आठवीं क्लास के आशिक

Acharya Prashant

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आठवीं क्लास के आशिक
मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया? यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?

या प्रेम ऐसी चीज़ है, जिसको करने के लिए कोई पात्रता ही नहीं चाहिए? तो कहेंगे, “आचार्य प्रशांत, तुम नहीं समझोगे। ये दिल की बात है दिल की, तुम जैसे पत्थर-दिल आदमी को नहीं समझ में आएगी। अरे, किताबों से बाहर निकलो, बाग़ीचों में उतरो, तितलियों के साथ खेलो, फिर तुम्हें पता चलेगा इश्क़ किसको कहते हैं। तुम्हारे जैसे पाषाण-हृदय लोगों के लिए इश्क़ नहीं होता, हमसे पूछो न हम जानते हैं।”

तुम कैसे जानते हो? बोले, वो जो जुल्फें उड़ती है तो इश्क़ है! और ये बड़े से बड़ा अचंभा नहीं है दुनिया का, कि हद दर्जे का नाक़ाबिल आदमी होगा, जो कुछ नहीं कर सकता, लेकिन प्यार ज़रूर करता है। कैसे भाई? कैसे?

तो कहेंगे, “नहीं ऐसे थोड़ी होता है, आचार्य जी। प्यार करने के लिए कोई योग्यता, पात्रता थोड़ी चाहिए, कोई सर्टिफिकेट थोड़ी चाहिए।” चाहिए भाई चाहिए, ये गलत लोगों ने तुम्हारे दिमाग में गलत शिक्षा भर दी है, कि प्यार तो कुदरती होता है, कि प्यार तो प्राकृतिक होता है, कि प्यार करना तो जानवर भी जानते हैं।

ये मूर्खता की बात है, जो तुम्हें सिखा दी गई है। तुमसे बोल दिया जाए कि प्यार तो एक छोटे बच्चे से सीखो, ये पागलपन की बात है। छोटा बच्चा मोह जानता है, छोटा बच्चा ममता जानता है, छोटा बच्चा आशक्ति जानता है प्रेम नहीं जानता है। प्रेम सीखना पड़ता है। मनुष्य अकेला प्राणी है जो प्रेम जानता है। तुम बेकार की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो, कि प्रेम तो जानवर भी समझते हैं। नहीं, जानवर प्रेम नहीं समझते। जानवर सुरक्षा समझते हैं।

प्रेम तो मूलतः आध्यात्मिक होता है। प्रेम करने की योग्यता तो सिर्फ़ उसकी है, जो मन को समझ गया हो, जो मन की बेचैनी को जान गया हो।

मन की बेचैनी का चैन के प्रति खिंचाव ही प्रेम है। इसके अलावा प्रेम की कोई परिभाषा नहीं।

“आचार्य, देखिए, गलती कर गए न आपने प्रेम की परिभाषा दे दी। अरे, हमसे पूछिए न। हम आठवीं क्लास के लौंडे हैं, लेकिन हम आपको बताए देते हैं कि इश्क़ वह है जिसे लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं किया जा सकता। और यह हमें फ़िल्मों ने और शायरों ने बताया है।”

तुम भी मूर्ख, तुम्हारी फ़िल्में भी मूर्ख, तुम्हारे शायर भी मूर्ख। बेचैन हो न, चैन माँग रहे हो न, मन पर यही जो लगातार आकर्षण छाया हुआ है कि कहीं पहुँचकर शांति मिल जाए, इसको ही प्रेम कहते हैं। तो प्रेम सार्थक तब हुआ, जब आप उस दिशा जाएँ जहाँ वास्तव में शांति मिलती हो। लेकिन प्रकृति में जो प्राकृतिक खिंचाव होता है, जिसको आप प्राकृतिक प्रेम बोल देते हैं, उसका ऐसा कोई इरादा नहीं होता कि आपको शांति मिले।

अंतर समझना; प्राकृतिक खिंचाव का नतीजा सिर्फ़ एक हो सकता है, संतान। और आध्यात्मिक शिक्षाओं का नतीजा होती है, शांति। इसीलिए प्राकृतिक खिंचाव सदा पुरुष का स्त्री से होता है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो। क्योंकि प्राकृतिक खिंचाव है ही इसलिए कि या तो रोटी मिल जाए, या घर मिल जाए, सुरक्षा मिल जाए, या सेक्स मिल जाए, संतान पैदा हो जाए। प्राकृतिक खिंचाव इन वजहों से होता है।

आध्यात्मिक खिंचाव किसलिए होता है? उसकी सिर्फ़ एक वजह होती है, शांति मिल जाए। बात समझ में आ रही है? तो जिसको कह देते हो न कि “मैं तो कुदरती तौर पर उसकी ओर आकर्षित हूँ” या कि देखो, प्रेम तो प्राकृतिक होता है, सब जीवों में होता है। वो जो प्रेम है, वो प्रेम की परिभाषा में आता ही नहीं। उसे प्रेम कहना ही नहीं चाहिए। प्रेम करने के लिए पात्रता चाहिए। प्रेम करने के लिए ऐसी आँखें चाहिए जो दूसरे को कम और खुद को ज़्यादा देखने वाली।

तुम्हारी आँखे जा करके दूसरे से ही चिपक गई हैं, तो ये प्रेम की निशानी नहीं है, ये तुम्हारे पशु होने की निशानी है। पशुओं के पास कोई पात्रता नहीं होती। उसके पास काबिलियत ही नहीं कि वो ख़ुद को देख सके, कि मेरे भीतर चल क्या रहा है, इस खोपडी में चल क्या रहा है वास्तव में।

इंसान होने की विशिष्टता है, कि तुम ख़ुद को देख सकते हो, समझ सकते हो। जब तुम ख़ुद को देखोगे, जब तुम्हें अपने भीतर की गड़बड़ का कारण समझ में आएगा। जब तुम्हें अपनी बेचैनी का सबब समझ में आएगा, तभी तो तुम खिंचोगे न समाधान की ओर, चैन की ओर।

समाधान की ओर खिंचना, चैन की ओर बढ़ना, यही प्रेम है।

“जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।” कितनी सीधी परिभाषा दे दी संतों ने।

प्रेम-प्रेम सब कहे, प्रेम ना जाने कोय। जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।

~संत कबीर

पता करना हो कि तुम्हें जो अनुभव हो रहा है अभी, वो प्रेम का ही है या किसी और चीज़ का, तो ऐसे जाँच लेना, कि जिस रास्ते पर तुम्हें ये तुम्हारा प्रेम खींच रहा है, उस रास्ते पर तुम्हें साहब मिलेंगे या कोई और मिलेंगी, ये देख लो।

साहब समझ रहे हो न? कौन? मुक्ति की स्थिति को साहब कह दिया है यहाँ। शांति को साहब कह दिया है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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