थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।
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आचार्य प्रशांत: बहुत सस्ता प्रेम होगा, जो शर्तें नहीं रखता। वो प्रेम नहीं है वो कुर्सी है, कोई भी आकर बैठ जाए। शर्तें होनी चाहिए न। शामियाने की कुर्सी और सिंहासन में अंतर होता है। सिंहासन शर्त रखता है, “मुझ पर सिर्फ़ राजा बैठेगा।” और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म की कुर्सी, वो कोई शर्त नहीं रखती। शर्त तो होनी चाहिए, नहीं तो राजा फिर कभी जीवन में आएगा भी नहीं आपके। राजा सिंहासन पर ही मिलता है न? प्लेटफ़ॉर्म वाली कुर्सी पर तो मिलता भी नहीं। जो शर्त नहीं रखेगा, उसको फिर वही मिलेगा, जनरल प्लेटफ़ॉर्म, कोई भी आकर बैठता रहेगा।
थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।
शर्त रखने का मतलब ये नहीं है कि मैं किसी को नीचा घोषित कर रहा हूँ। शर्त रखने का मतलब ये है कि मैं उसे बता रहा हूँ, “तू जो हो सकता है, तू उससे बहुत नीचे चल रहा है। मैं चाहता हूँ तू ऊपर उठे, इसीलिए शर्त रख रहा हूँ।” कुछ भी नहीं है, दूसरे को बेशर्त स्वीकार करने से पहले, चाहे अपनी स्थितियों को बेशर्त स्वीकार करने में हमारा स्वार्थ छिपा होता है। क्या? उसको बोलेंगे, कि “तू बदल, तो हमें भी बदलना पड़ेगा?” न तू बदल, न मैं बदलूँ। तू वहाँ लोट, मैं यहाँ लोटूँ। दोनों ने एक-दूसरे को




