
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा नाम चिन्मय है। इसी प्रश्न पे मैंने भी बहुत विचार किया है और मैं अक्सर मीन्स और 'एंड्स' में चीज़ों को देखने लग गया हूँ अब। कि जो आज का युवा है या जो हम लोग हैं — 'एंड' बहुत धुँधला सा दिखता है, और ऐसा लगता है कि हाँ, ये चीज़ चाहिए। और उसको पाने के लिए हम 'मीन्स' को ढूँढ़ते हैं, और वैसा करने लग जाते हैं।
जैसे कि कोई नया फ़ोन दिखा — वो पाना है, क्योंकि उसका 'एंड' कुछ और है। फ़ोन से क्या मिलेगा? लेकिन हाँ, वो एपल का फ़ोन देखेंगे, तो चार लोग ये हमारे बारे में क्या सोचेंगे, समझेंगे, वो 'एंड' बन गया। अब उसके लिए 'मीन्स' में फिर वो आदमी ई.एम.आई. पे लेगा, सब लेगा और फिर वो पूरा चक्कर में चलता है।
तो ये जो 'एंड' कौन डिसाइड कर रहा है? अभी जैसे मैं — अभी मैं आइन रैंड की फ़िलॉसफ़ी “हू नीड्स इट” पढ़ रहा था, तो उसमें भी 'ऐन रैंड' कहती हैं कि "फ़िलॉसफ़ी सबको चाहिए," क्योंकि हर एक इंसान एक फ़िलॉसफ़ी ले के तो चल ही रहा है। तो आज का जो युवा है, या जो हर व्यक्ति है — वो एक फ़िलॉसफ़ी, एक 'एंड' ले के तो चल ही रहा है — कि हाँ, ये चाहिए।
अब वो किस हद तक सही है, किस हद तक ग़लत है — शायद वो ये समझ नहीं पाता। और इस कारण उसके 'मीन्स' सारे गड़बड़ हो जाते हैं। और वो अंत तक नहीं पहुँच पाता। तो अब जब मैं फिर वेदांत के उसमें देखता हूँ, तो वेदांत मैं जितना समझ पाया हूँ — वो ये कहता है कि 'एंड' अगर आपको देखना ही है, तो "आनंद मात्र" है। आनंद। तो फिर 'मीन्स' सारे वैसे हो गए। तो क्या मेरी ये समझ सही है?
और जो अभी आपने कहा कि क्योंकि, मैं भी ये देखता हूँ कि अगर सही संघर्ष नहीं होता जीवन में, तो वो बेचैनी अंदर से शुरू हो जाती है। तो सही संघर्ष का चुनाव ही एक 'मीन' होगा — 'टुवर्ड्स द एंड' — जो कि, जिसको हम आनंद कहते हैं, या जिसको 'जॉय' कहते हैं,
आचार्य प्रशांत: हम जिसको जो कुछ भी कहते हैं, वो हम नहीं कहते हैं वो हम सुनी-सुनाई बात को सिर्फ़ दोहराते हैं। हमें क्या पता आनंद जैसा कुछ होता है? हमें क्या पता 'जॉय' जैसा कुछ होता है?
आप 'एंड' कह रहे हो ना — अंत। अंत, जिसके लिए सब कुछ है। जो आख़िरी बात है, वो अंत है। आप अंत हो। आप अंत हो। ख़ुद को जानो, "मैं हूँ कौन?" मेरी आनंद की भी परिभाषा आ कहाँ से गई? ये अंत है। सब कुछ अपने ही लिए होता है। मैं ही अंत हूँ । मेरे अलावा कुछ भी नहीं है, न मेरे अनुभव में, न मेरे कर्म में, न मेरे सरोकार में। सब कुछ मेरे ही लिए तो है। मैं ही तो अंत हूँ ।
ये सारी बात आप किसके लिए कर रहे हो? अपने लिए कर रहे हो। आप अंत हो। और अगर मैं अंत हूँ , तो मुझे पता तो चले मैं हूँ कौन? मुझे पता ही नहीं चला मैं हूँ कौन, और मैंने एक उधारी का ‘मैं’ खड़ा कर लिया। उसकी उधारी की परिभाषाएँ और उसकी संतुष्टि के लिए काम करना शुरू कर दिया — तो सब बर्बाद ही गया, व्यर्थ ही गया।
बात आ रही है समझ में?
वेदांत कहता है, ये भी मत बोलो कि जीवन आनंद के लिए है। जैसे ही कुछ उठे मन में, पूछो — ये आया कहाँ से? क्योंकि "मैं" अपने आप में कुछ नहीं है। जो भी कुछ तुमने इधर-उधर से जोड़ पकड़ रखा है, वही "मैं" बन जाता है। आनंद वाली बात भी कहीं से उठा ली होगी। कहाँ से, क्या उठा लिया ये देखते चलना। और जो कुछ अपना नहीं है, उसको बस जानते चलना, ये मेरा नहीं है।
ये बात भी मैंने कहीं से उठा ली है। ये भी मैंने कहीं से सोच लिया है। ये लक्ष्य भी मेरे मन में कहीं से बैठा दिया गया। ये फलानी चीज़, जिसको मैं अपना विचार कह रहा हूँ, ये सिर्फ़ एक शारीरिक वृत्ति है। फलानी बात, जिसको मैं अपनी भावना कह रहा हूँ या मैं अपनी ममता कह रहा हूँ — ये भी सिर्फ़ एक शारीरिक रसायन है। ये जानना।
उस ‘मैं’ के बिना आप आनंद की भी बात करोगे, तो भी चूक जाओगे। गड़बड़ हो जाएगी। बहुत पास आकर भी आप दूर रह जाओगे। हाँ, ये बिल्कुल ठीक है — ‘सच्चिदानंद घन’ बिल्कुल। और आत्मा के निकटस्थ बिल्कुल, ‘आनंदमय कोश’ होता है। बिल्कुल। लेकिन बड़ा ख़तरा है, आप किसी आम साधारण तरह की खुशी को ही ‘आनंद’ बोलना शुरू कर सकते हो। जो आपकी सबसे व्यर्थ तरह की कामना हो, व्यर्थ लेकिन बड़ी आकर्षक, वो पूरी होने लग जाए आप कह सकते हो "आनंद आ गया।"
आपको कैसे पता? आनंद माने क्या? किसके लिए है वो? उसको जानना ही ‘एंड’ है।
"आइ ऐम द एंड, यू आर द मेज़र ऑफ़ ऑल थिंग्स।" सब कुछ तुम्हारे लिए है। जीना तुम्हें अपने ही साथ है। जीना अपने ही साथ है, और आप जिस स्थिति में आ गए हो जन्म लेकर के, उस स्थिति में आपको 50 तरीक़े से चारों तरफ़ से बस घेरा जाता है। घेरा जाता है। जीना अपने साथ है। ये सब घेरते हैं ताकि आप अपने आप से अलग हो जाओ। तो फिर जीवन का मतलब ही संघर्ष है। आपको
आपसे अलग करने के लिए है ये जन्म, दुनिया, संसार। और आपको संघर्ष करना है। आपको कहना है — "नहीं, नहीं, प्रेम की बात है। मेरा मुझसे प्रेम।"
ज्ञान की भाषा में इसको बोल देते हैं कि "अहम् का आत्मा के प्रति झुकाव।" भक्ति में इसको कह देते हैं "भगवान के प्रति अनुराग।" पर ये प्रेम की बात है हम अलग नहीं होंगे। तुम सब लगे हुए हो बस इसी में कि हम अलग हो जाएँ, नहीं — मुझे मेरे पास रहने दो। वही जो है, जिसके पास मुझे रहना है, उसे आत्मा कहते हैं। आत्मा भी माने क्या? मैं।
जिसको आप ‘फिलॉसफ़ी’ कह रहे हो वो सब व्यर्थ हो जाएगी अगर वो — दुनिया भर की बातें करना है ‘फिलॉसफ़ी’ नहीं है। अपनी बात करना ‘फिलॉसफ़ी’ है। ये कैसा है? ये कैसे हो गया? ये हो गया, वो हो गया। ये ठीक है, ये ‘फिलॉसफ़ी’ का एक बाहरी हिस्सा हो सकता है। पर सब दर्शन के केंद्र में ‘आत्मदर्शन’ बैठा हुआ है।