प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य के प्रति प्रेम में कैसे पड़ गये?
आचार्य प्रशांत: उसका दुपट्टा हरा था। (श्रोतागण हॅंसते हैं) और चूड़ियाॅं खनक रही थीं और कजरारे नैनों की तीखी धार थी। बिलकुल छुरी चल गयी। ऐसे बताऊँ या ऐसे बताऊँ कि कार्बन टेट्रा-फ्लोराइड और अमोनिया मिले और दस एटमॉस्फेरिक प्रेशर का दवाब था। और आठ-सौ-साठ डिग्री का तापमान था और बेरियम कैटलिस्ट था तो रिएक्शन हो गया। कैसे बताऊँ?
अरे, कैसे भी नहीं होता पागल! तुम्हें ऐसे होता है क्या? चलो, परमात्मा के प्रति प्रेम को छोड़ो, जिसको तुम साधारण प्रेम कहते हो वो भी प्रक्रियागत होता है क्या? बताते हो कि अभी प्रेम के पहले चरण में हैं। अभी उसके चरण देख रहे हैं। फिर प्रेम का दूसरा चरण आया, अब घुटने देख रहे हैं। आगे के चरण! ऐसे होता है या बस होता है? क्या पूछ रहे हो?
प्र: आचार्य जी, क्या ईश्वर के सम्बन्ध में धारणा बनाकर हम ईश्वर तक पहुॅंच जाऍंगे?
आचार्य प्रशांत:जिसको तुम धारणा बनाकर पकड़ रहे हो, तुम्हें कैसे पता वो है भी या नहीं? प्रॉब्लम नहीं है। वो तो बात ही फूहड़ हो गयी न कि तुम कहो कि मैंने पहले धारणा बनायी कि मेरे भगवान ऐसे हैं और इतने सुन्दर हैं। और फिर मैं उस धारणा के प्रेम में पड़ गया। धारणा किसकी है?
प्र: हमारी।




