सच्चा प्रेम लोरी नहीं, ललकार होता है

Acharya Prashant

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सच्चा प्रेम लोरी नहीं, ललकार होता है
थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: बहुत सस्ता प्रेम होगा, जो शर्तें नहीं रखता। वो प्रेम नहीं है वो कुर्सी है, कोई भी आकर बैठ जाए। शर्तें होनी चाहिए न। शामियाने की कुर्सी और सिंहासन में अंतर होता है। सिंहासन शर्त रखता है, “मुझ पर सिर्फ़ राजा बैठेगा।” और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म की कुर्सी, वो कोई शर्त नहीं रखती। शर्त तो होनी चाहिए, नहीं तो राजा फिर कभी जीवन में आएगा भी नहीं आपके। राजा सिंहासन पर ही मिलता है न? प्लेटफ़ॉर्म वाली कुर्सी पर तो मिलता भी नहीं। जो शर्त नहीं रखेगा, उसको फिर वही मिलेगा, जनरल प्लेटफ़ॉर्म, कोई भी आकर बैठता रहेगा।

थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।

शर्त रखने का मतलब ये नहीं है कि मैं किसी को नीचा घोषित कर रहा हूँ। शर्त रखने का मतलब ये है कि मैं उसे बता रहा हूँ, “तू जो हो सकता है, तू उससे बहुत नीचे चल रहा है। मैं चाहता हूँ तू ऊपर उठे, इसीलिए शर्त रख रहा हूँ।” कुछ भी नहीं है, दूसरे को बेशर्त स्वीकार करने से पहले, चाहे अपनी स्थितियों को बेशर्त स्वीकार करने में हमारा स्वार्थ छिपा होता है। क्या? उसको बोलेंगे, कि “तू बदल, तो हमें भी बदलना पड़ेगा?” न तू बदल, न मैं बदलूँ। तू वहाँ लोट, मैं यहाँ लोटूँ। दोनों ने एक-दूसरे को अनकंडीशनली एक्सेप्ट कर रखा है।

प्रेम अगर सचमुच होगा न, तो वो एक चुनौती की तरह होता है, एक ललकार की तरह, लोरी की तरह नहीं। हमारा प्रेम नशीली लोरी होता है, जो जाग रहा हो, उसे भी सुला दे।

और बड़े हम खुश होते हैं कि देखो, क्या मीठी लोरी है। एकदम सो जाते हैं हम। प्रेम वो है, जो सोते हुए को उठा दे। क्या ललकार मारी! उठ गए बिल्कुल। अब आया न ज़िंदगी में प्रेम। पर ऐसा प्रेम बड़ा मुश्किल है, चाहिए किसको। सो रहे थे, बिस्तर से गिर पड़े। ललकार मार दी। ललकार उधर से, चीतकार इधर से। लोरी वाला ठीक रहता है, तुम गाओ, मैं सो जाऊँ, सुख-सपनों में खो जाऊँ।

कुछ आ रही है बात समझ में?

आप किसी दुकान में जाइएगा, जहाँ मालिक सिख हों वहाँ निश्चित रूप से गुरु नानक साहब का चित्र लगा होगा। और ये बहुत अच्छी बात है। पर आप उसमें देखिएगा, आशीर्वाद की मुद्रा में उनका हाथ कैसे दिखाया गया है। उनका हाथ एकदम सुकोमल। जबकि नानक साहब ने ज़िंदगी भर क्या किया था? यात्राएँ की थीं। और यात्राओं से वापस आते थे, तो क्या करते थे? खेती करते थे। किसान के हाथ देखे हैं कैसे होते हैं।

लेकिन अगर हमने दिखा दिया कि ये आदमी कितना कर्मठ था, कितना जुझारू था, कितना मेहनती था, तो फिर हमें भी…। तो फिर हम उनका हाथ ऐसे दिखाते हैं जैसे बच्चे का कोमल, सुकोमल हाथ हो।

आज दिवाली है राम-सीता की आप पुरानी प्रतिमाएँ देखिए या चित्र देखिए। वो ऐसे खड़े दिखते हैं जैसे जिन्होंने चौदह साल जंगल में गुज़ारे हैं उनकी खाल कैसी हो जाएगी? कैसी हो जाएगी? उनका पूरा शरीर कैसा होगा? पर आप देखिए चित्रण कैसा करते हैं हम। हमें कभी ये बताया ही नहीं जाता कि अध्यात्म का मतलब ही संघर्ष है। वहाँ ऐसा दिखाया जाता है जैसे ये लोग तो आराम कर रहे थे। ये तो आराम कर रहे थे।

अरे भाई! चौदह साल जंगल में! कितनी जगह चेहरे पर निशान पड़ गए होंगे, स्कार्स, वही जो सुरमा का पदक होते हैं। वो कभी दिखाए गए? नहीं। रंग गोरा ही रह जाएगा? और क्या गोरा-गोरा रंग दिखा देते हैं। कपड़े ऐसे दिखा दिए जाते हैं जैसे अभी-अभी जाकर के मॉल से निकालकर के पहने हैं। जो जंगल में भटक रहे हैं उनके वस्त्र कैसे होंगे? कभी दिखाए गए?

तो हमें पता ही नहीं चल पाता कि अध्यात्म का अर्थ ही संघर्ष होता है। अगर आपको दिखाया जाता कि देखिए, सीता जी कैसे संघर्ष कर रही हैं, तो महिलाओं में भी संघर्ष का भाव आता। आपको सीता जी का संघर्ष कभी दिखाया ही नहीं जाता। आपको बस दिखाया जाता है, वो सुकोमल बस खड़ी हैं आशीर्वाद देने को।

उनके तो चेहरे पर गर्जना है। ऐसा थोड़ी कि उन्होंने तिनका दिखा दिया और रावण पीछे हट गया। रावण तिनके से नहीं हटने वाला था। तेज कुछ ऐसा था कि थर्रा गया था रावण, पीछे हटा था। जो असली बात हुई होगी, वो समझो। कुछ बात रही होगी न, कि इतने दिन वहाँ रही और रावण हाथ नहीं लगाने पाया। चौदह बरस की वनवासिनी स्त्री है, उन्होंने तेज अपना जागृत किया है। वो तेज हमें कभी दिखाया जाता है?

और छोड़िए, कभी आप बस “श्रीकृष्ण अर्जुन” लिखकर गूगल कर दीजिए इमेज, इमेजेज़ लिख दीजिए। अर्जुन ऐसे आते हैं, माने हाथ उनके ऐसे मुलायम-मुलायम, कि जैसे कोई रसोइया जिसने ज़िंदगी में कढ़ाही से ज़्यादा वज़नी कुछ उठाया न हो। और वहाँ उनकी प्रत्यंचा की टंकार! और श्रीकृष्ण उन्हें क्या बोल रहे हैं? “महाबाहो!” महाबाहो के बाहु देखिएगा जो हमारी प्रतिमाएँ रहती हैं उनमें। कैसे रहती हैं?

हमें ये जानने ही नहीं दिया जाता कि ये मामला मजबूत लोगों का है। तो हमारी कमज़ोरी को ठिकाना मिल जाता है, हम छुपे रह जाते हैं। सबके चेहरे ऐसे, बस यही तो कर रहे थे ज़िंदगी में, तभी तो इतना कुछ कर पाए। अब बुद्ध बारह साल, जब तक जिए तब तक भटके। लेकिन आपको दिखाया क्या जाएगा हमेशा? कि बैठे हुए। और बैठना छोड़ दो, लेटे हुए हैं। जैसे विष्णु की शेषनाग वाली मुद्रा दिखाई जाती है, बिल्कुल वैसे ही, कि बुद्ध भी ऐसे लेटे। अरे! उन्हें लेटने का कब मौका मिलता था?

पर जिन लोगों की ज़िंदगी लेटे-लेटे गुज़र रही है, वि यही देखना चाहते हैं कि बुद्ध भी लेटे हुए थे। कभी बुद्ध का संघर्ष दिखाया? कभी उस आदमी का तड़पता हुआ चेहरा दिखाया? और बुद्ध बहुत तड़पे थे। पर हमें बुद्ध का तड़पता चेहरा कभी दिखाया नहीं जाता। दिखाया जाता है? ये गड़बड़ है न। हमें तो ये दिखाया जाता है, कि ये तो बस शांति में थे, शांति में थे, शांति में थे, शांति वाले लोग थे। यही गड़बड़ है।

एक छवि पकड़ ली है, शांत। बस शांत-शांत। शांत-वांत कुछ नहीं होता, बहुत मेहनत लगती है, जूझना पड़ता है, टूट जाते हो भीतर से। तब जाकर के आत्मा उठती है। इतना नहीं होता। और वो जो शांति वाली छवि बना ली है, उससे बहुरूपियों का काम आसान हो गया है। उन्हें पता है कि शांत अपने-आप को दिखा दो, तो संत कहला जाओगे। तो सब शांत होकर ऐसे बैठ जाते हैं और जाते हैं, महाराज, महाराज, महाराज।

शांत और दूसरा स्थिर, ऐसे। मेरे पीछे पड़े हुए हैं। बोलते हैं, बात करते वक़्त पाँव क्यों हिलाते हैं? इससे पता चलता है कि इनका चित्त स्थिर नहीं है। कभी पाँच घंटे बैठना, तब पता चलेगा कि क्रैम्प्स आते हैं, पाँव हिलाने पड़ते हैं, नहीं तो पाँव वहीं पर जम जाएँगे। पर तुम झूठी छवियाँ पकड़कर बैठे हो। बिना कुछ बोले, बिना कुछ करे भी पाँच घंटे कहीं बैठकर देख लो कि पूरा शरीर कैसे जाम होता है।

शरीर को हिलाना पड़ता है ज़बरदस्ती ताकि चलता रहे। और ये एक दिन की बात नहीं है। जब महीने में पच्चीस दिन बैठना पड़ता है न, तो उसके बाद हड्डियाँ और मांसपेशियाँ, खासतौर पर अगर इंफ़्लेमेटरी डिज़ीज़ हो सब जाम हो जाती हैं। अपर बॉडी तो फिर भी चल रहे हैं, पर पाँव का क्या करें? तो पाँव चलाने पड़ते हैं। पर ये बात कोई नहीं बताता कि बात करना भी एक संघर्ष है। कोई बताएगा नहीं न। आपको तो बस ये बताया गया कि वो पालथी मारकर बैठे हैं, लोटस पोज़। काहे का लोटस?

सच्चाई खुरदुरी होती है। सच्चाई की खुरदराहट से हमारी खाल छिल जाएगी, तो हमें सच्चाई को एकदम कोमल करके दिखाई जाती है, क्योंकि हम देखना चाहते हैं वैसे ही।

जहाँ देखो, अवतारों को सफ़ाचट, क्लीन-शेव। जंगल में कहाँ से मिलता था उनको उस्तरा? और वो भी रोज़-रोज़ की एकदम साफ़, सोच कर देखो। पर बुद्धि का अध्यात्म में कोई स्थान नहीं न। आपको उनकी असली शक्ल दिखा दी जाए तो सोचिए सचमुच कैसी होगी। उनके व्यक्तित्व के एक-एक तत्त्व में उनके संघर्ष की गाथा होगी। चेहरे पर चोटों के निशान, उलझे हुए बाल, बेतरतीब दाढ़ी, फटे हुए वस्त्र, मजबूत शरीर। और जब ऐसा होता है न, तब आँखों में तेज़ होता है।

वो सब हमें दिखाया नहीं जाता। तो हम भी कोमल-कोमल, कोमल-कोमल बन के घूम रहे हैं। मैं तो कहता हूँ, वो भी ख़ुद बोल रहे हैं, “सब जग जलता देख के हुआ कबीर उदास” और “दिया कबीरा रोए।” अरे, कभी उनको रोते हुए भी तो दिखा दो न। नहीं दिखाते। और वो बहुत रोते थे, मुझे पता है।

क्यों नहीं दिखाते उनको रोते हुए? क्योंकि उनकी रोती हुई शक्ल हमारे सुख में डूबी हुई शक्ल पर तमाचा हो जाएगी। वो आदमी रो रहा है और तुम ठहाके मार रहे हो। यही तुम्हारी ज़िंदगी है। तुमसे बर्दाश्त नहीं होगी उनकी रोती हुई शक्ल। तो तुम उनकी शक्ल ऐसे दिखाते हो कि वो तो शांत बैठे हैं बिल्कुल। शांत नहीं बैठते, अध्यात्म बहुत रुलाता है।

सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना। है न? आँख का दरिया डूब के जाना। आँख का दरिया हो न हो अपने आँसुओं का दरिया ज़रूर होता है। वो सब कभी नहीं बताया जाता।

बोल देंगे, वो तो भगवान थे तो उनके पास दिव्य शक्ति थी तो उन्होंने एक पल में भस्म कर दिया। मेहनत करते हैं, एक पल में कुछ नहीं हो जाता। वो मेहनत हम मानना नहीं चाहते कि की गई। तो हम कह देते हैं, भगवान थे, दिव्य शक्ति थी, एक पल में भस्म कर दिया। अगर भस्म किया तो बहुत मेहनत करके किया। दिव्य शक्ति से कुछ नहीं भस्म कर दिया।

हम उस मेहनत के तथ्य को बिल्कुल अस्वीकार कर देना चाहते हैं। मान लिया उन्होंने मेहनत करी थी तो हमें भी करनी पड़ेगी न। तो तब ये मान लो कि वो तो बस उन्होंने अभिमंत्रित बाण चलाया और मार दिया। तो मर गया वो।

हमें हमारे ज्ञानियों का, ऋषियों का कराहता हुआ चेहरा चाहिए। ललकारता हुआ चेहरा चाहिए, टूटता हुआ चेहरा चाहिए। और हम देखना चाहते हैं कि जब सब कुछ टूट रहा हो, तब भी वो कौन-सी चीज़ है जो भीतर जुड़ी हुई रहती है। उसी को आत्मा कहते हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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