगा? हाँ, तुम जो कर रहे हो बिल्कुल जानवर जैसा है, उसको प्यार नहीं कहते।
वो जो चिंपैंज़ी अपना बच्चा लिए घूम रही है, उसको प्यार नहीं कहते भाई। और अगर सब पशु-पक्षियों में माँ और बच्चे के बीच में जो रिश्ता होता है तुम्हें उसको प्यार बोलना है, तो न जाने कितनी प्रजातियाँ हैं, जिनमें माँ बच्चे को खाती है। तो उसको भी प्यार बोलो।
अरे, वो शारीरिक संस्कार हैं जो तुमसे पूछकर प्रकृति ने तुममें नहीं डाले हैं, उसमें प्रेम थोड़ी आ गया।
प्रेम प्राकृतिक नहीं होता। तो जो कुछ प्राकृतिक है, जिसको प्रेम कहे बैठे हो उसको भुलाना होता है, तब असली प्रेम अपने-आप प्रकट होता है।
रिवील होता है।
प्रेम सीखना पड़ता है, माने ये थोड़ी कि कहीं पर जाकर के लव गुरु से लव लेसन्स ले रहे हो, वो सब भी वैसे चलता है। देख रहा था मैं वो था कि “क्या आपकी शादी होने वाली है? क्या आपको परफ़ॉर्मेंस एंग्ज़ायटी है? आइए दरियागंज में डॉक्टर मुराद के पास, वो आपको प्रेम सिखाएँगे।” अलग-अलग उनके पैकेज थे, बेसिक मिशनरी इतना, चार पोज़ीशन्स इतना, 18 एग्ज़ॉटिक पोज़ीशन्स, बम्पर प्रीमियम पैकेज, अलॉन्ग विद गारंटीड रिफ़ंड इतना। “प्रेम सीखना पड़ता है” इससे ये आशय निकाल लिया क्या? और इसके अलावा दूसरा आशय निकाल नहीं सकते, क्योंकि हमारे लिए तो प्रेम शारीरिक के अलावा कुछ होता नहीं।
कोई प्रेम बता दो हमारा जिसका शरीर से नाता न हो, यहाँ तक कि आप जब यह भी बोलते हो कि हमें भगवान से प्रेम है, तो उनको भी शरीर बना देते हो। और अच्छा-अच्छा उनको शरीर दे देते हो, फिर कहते हो, “देखो, कितनी प्यारी उनकी आँखें हैं, कितने प्यारे उनके हाथ हैं, कितने कोमल उनके चरण हैं।” शरीर के अलावा हम कोई प्यार जानते हैं क्या? ये सब भुलाना पड़ता है।
इसमें कोई अपमान की बात नहीं है, रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं कहा जा रहा बस ये स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है, क्योंकि सच है। सच को स्वीकार नहीं करोगे तो क्या करोगे? क्योंकि सच है कि वो जो रिश्ता है — ठीक है, रिश्ता होगा, वो प्यार नहीं है। रिश्ता रखे रहो पर ये झूठा दावा बंद करो बकवास कि उसमें प्यार है। काहे का प्यार है?
अभी एक प्यार से भरे हुए बाप ने अपनी प्यारी बेटी को गोलियाँ मारी हैं। ये सब क्या होता है? “नहीं, *आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन) अपना ख़ून होना चाहिए। जब तक मेरे शरीर का नहीं है तब तक उसको पालूँगा भी नहीं।”
इतने अनाथ बच्चे हैं उन्हें कोई गोद लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि मेरे शरीर के नहीं हैं। हम शरीर के अलावा कौन-सा प्यार जानते हैं? कौन-सा जानते हैं?
अभी-अभी माँ को बच्चा हुआ हो वार्ड में, वहाँ और भी कई थी, प्रसूति हुई है और उसके माँ के हाथ में आपने बच्चा दे दिया और वो उसको बिल्कुल चूम रही है, सहला रही है, जितने तरीक़े से प्यार कर सकती है। हम प्यार ही तो बोलते हैं कि “देखो, मम्मी अभी उसको प्यार कर रही है।” और उसको हर तरीक़े से प्यार कर रही है और ये-वो झाड़ना, पोछना, उसकी टट्टी साफ़ करना, दूध पिलाना सब चल रहा है, सारा प्यार वाला कार्यक्रम चल रहा है। और तभी नर्स आ के बताए “अरे मैम, ये आपका नहीं है आपका वाला उधर है, ये जो हाथ में है तुरंत उसको ऐसे रख दोगे (किनारे)।
कहाँ गया प्यार?
मैंने तो कहा “रख दोगे,” ज़्यादातर जो माताएँ हैं, वो इतनी प्रेमी होती हैं कि वो रखेंगी नहीं, वो फेंक देंगी। कहेंगी, “ये कचरा मेरे हाथ में क्यों दे दिया? मेरा वाला कहाँ है?” ये है, “प्रेम सीखना पड़ता है।” आप जिसको प्रेम बोल रहे हो वो दुनिया की हिंसा का सबसे बड़ा, बल्कि इकलौता कारण है। दुनिया भर में आप जो हिंसा पाते हो, दुख पाते हो उसका कह सकते हैं कि एकमात्र कारण है हमारी प्रेम की विकृत अवधारणा। सारी हिंसा प्रेम के मारे ही तो होती है।
इज़राइली भी देशप्रेमी है और ईरानी भी देशप्रेमी हैं। और ये दोनों मिल के पूरी पृथ्वी से जीवन ही न समाप्त कर दें, तो कहो। वो आतंकवादी बना बैठा है वो कह रहा है, “मुझे अपने मज़हब से बहुत प्यार है।” एक से एक व्यर्थ किस्म के ट्रोल्स आ रहे होंगे, उनके वहाँ लिखा होगा सनातन प्रेमी।
प्रेम हमें पता कहाँ है? तो प्रेम सीखना पड़ता है। माने ये जो तुम नकली, सस्ती, घटिया चीज़ पकड़ कर बैठे हो और बार-बार बोलते हो लव, इश्क़, आशिक़ी, मोहब्बत, प्रेम, प्यार, हटाओ इसको। और डर जाते हो, “अच्छा, तो रिश्ता ही तोड़ दें? और खाना कौन बनाएगा?” तुमको खाना बनवाना है, तो सीधे बोलो कि “खाना बनाने वाली है, उसको घरवाली क्यों बोलते हो?”
तुमसे रिश्ता तोड़ने को नहीं कहा जा रहा है, तुमसे बस रिश्ते को सही नाम देने को कहा जा रहा है। क्योंकि ये ईमानदारी का तक़ाज़ा है जो रिश्ता जैसा है, उसको वैसा नाम दो। तोड़ने को नहीं कह रहा हूँ मैं, नाम सही दो।
कोई डरी बैठी है, “अरे मेरा क्या होगा, मैं तो कुछ जानती नहीं, ऐसी हूँ, दुबली-पतली हूँ, मेरा तो कुछ है नहीं। ऐसी इधर-उधर चींटी जैसी दिखती हूँ, छिपकली जैसी मेरा तो कुछ हो नहीं सकता। जल्दी से कोई लड़का मिल जाए किसी तरह से कुछ कमाता-धमाता हो तो उसकी वजह से मुझे ज़िंदगी में थोड़ी सिक्योरिटी हो जाएगी।”
उसको क्यों बोल रहे हो कि हमारा और उसका रिश्ता प्यार का है, उसको मत कहो, कि ये प्रेमी है मेरा, उसको बोलो, कि “ये मेरी बैसाखी है।” उसको ये मत बोलो, कि “ये मेरा प्यार है,” बोलो, “ये मेरी बैसाखी है।” क्योंकि अब बैसाखी छोड़ने को तो नहीं कहा जा रहा है, रिश्ता तोड़ने को तो नहीं कहा जा रहा है। बैसाखी रखे रखो पर उसको प्यार का नाम मत दो, तुम्हारी ज़िंदगी में वो व्यक्ति बैसाखी की तरह है, बस। क्योंकि तुम्हें अपनी टाँगों का इस्तेमाल नहीं करना। सही नाम दो और सही नाम देना, अपने आप में आधा काम हो जाता है।
क्यों किसी को बोलते हो, कि “तू मेरा इश्क़ है।” उसको सीधे बोलो, “तू मेरी हवस है,” सीधे बस। उसको सेव भी ऐसे ही करो, फोन आया — हवस कॉलिंग। रिश्ता तोड़ने को थोड़ी कह रहे हैं भाई। तुमने यही फ़ैसला किया है कि तुम्हें एक जिस्म पकड़ कर अपनी हवस पूरी करनी है। तुम रिश्ता रखो पर रिश्ते को सही नाम दो, उसको बुलाया भी ऐसे ही करो, हवसू, जो भी है। गाने भी ऐसे ही गाया करो, “तू मेरी हवस है, मेरा जिस्म बेबस है।”
और ये सब जितने जोड़े घूम रहे हैं प्यार का दावा करते हुए, हवस हटा दो एक भी बचेगा? ईमानदारी से बताइए एक भी बचेगा? शादी के वक़्त दुल्हन को पता चल जाए कि दूल्हा फ्लैश्ड है, और उसको पता चल जाए दुल्हन फ्रिज्ड है, मानें दोनों…। तो होगी शादी? वो पंडित से रिफंड ले के भागेंगे दोनों।
सीधे बोलो न हवस का रिश्ता है, क्यों तुम उसके ऊपर तमाम तरीक़े के शाब्दिक अलंकार चढ़ाते हो। और किसी भी चीज़ की कमी हो जाए तो शादी चल सकती है, इस एक चीज़ की कमी हो जाए तो शादी बचेगी? कोर्ट भी कहता है कि अगर एक ये चीज़ नहीं है रिश्ते में, तो आपको तुरंत तलाक़ मिल सकता है। कोर्ट भी कहता है, कि “इतने महीने अगर शारीरिक संपर्क नहीं हो रहा है, तो बिल्कुल आपको तलाक़ दिया जा सकता है (धारा 13, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955)।
क्यों प्यार वग़ैरह क्यों बोल रहे हो उसको? हाँ रिश्ता रखो, अच्छी बात है। तमाम तरीक़े की भूख होती है, पिज़्ज़ा खाओ, बर्गर खाओ, किसी के शरीर खा जाओ। पर फिर ये क्यों बोलते हो — आई लव माई पिज़्ज़ा, आई लव चिकन, आई लव दिस, आई लव दैट, लव नाम को क्यों बदनाम कर रहे हो।
हिटलर बोलता था, “मुझे मेरी मातृभूमि...” — वहाँ मातृभूमि नहीं, वहाँ पितृभूमि बोलते हैं, “मुझे मेरी पितृभूमि से प्यार है।” ले लो प्यार। 60 लाख तो सिर्फ़ यहूदी मरे थे और ये तो कुछ भी नहीं है। अब तुम इसमें कुल मिला के गिनोगे पूरी दुनिया में कितने सैनिक और कितने नागरिक मरे तो करोड़ों में, कई-कई करोड़। क्योंकि उस बेचारे में बहुत प्यार था अपने देश के लिए।
ख़ुद को जाने बिना दूसरे से प्यार संभव नहीं है, ये आप क्यों नहीं समझते? जो व्यक्ति ख़ुद को नहीं जानता वो दूसरे से प्यार नहीं कर सकता। प्यार कोई हवा का झोंका, कोई आवारा लहर थोड़ी है, कि यूँ ही आ गई और उड़ा ले गई।
“बन्नी कब से हुई जवान बन्ना ले जा अपने साथ।”
ऐसे थोड़ी प्यार हो जाता है कि जवान हो गए हैं, तो अब प्यार होगा ही। ये प्यार नहीं है, ये वही पुराना जानवरों वाला खेल है और ये कह के मैं इस खेल का अपमान नहीं कर रहा। अच्छा खेल है, बढ़िया खेल है, कोई समस्या नहीं इस खेल के साथ, क्या करना है।
मैं छठी-सातवीं में था, तो अलीगंज की बात है लखनऊ के, बढ़िया वहाँ घर-वर सब। वहाँ मैं खड़ा हुआ हूँ, हाँ, सातवीं में ही हूँ तो माने अब वो समय आ रहा है। तो एक गधा और एक गधी, और मैं उनको बिल्कुल टकटकी बाँध के देख रहा हूँ कि ये चल क्या रहा है? पहले मुझे लगा ये मार रहा है इसको। ये चढ़ गया है इसके ऊपर और ये बार-बार धक्का दे रहा है, क्या कर रहा है? ये इसको मार ही रहा होगा। और मैं ऐसे गेट की दो सलाखें पकड़ कर, गेट में ऐसे मुँह लगा के देख रहा हूँ उनको। मुझे समझ में न आए, ये कर क्या रहे हैं? भाग क्यों नहीं रहा दूसरा वाला? पिटे ही जा रहा है, उसके ऊपर चढ़ भी रहा है ये भी कर रहा है, वो भी कर रहा है, वो तब भी नहीं भाग रहा। समझ में नहीं आया ज़्यादा।
फिर पीछे मुड़ के देखा तो मेरे पिताजी खड़े हुए थे, कोई और बाप होता तो अब तक उसने ये कर दिया होता, “क्या गंदी चीज़ देख रहे हो, चलो हटो, क्या कर रहे हो।” उन्होंने कुछ नहीं करा। उन्होंने कहा, “ठीक है देखो, देखो, देखने दो इसको।”
मैं इस खेल का अपमान नहीं कर रहा हूँ, इस खेल में कुछ भी ऐसा नहीं है कि जिस पर थूक दिया जाए। प्रकृति है भाई, ये चलता है, बस इसे प्यार का नाम मत दो। ये जो प्रकृति में चल रहा है ये, ये क्या है? ये यहाँ सामने धान के पौधे खड़े हुए हैं ये और क्या है, ये प्रकृति है और यहाँ वही खेल चल रहा है। प्रजनन ही तो चल रहा है, और क्या हो रहा है यहाँ पर। और उसका अपना सौंदर्य है, बहुत अच्छी बात है।
कल ये लोग आए थे, मैंने गाना लगाया "तितली उड़ी, उड़ के चली, फूल ने कहा आजा मेरे पास।" ये तितली और फूल और क्या खेल खेलते हैं? यही तो खेल है। भौंरा क्या कर रहा होता है सब फूलों के पास जाकर, वही तो खेल खेल रहा होता है। तो इस खेल में कुछ भी निंदनीय नहीं है। कुछ भी ऐसा नहीं है कि आपको लज्जित होना पड़े, शर्माना पड़े, बस इसे प्यार का नाम मत दो। फूल खुला हुआ है प्रजनन के लिए, बहुत अच्छी बात है, फूल प्रजनन ना करे तो सब इंसान मर जाएँ कोई फल-फसल पैदा न हो।
छोटे-छोटे बच्चे बिल्ली के बड़े अच्छे लगते हैं, वो छोटे-छोटे बच्चे बिल्ली के कहाँ से आएँगे? अगर बिल्ली-बिल्ला कोई कोना न ढूँढ लें? अच्छी बात है, प्यार ठीक है, सब सही है, बढ़िया है। ज़मीन के खेल हैं, बस इन्हें आसमान का नाम मत दो। बाक़ी ज़मीन के खेल तुम्हें खेलने हैं तुम खेलो, तुम्हारी मर्ज़ी है, बहुत प्राचीन खेल हैं सबने खेले थे। और तुमने तो चुना भी नहीं है इनको खेलना। तुम्हें तो पता भी नहीं होता, ये क्या हो रहा है?
एक उम्र पर आते हो तुम पाते हो कि शरीर बदलना शुरू हो गया, प्रकृति ये क्या कर रही है शरीर के साथ? तुमने तो चुना भी नहीं है। वो तो प्रकृति की बात है चल रहा है, बस इसको प्यार का नाम मत दो। ऐसा समझो, एक साधारण-सी चीज़ साधारण-सी चीज़ होती है — साधारण बस साधारण, ना वो पवित्र होती है, ना अपवित्र होती है। बस साधारण प्राकृतिक होती है।
एक साधारण-सी प्राकृतिक चीज़, ना पवित्र होती है, ना अपवित्र होती है।
प्रकृति में पवित्र–अपवित्र कुछ नहीं होता, प्रकृति माने प्रकृति, यहाँ पवित्रता जैसी कोई चीज़ नहीं होती और कुछ अपवित्र भी नहीं होता। लेकिन जो प्राकृतिक है जब तुम उसको पवित्रता का नाम दे देते हो, तो वो अपवित्र हो जाता है।
ये हमारे साधारण शारीरिक और स्वार्थगत रिश्ते, ये प्राकृतिक हैं।
मगरमच्छ मुँह खोलता है बहुत बार देखा होगा, एक चिड़िया है, वो जाकर उसके दाँत खोदना शुरू कर देती है। आपको क्या लगता है वो चिड़िया वहाँ परोपकार करने गई है, वो चिड़िया वहाँ जाती है कि मगर के दाँतों के बीच में जो माँस फँसा होगा, वो मस्त मुझे मिल जाएगा। मगर मुँह खोल के बैठ जाता है, चिड़िया जाती है उसके दाँतों में चोंच मारना शुरू कर देती है, और जो माँस फँसा होता है वो चिड़िया खा के मगन हो जाती है, और इसी बहाने मगर के दाँतों की सफ़ाई हो जाती है। ये हमारी दोस्तियाँ होती हैं। रखो ये रिश्ता, लेन-देन, व्यापार, आदान-प्रदान। ठीक है, बस इसे प्यार का नाम मत दो।
पर इसको ऐसे ही कहा जाता है, “देखो दोनों में कितना प्यार है।” मगरमच्छ चाहे तो अभी अपना मुँह बंद करके चिड़िया को चबा जाए “पर मगर ना वो बर्डी के प्यार में पड़ गया है। द क्रॉक एंड द बर्डी।"
अरे भाई, वो एक प्राकृतिक लेन-देन का काम चल रहा है, वो ना पवित्र है, ना अपवित्र है। पर जब एक साधारण प्राकृतिक बात को तुम पवित्र कहना शुरू कर देते हो, तो वो बात अपवित्र हो जाती है क्योंकि अब पाखंड आ गया, अब झूठ आ गया, अब फ़रेब आ गया। पाखंड क्यों कर रहे हो?
सेक्स को सेक्स बोलो, प्यार क्यों बोल रहे हो? जो उसका नाम है, उसे वही नाम दोगे तो कोई लज्जा की बात नहीं हो गई। पर जो उसका नाम है, उसको वो नाम देने की जगह तुम उसे प्यार अगर बोल रहे हो, तो तुमने ख़ुद ही कह दिया कि जो प्राकृतिक चीज़ है उससे तो मुझे शर्म आती है, इसलिए मैंने उसको दूसरा नाम दिया है।
तुमने ख़ुद ही उसे निंदनीय घोषित कर दिया है, तुमने ख़ुद ही उसे लज्जास्पद बना दिया।
"मम्मा लव्स यू ना?"
"नो।"
क्या?
“वेरी कोल्ड नो?”
"ओके, डैडी लव्स यू ना?" ( ना मैं सिर हिलाते ही।)
इसका ये मतलब नहीं कि हम मम्मी-डैडी का अपमान कर रहे हैं, अपमान जैसी कोई बात नहीं है अपमान क्या है इसमें? चिड़िया के छोटे-छोटे बच्चे होते हैं वो उनको ले आके उनके मुँह में तिनका डालती है, कीड़ा डालती है, प्यारी बात है। वही हर घर में हो रहा है उसमें कुछ भी निंदनीय नहीं है, पर उसको बस प्यार नहीं कहेंगे।
मुर्गी अंडे दे रही है, इसमें प्यार क्या है? मुर्गी है अंडे ही देगी, ज्ञान थोड़ी देगी, तो वैसे महिलाएँ भी बच्चे पैदा करती हैं। वो मुर्गे के साथ बैठती है, यहाँ पर पुरुषों के साथ बैठा जाता है। वो अच्छी बात है, बढ़िया है, ठीक है। मुर्गी है भाई, मुर्गी। मुर्गी के साथ किसी को क्या शिकायत हो सकती है। हम अपमान थोड़ी कर रहे हैं मुर्गी का, बस ये कह रहे हैं कि ये प्यार नहीं है।
प्यार कोई और बात होती है।
“इस आचार्य ने इतना कुछ बोल दिया, एकदम ही ऐसी-तैसी कर दी हमारे प्यार की, पर ये ससुरा कभी ये नहीं बताएगा कि फिर असली प्यार क्या होता है, एकदम नेगेटिव आदमी है। हम जिसको प्यार कहते हैं, उस पर तो थूक दिया इसने। लेकिन अब ये भी तो तू बता कि असली प्यार क्या होता है?”
काहे को बताऊँ? नहीं बताता, मेरी मर्ज़ी।
नहीं बताया जा सकता, या ऐसे कह लो कि नकली को ठुकराने से असली ख़ुद-ब-ख़ुद पता चलने लगता है। और नकली को जब तक तुमने छोड़ा नहीं तब तक असली तुमको बताया जा भी नहीं सकता, और कोई तरीक़ा नहीं है तुम्हें असली तक लाने का।
नकली को छोड़ो और इतनी श्रद्धा रखो कि बर्बाद नहीं हो जाओगे, असली अपने-आप प्रकट हो जाता है।
और छोड़ने से मेरा मतलब ये नहीं है कि घर तोड़ दो, रिश्ता तोड़ दो। रखो, बस साफ़ करके रखो कि बात क्या है, जैसे अभी किसी से मिलते हो, मिलवाते हो बोलते हो, “मीट माय पार्टनर।” अब ऐसे बोलो, “मीट माय सेक्सुअल पार्टनर।” असली बात है, वो बताओ। तोड़ने को थोड़ी कह रहे हैं ईमानदार होने को कह रहे हैं। और उसकी जगह तुम उसे सौ तरीक़े के आभूषण, अलंकार पहना देते हो। “धर्मपत्नी,” “पत्नी” भी पर्याप्त नहीं है, ये है “हमारी अर्धांगिनी धर्मपत्नी श्री पत्नी श्रीदेवी।” अरे, तुम सीधे बोलो न वो क्या है तुम्हारे लिए? इतनी बेईमानी! इतना पाखंड! — धर्मपत्नी!
मुर्गी का चूजा, मुर्गी उसको बोले “ये मेरा बाल गोपाल है,” तो कितना अजीब लगेगा न। सीधे बोलो, अंडा अंडे से बाहर आ गया अभी-अभी। तुम काहे को बोल रहे हो “बाल गोपाल,” बाल गोपाल कहाँ से?
क्यों तुम श्रीकृष्ण को उन ऊँचाइयों से गिरा करके कह रहे हो कि ये अंडेबाज़ी, ये बाल गोपाल, ऐसे थोड़ी होता है। जो परम सत्य है, जो परम ब्रह्म है, उसको तुम इन चीज़ों में क्यों घसीट रहे हो?
इसका मतलब ये नहीं है कि बच्चे में कोई बुराई हो गई, बस जो प्राकृतिक रिश्ता है, उसमें प्रेम नहीं होता। प्रकृति में ममता हो सकती है, लगाव हो सकता है — ओनरशिप, पजेशन — प्रकृति ये सब जानती है। ‘लव,’ ‘प्रेम’ प्राकृतिक नहीं होता, शारीरिक नहीं होता, रासायनिक नहीं होता, भावनात्मक नहीं होता। किसी भाव को, फ़ीलिंग को, जज़्बात को इन सबको प्यार नहीं कहा जा सकता। ये सब मुर्गी के अंडे जैसी चीज़ें हैं, ये सब शारीरिक संस्कारों से ख़ुद-ब-ख़ुद होने वाले काम हैं, इसमें प्यार कहीं नहीं है।
क्योंकि प्यार एक सजग सचेत चुनाव होता है, स्वतः नहीं होता। इसलिए कहता हूँ, सीखना पड़ता है।
और कुछ?
अरे और कुछ नहीं बहुत कुछ होगा, बस उसे प्यार मत कह देना। सब कुछ रखो कौन रोक रहा है, ज़मीन के बाशिंदे हैं ज़मीन पर जो कुछ होता है, सब हमारे साथ भी हो रहा है। ठीक है, हो रहा है। पर ये गुस्ताख़ी थोड़ी करेंगे कि ये सब जो हमारे साथ हो रहा है हम उसको प्यार का नाम दे दें।
प्यार बहुत ऊँची चीज़ है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, “प्रेम सीखना पड़ता है” मीन्स ‘व्हाट लव इज़ नॉट’ — ‘नेति-नेति’ जिसे हम कहते हैं।
और आचार्य जी, मुझे एक और चीज़ कहनी है कि मैं जिस फेज़ में हूँ, वो शादी वाला ही फेज़ चल रहा है मेरा। तो मेरे घर पर जब पहली बार ही मुझसे इस बारे में बात करी थी मेरी फ़ैमिली ने तो मैंने उन्हें आप ही की वीडियो दिखाई। क्योंकि मुझे ये लगा कि मैं उतनी स्पष्ट तरीक़े से बात नहीं कर सकती, तो आपके माध्यम से शायद वो ज़्यादा बेहतर समझेंगे और आचार्य जी, वो समझे भी। वो अब सच में मुझे नहीं कहते, बल्कि कोई बाहर वाला उनसे पूछता है तो उनको यही कहते हैं कि “इसे करनी होगी तो कर लेगी, और नहीं तो अच्छी बात है।”
आचार्य प्रशांत: आए दिन दो-चार लोग मिल जाते हैं — “कहाँ है? कहाँ है? हमारी बेटी किसने बर्बाद करी? वो कहाँ है?”
प्रश्नकर्ता: नहीं आचार्य जी, आपने बहुत सारी ग़लत हाँ से बचा लिया मुझे और उसी के लिए बहुत सारा थैंक यू। थैंक यू आपने मना किया है कुछ भी कहने के लिए, बट हाँ, आपने बचा लिया सचमुच।
आचार्य प्रशांत: देखते हैं मैं कब तक बचता हूँ।