मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?
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आचार्य प्रशांत: मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?
या प्रेम ऐसी चीज़ है, जिसको करने के लिए कोई पात्रता ही नहीं चाहिए? तो कहेंगे, “आचार्य प्रशांत, तुम नहीं समझोगे। ये दिल की बात है दिल की, तुम जैसे पत्थर-दिल आदमी को नहीं समझ में आएगी। अरे, किताबों से बाहर निकलो, बाग़ीचों में उतरो, तितलियों के साथ खेलो, फिर तुम्हें पता चलेगा इश्क़ किसको कहते हैं। तुम्हारे जैसे पाषाण-हृदय लोगों के लिए इश्क़ नहीं होता, हमसे पूछो न हम जानते हैं।”
तुम कैसे जानते हो? बोले, वो जो जुल्फें उड़ती है तो इश्क़ है! और ये बड़े से बड़ा अचंभा नहीं है दुनिया का, कि हद दर्जे का नाक़ाबिल आदमी होगा, जो कुछ नहीं कर सकता, लेकिन प्यार ज़रूर करता है। कैसे भाई? कैसे?




