आपसे अलग करने के लिए है ये जन्म, दुनिया, संसार। और आपको संघर्ष करना है। आपको कहना है — "नहीं, नहीं, प्रेम की बात है। मेरा मुझसे प्रेम।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा नाम चिन्मय है। इसी प्रश्न पे मैंने भी बहुत विचार किया है और मैं अक्सर मीन्स और 'एंड्स' में चीज़ों को देखने लग गया हूँ अब। कि जो आज का युवा है या जो हम लोग हैं — 'एंड' बहुत धुँधला सा दिखता है, और ऐसा लगता है कि हाँ, ये चीज़ चाहिए। और उसको पाने के लिए हम 'मीन्स' को ढूँढ़ते हैं, और वैसा करने लग जाते हैं।
जैसे कि कोई नया फ़ोन दिखा — वो पाना है, क्योंकि उसका 'एंड' कुछ और है। फ़ोन से क्या मिलेगा? लेकिन हाँ, वो एपल का फ़ोन देखेंगे, तो चार लोग ये हमारे बारे में क्या सोचेंगे, समझेंगे, वो 'एंड' बन गया। अब उसके लिए 'मीन्स' में फिर वो आदमी ई.एम.आई. पे लेगा, सब लेगा और फिर वो पूरा चक्कर में चलता है।
तो ये जो 'एंड' कौन डिसाइड कर रहा है? अभी जैसे मैं — अभी मैं आइन रैंड की फ़िलॉसफ़ी “हू नीड्स इट” पढ़ रहा था, तो उसमें भी 'ऐन रैंड' कहती हैं कि "फ़िलॉसफ़ी सबको चाहिए," क्योंकि हर एक इंसान एक फ़िलॉसफ़ी ले के तो चल ही रहा है। तो आज का जो युवा है, या जो हर व्यक्ति है — वो एक फ़िलॉसफ़ी, एक 'एंड' ले के तो चल ही रहा है — कि हाँ, ये चाहिए।



