
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमारे जो ये रिलेशनशिप्स होते हैं, उसमें हम ये दावा तो करते हैं कि अनकंडीशनल लव है, पर एक इंसान ट्राय करता रहता है कि रिलेशनशिप टूटे नहीं और एक इंसान बार-बार गिव अप कर देता है, कि मुझसे और हो नहीं रहा। वो ये दावा करता है कि नहीं मैं भी प्यार करता हूँ, पर वो गिव अप कर देता है। तो क्या वो प्यार करता है? और जो बार-बार ट्राय करे जा रहा है, वो भी कभी तो फ्रस्ट्रेट हो ही जाएगा, पर वो प्यार करता है। आपको मेरा क्वेश्चन समझ में आया?
आचार्य प्रशांत: नहीं समझ में आया, पर फिर भी बोल दूँगा। तुम लोगों की बातें ऐसी होती हैं कि ख़ुदा न समझे, मैं कैसे समझूँगा?
(श्रोतागण हँसते हैं)
तो सोनाली का सवाल, मेरी छोटी सी समझ के अनुसार ये है कि क्या प्रेम में धैर्य अनंत होता है, या कोई बिंदु आता है जहाँ पर आदमी डोर तोड़ भी देता है, साथ छोड़ भी देता है, और अगर कोई साथ छोड़ने की बात करे तो क्या इसका अर्थ है कि उसका प्रेम अवास्तविक था, नकली था। स्पष्ट है सबको? बोलूँ?
पकड़े रहना या छोड़ देना ये दोनों व्यवहार की बातें हैं, और व्यवहार तो व्यवहार होता है। व्यवहार को लेकर के कोई आत्यंतिक सूत्र नहीं दिया जा सकता। जैसे कि आपको कोई सूत्र दे कर नहीं बताया जा सकता कि हाथ ऐसे ही चलना चाहिए (आचार्य जी हाथों को सामने बढ़ाते हुए) या ऐसे ही चलना चाहिए (आचार्य जी हाथों को बाईं ओर बढ़ाते हुए), या मुट्ठी भींचे, या हथेली खुले। बात ह्रदय की है, केंद्र की है, स्रोत की, माने शुरुआत की है।
पकड़े हुए ही क्यों हो? छोड़ने की प्रेरणा कहाँ से आ रही है? बहुत हैं जो आजन्म पकड़े रहते हैं, वो कहते हैं “हम वफ़ादारी निभा रहे हैं, हम-सा प्रेमी दूसरा नहीं होगा।” पकड़े रहने का अर्थ आवश्यक रूप से वफ़ादारी नहीं होता। तुम पकड़े इसलिए भी रह सकते हो क्योंकि डरते हो, तुम पकड़े इसलिए भी रह सकते हो क्योंकि पकड़ने में सुविधा है, या पकड़ने की आदत लग गई है। सिर्फ़ इसलिए कि तुमने अपने जीवन में किसी को स्थापित ही कर लिया है, ये तो नहीं कहा जा सकता कि हृदय प्रेमपूर्ण है।
इसी तरह छोड़ देने को देखकर भी कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। प्रश्न ये है कि छोड़ने वाला कौन है? छोड़ तुम इसलिए भी सकते हो कि कल तक तुम्हारे हितों की पूर्ति होती थी, आज नहीं हो रही, तुमने छोड़ दिया। छोड़ तुम इसलिए भी सकते हो क्योंकि कल तक तुम्हें साथी से, प्रेमी से — जिसके साथ हो, उससे फ़ायदा मिलता था। आज नहीं मिल रहा फ़ायदा तो छोड़ दिया, और छोड़ने के पीछे दूसरा स्रोत भी हो सकता है। तो आचरण को लेकर, व्यवहार को लेकर, कोई नियम न बनाओ, न माँगो। ये पूछो ही मत कि बने रहें कि त्याग दें?
धर्म आचरण की बात नहीं है, धर्म सही जगह पर पहुँचने की बात है, सही केंद्र से जीने की बात है।
आप सब लोग इस जगह पर पहुँचे हैं, हमारी बात-चीत हो रही है। आप कहाँ से आईं (किसी श्रोता से पूछते हैं)? आप दिल्ली से आईं। आप कहाँ से आए (दूसरे श्रोता से पूछते हैं)? आप पुणे से आए। आप दोनों एक ही दिशा से आए क्या यहाँ? (वो असहमति जताते हैं) तो जब ये दोनों चल रहे होंगे, यात्रा गति कर रहे होंगे, तो उनको देखें (दूसरे श्रोता से) तो उनकी गति ज़रा पश्चिम की ओर थी, इनको देखें (पहले श्रोता से) तो इनकी गति दक्षिण की ओर थी।
कोई आ रहा है पुणे से मुंबई, और कोई आ रहा है दिल्ली से मुंबई; दोनों का अगर आप आचरण देखें, दोनों का चरना देखें; ‘चरना’ माने — गति करना। तो दोनों की गति अलग-अलग थी, कि नहीं थी? एक की गति किधर को थी? लगभग दक्षिण की ओर, और एक की गति किधर को थी? लगभग पश्चिम की ओर। अगर आचरण को लेकर के कोई सूत्र, कोई सिद्धांत बना दिया गया होता तो निश्चित रूप से हमें ये कहना पड़ता कि या तो ये (पहले श्रोता) अधर्मी हैं, या ये (दूसरे श्रोता) अधर्मी हैं। क्योंकि दोनों ही एक सा आचरण तो कर नहीं रहें।
बात ये नहीं है कि आचरण क्या है, बात ये है कि चाह क्या रहे हो? कहाँ को जा रहे हो? निगाहें किस पर हैं? मंज़िल सही है कि नहीं? और मंज़िल अगर सही है, तो दिशा से अंतर नहीं पड़ता, जिस भी दिशा मंज़िल हो वही दिशा सही है। प्रेम का अर्थ, इस बात को ध्यान से समझ लेना।
प्रेम का अर्थ किसी व्यक्ति के प्रति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार नहीं होता।
लव इज़ नॉट अबाउट एग्ज़िबिटिंग अ पर्टिकुलर काइंड ऑफ़ बिहेवियर टुवर्ड्स अ स्पेशल ऑर पर्टिकुलर पर्सन।
थोड़ी देर पहले हमने बात करी थी सहलाने-बहलाने की, और सहलाने-बहलाने को प्रेम से मन बहुत जोड़कर देख लेता है न? तुम्हारे लिए ही बड़ा मुश्किल हो जाए, अगर कोई सहलाए-बहलाए न, कि तुम कह पाओ कि वो मुझे प्रेम करता है। जिन्हें तुम प्रेमी भी मानते हो, वो तुम्हें ज़रा सा डाँट दें, तुम्हें तकलीफ़ हो जाती है। और अगर दो-चार दिन लगातार कड़वा व्यवहार कर दें तो तुम्हें शक हो जाता है कि इनका प्रेम अब कम पड़ रहा है। बोलो हाँ या ना?
जहाँ कहीं किसी ने तुमसे दो खरे-खरे बोल बोले, तहाँ मन में पीड़ा उठती है। उठती है कि नहीं? बुद्धि भले ही ये बता दे कि तुमसे जो बोला गया है दूसरे व्यक्ति के द्वारा, वो तुम्हारे भले के लिए ही है। लेकिन फिर भी भीतर कुछ है जो इसी उम्मीद में रहता है कि हमें सहलाया जाए, हमें बहलाया जाए। कोई हमारी ओर क्रुद्ध निगाहों से न देखे, कोई अनुशासन में न रखे हमें, कोई हमारे दोषों की ओर इंगित न करे और दोष अगर बताने भी हों तो बड़े मीठे तरीक़े से बताओ। एक बार को सुन भी लेंगे कि हमारी ग़लती है, पर वो ऐसे बताओ हमें जैसे चाशनी चटाई, नहीं तो तुरंत कहोगे “बेबी यू डोंट लव मी एनीमोर।” निकलता है?
इस भ्रान्ति पर चोट करिए, इस भ्रान्ति को जानिए कि ‘भ्रान्ति’ है। पिक्चरों ने हमारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। वहाँ तो प्रेम का मतलब ही हो जाता है – मुस्कुराहट, सौम्य स्पर्श। हमें प्रेम से तो कोई मतलब ही नहीं रहा, हमारा ज़्यादा वास्ता अब प्रेम से संबंधित छवियों से हो गया है। है न? दो लोग एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कुरा रहें हों, एक छवि आपको ये दिखाई जाए, और दूसरी छवि दिखाई जाए कि दो लोग हैं और एक-दूसरे को ज़रा तर्रा के, टेढ़ी नज़रों से देख रहें हैं। और आपसे पूछा जाए — बताना इनमें से प्रेमी युगल कौन-सा है? दिल से बताइएगा, किधर को इशारा करेंगे? पहली छवि की ओर कर देंगे न? अब आपको कैसे पता उनके दिलों का हाल? पर हमें दिलों का हाल जानने की ज़रुरत ही नहीं, हम तो छवियों पर जी रहें हैं। कोई मुस्कुरा दिया, हमें लगा प्यार ही करता है। और किसी ने ज़रा रुखाई से बात कर दी तो तुरंत हम कह देंगे कि प्यार नहीं करता।
यही कारण है कि ‘प्रेम’ㄧजो मुक्ति का वाहक होना चाहिए था, बहुत बड़ा बंधन बन गया है। क्योंकि दुनिया जान गई है कि आप प्रेम किसको बोलते हो। सबको पता है कि आपके लिए प्रेम क्या है। तो उनके लिए, सबके लिए, हमारे लिए भी बहुत आसान हो गया है, अपने आपको ये जताना या किसी और को ये जताना कि हम प्रेम करते हैं। कोई भी बहुत आसानी से आपको जता सकता है कि वो प्रेमी है।
सबसे ज़्यादा आसानी से तो दुकानदार जता देते हैं। वो भी भली-भांति जानते हैं कि किन बातों को हम प्रेम का पर्याय समझेंगे, या प्रेम का इशारा समझेंगे। वो उन सारी बातों को अपनी दुकान में इकट्ठा कर के रख लेते हैं, 14 फरवरी को देखिएगा। और आप ऊँचे दाम दे के ख़रीद लेते हैं, क्योंकि प्रेम तो बड़ी सूक्ष्म चीज़ होती है — वास्तविक प्रेम, वो तो पकड़ा नहीं जा सकता था। पर प्रेम की छवियाँ बड़ी सार्वजनिक और बड़ी स्थूल होती हैं, वो पकड़ी जा सकती हैं। और दुर्भाग्यवश हमारी स्थिति ये आ गई है कि हमें प्रेम से नहीं, मतलब रह गया है हमें सिर्फ़ प्रेम की छवियों से मतलब है।
किसी के पास प्रेम बिल्कुल न हो, हमें कोई ऐतराज़ ही नहीं होता। पर कोई प्रेम की छवि न प्रदर्शित करे, हम तड़प जाते हैं। किसी का दिल प्यार से बिल्कुल खाली हो, सूखा हो, हमें फ़र्क़ ही नहीं पड़ेगा क्योंकि दिलों में झाँकने वाली हमारे पास आँख नहीं, पर कोई प्रेम से संबंधित आचरण न दिखाए तो हम बुरा मान जाएँगे।
आपका सिरदर्द कर रहा हो, दूसरा बस पूछ ले दो-चार बार, "सिरदर्द कर रहा है क्या? सिरदर्द कर रहा है क्या?" आपका चित्त प्रसन्न — ये मिला खरा प्रेमी, तीन बार इसने पूछाㄧ सिरदर्द कर रहा है क्या? भले ही वो तीन बार उसकी बात सुन कर सिरदर्द और बढ़ गया हो, क्योंकि सिरदर्द की ये बुरी आदत है उसके बारे में जितना सोचो, उसकी ओर जितना ध्यान दो, वो उतना बढ़ता है। लेकिन हमें बड़ा अच्छा लगता है, कोई सहला गया। प्रेम शय ही दूसरी है, बिल्कुल दूसरी है। लेकिन जैसा मैंने कहा — पिक्चरों ने हमारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। पिक्चर से मेरा अर्थ मूवीज़ ही नहीं है, पिक्चर माने छवि। समझ रहे हो न? प्रेम तलवार की धार है।
प्रेम-प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावे सोय।।
प्रेम का एक ही लक्षण है — साहिब से मुलाक़ात करवा रहा है या नहीं, इसी कसौटी पर कस लेना। “जा मारग साहिब मिलै प्रेम कहावे सोय।” जिसको तुम अपना प्रेमी कहते हो, उसके साथ रहने से साहिब के पास पहुँचते हो या नहीं, अपने आप से ये सवाल पूछ लो। द वन यू आर विथ, डज़ ही हेल्प यू, एनेबल यू टू गेन प्रॉक्सिमिटी विद ‘हिम’? दैट्स द लिटमस टेस्ट। बात आ रही है समझ में?
प्रेम-प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावे सोय।।
जिसको अपना प्रेमी कह रहे हो, वो तुम्हें किसके दर्शन करा रहा है — अपने या साहिब के? जो तुम्हें अपने ही दर्शन कराता रहे और तुम्हारा ही दर्शन करने को व्याकुल रहे कि देवी — दर्शन कराओ, अपने मूल रूप में, और मूल रूप माने क्या? प्राकृतिक रूप, निर्वस्त्र हो जाओ और दर्शन दो। उसको जान लेना कि एक ही तरह का दर्शन जानता है ये। और एक होता है प्रेमी जो कहता है, “हमारी ओर क्या देखते हो? जो देखने लायक है उसकी ओर देखो न।”
अब उसके साथ उलझन होगी, तुम कहोगे — ये प्रेमी कैसा है? न ये हमारी ओर देखता है, और न चाहता है कि हम इसकी ओर देखें। ये कह रहा है, चलो दोनों मिल कर ‘उधर’ देखें। और उधर क्या है ये हमें पता नहीं, इधर क्या है हमें खूब पता है। इधर तुम भी जवान हम हसीन, दोनों आकर्षक, दोनों एक दूसरे की ओर देखें न, क्या अद्भुत मज़ा है। पर ये पगला बता रहा है कि न तुम हमें देखो न हम तुम्हें देखें दोनों आसमान की ओर देखें। आसमान में है क्या? बहुत ध्यान दिया तो एक कौआ नज़र आया। अब उलझन होती है तुम्हें ㄧ ‘कौन सा प्रेमी?’
कोई मिल जाए ऐसा जो दिनभर तुम्हें ही ताकता रहे; लगे फ़िल्मी गाने गुनगुनाने — दिल में हो तुम, आँख में हो तुम, मुँह में हो तुम, नाक में हो तुम। जाने ये साँस कैसे लेते हैं, मुँह-आँख-नाक, जितने शरीर के द्वार है सब में तुम्हीं को भर लिया है। तो बड़ा अच्छा सा लगता है न? कितने ही वंश ऐसे ही बन गए, बढ़ गए। बस दो-चार बार यही गुनगुनाना होता है, दिल में हो तुम, कान में हो तुम, नाक में हो तुम, मुँह में हो तुम — प्रेम डन।
और रही-सही कसर शायरों ने पूरी कर दीㄧ‘रात भर तुम्हारा ही तसव्वुर रहा।’ अहंकार और चाहता क्या है? वो तो अपूर्णता में जीता है, उसे चाहिए कोई जो उससे एक मीठा झूठ बोल दे। क्या मीठा झूठ? कि तुम पूर्ण हो, तुम में कोई कमी नहीं, तुम में कोई खोट नहीं, तुम इतने पूर्ण हो कि हम दिन-रात तुम्हारा ही सुमिरन करते हैं। तो वो प्रेम जो अहंकार से आज़ादी का वाहक बनना चाहिए था, सबसे बड़ी गुलामी बन जाता है। और बड़ी उलझन हो जाएगी जब आप इस कसौटी पर कसेंगे अपने प्रेमी को कि इसने साहब से मिलवाया या नहीं मिलवाया। अधिकांश मामलों में तो खेल ही उल्टा रहता है, आप साहब की ओर जा भी रहे हो तो पीछे से साथी खींच लेगा टाँग।
मैं होटल में कबड्डी का मैच देख रहा था — वहाँ मध्य रेखा है, बीच में। एक पाला इधर, एक पाला उधर और बीच में हैㄧरेखा। अब वो खिलाड़ी पूरी जान लगाकर कोशिश कर रहा है कि रेखा को छू लूँ, इससे पहले कि साँस टूट जाए। बात समझना। जैसे जीवन में साँस टूटती है वैसे कबड्डी का खेल भी तब तक चलता है, जब तक साँस है — साँस टूटी नहीं कि तुम बाहर, और वहाँ पर तो साँस बहुत थोड़ी देर को रहती है। साँस बांधनी पड़ती है वहाँ पर, और बहुत थोड़ी देर को बांध सकते हो तुम। उतनी देर में तुम्हें दूसरे पाले से अपने पाले में वापस आना पड़ता है। खेल में एक अनिवार्यता है कि अपना पाला छोड़ना पड़ेगा, और खेल की ये माँग है कि अपना पाला अगर छोड़ा है तो फिर दूसरे पाले में जा कर, काम पूरा कर के सकुशल वापस भी आ जाना। और दूसरे पाले वालों की लगातार क्या कोशिश रहती है? कि तुम अपने पाले में वापस जाने न पाओ, तुम्हारी साँस यहीं तोड़ दें हम। अधिकांश प्रेमी ऐसे ही होते हैं।
तो मैंने देखा कि वो बेचारा अपने पाले में जाने की कोशिश कर रहा है वापस और पीछे से चार ने उसकी टाँग पकड़ रखी है, और वो लड़खड़ा रहा है और पूरी कोशिश कर रहा है कि किसी तरीक़े से वो रेखा एक बार छू दूँ, मुक्ति मिल जाए। अरे काहे को छूने दें! चारों – 'घोर प्रेमी,' ऐसे प्रेमी न देखे हों। वो मारा गया बेचारा, बहार मुँह लटकाए खड़ा है, कि अब कोई दूसरा साथी झिलाए तो फिर हम वापस आएँ।
साहिब से मिलाना तो दूर की बात है, यहाँ तो जो साहिब की ओर जा रहा हो उसकी भी टंगड़ी पकड़कर खींच लो। और आम प्रेमियों कि दृष्टि में इससे बड़ा अपराध दूसरा नहीं होता कि तुमने हमें छोड़कर साहिब को भी कैसे देख लिया। “हम ही हैं अव्वल, पहला नंबर हमारा होना ही चाहिए। परमात्मा भी हमसे बाद में आता है, हमें ही तको दिन रात।”
बचोगे कैसे? जिधर भी जाओगे फ़िल्मी गाने तो हर तरफ़ हैं न? मैं क्यों ज़िक्र कर रहा हूँ बार-बार उनका? क्योंकि हमारी चेतना किस हद तक प्रचलित सभ्यता से बनी है बल्कि संस्कृति से बनी है, इसका आपको अभी अनुमान ज़रा कम होगा। हमारी चेतना हमारी नहीं है, हमारी चेतना सार्वजनिक है। हमारी चेतना हमने बहार से सोखी है, इसलिए मैं कहता हूँ हमारी चेतना फिल्मों की है। जो बात मैं कह रहा हूँ वो सच्ची है और हर सच्ची चीज़ की तरह ख़तरनाक है। क्योंकि ये बात सुनने वाले से अपेक्षा करती है कि वो अपने रिश्तों को एक नई और साफ़ नज़र से देखे, और फिर जो धर्मोचित बदलाव हो उसको लाए।
तो सोनाली तुम्हें एक बच्चे को — हर्ष, तुम्हें हर्ष को लेकर के जाना है उस द्वार की ओर, और वो तो बच्चा। जो परमात्मा से नहीं मिला वो तो अभी बच्चा। बड़प्पन तो एक ही होता है ㄧ ’बड़े से मिल जाना।’ जो ही कोई अभी उस बड़े से नहीं मिला वो क्या है?
प्रश्नकर्ता: बच्चा।
आचार्य प्रशांत: भले उम्र उसकी अस्सी साल की ही हो, पर उसको यही मानो कि शिशु है। इसीलिए देखते नहीं हो संतों कोㄧउनके सामने कोई भी आए तो क्या बोलते हैं? ‘अरे बच्चा!’ क्योंकि वयस्कता तो तभी आती है जब विराट से मिलन हो जाए, वो हुआ नहीं है तो अपने आप को छौना ही मानते रहो। अब इस छौने को तुमको लेकर के जाना है, और ये बहुत समझता नहीं, समझता होता तो इतनी दूर (विराट से) तो नहीं होता।
ये दूर है इससे सिद्ध हो जाता है कि नासमझ है, और चूँकि ये नासमझ है इसलिए ये अपनी समझ के अनुसार तो वहाँ तक जाएगा नहीं कि जा सकता है? इसे कैसे ले कर के जाओगी वहाँ तक? और ले कर के तो जाना ही है। कैसे भी ले कर के जा सकती हो, प्रेम में सब जायज़ है। बस एक चीज़ नाजायज़ है, कि तुम उसको साहिब की ओर ले जाने की जगह कहीं और ले गई। कहीं और तो क्या ही ले जाते हो, अपने ओर ही ले आते हो।
जैसे भी हर्ष को वहाँ तक ले जाना है, लेकर जाओ। कभी हाथ पकड़ना पड़ेगा, कभी हाथ छोड़ना पड़ेगा, कभी गोद में उठा कर ले जाना पड़ेगा, कभी कंधे पर, कभी एक चपत भी लगानी पड़ेगी, सब चलेगा। क्या नहीं चलेगा? उसको भ्रमित करना नहीं चलेगा। मिलना भी चलेगा, बिछुड़ना भी चलेगा, मिठाई भी चलेगी, जुदाई भी चलेगी — अधर्म नहीं चलेगा।
और इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि तुमने कितना समय, शारीरिक रूप से उसके साथ बिताया। प्रेम का मतलब ये नहीं होता कि हम तुम एक ही घर में रहें, प्रेम का ये नहीं मतलब होता कि हम तुम एक-दूसरे के सामने बैठें, या एक ही बिस्तर पर लेटें। एक और एक मात्र कसौटी क्या है? दोहराइए, ‘साहिब के पास ले गए या नहीं ले गए।’
अगर किसी के साथ रह कर साहिब के पास ले जाने में मदद मिलती है तो उसके साथ रहो, रोज़ रहो। तुम्हें सुविधा न हो तो भी रहो, तुम्हारी जान जाती हो, तो भी रहो। और कभी अगर ज़रूरत ऐसी दिखाई दे कि उसके साथ रहने के कारण ही वो साहिब के पास नहीं जा पा रहा, तो तत्काल उससे कह दो कि तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे क्योंकि तुम्हारे साथ रहते हैं तो तुम हम ही से संतुष्ट हो जाते हो, दूरी ज़रूरी है। बात आ रही है समझ में?
चलो साहिब नहीं समझ में आते, कोई बात नहीं। आप सब प्रौढ़ हैं, आधे लोग तो दैहिक उम्र में मुझसे आगे के हैं ㄧ बच्चे तो होंगे, बहुतों के होंगे। जिनके अपने नहीं हैं उन्होंने भी रिश्तेदारी में आस-पड़ोस में तो बच्चे देखे होंगे, पाले भी होंगे, बड़े भी किए होंगे। बच्चा है छोटा, उसको इंजेक्शन लगवाना है, वैक्सीन है मान लीजिए कोई पोलियो की, या तमाम तरह के और टीके लगते हैं। हमारे समय में तो बहुत सारे लगते थे, अब सुना है कि एक-दो से ही काम चल जाता है।
आप बच्चे को समझा लेंगे कि वायरस क्या होता है और एंटी वायरस क्या होता है? आप उसे समझा लेंगे कि इम्युनिटी कैसे काम करती है, और इम्यूनाइज़ेशन क्या होता है? तो ठीक है भाई, अभी तो उसने समझा नहीं, तो छोड़ दीजिए कि जब समझेगा और अपनी सहमति देगा, तब उसका टीकाकरण होगा। छोड़ देंगे?
जैसे होगा वैसे उसको ले जाएँगे, हाँ ये कोशिश कर लीजिएगा कि असुविधा कम-से-कम हो तो अच्छा। प्रक्रिया में कष्ट कम-से-कम हो तो अच्छा। पर किसी वजह से अगर प्रक्रिया में कष्ट देना भी पड़ता है, तो देना होगाㄧभले बच्चे को बुरा लगे, भले आपको बुरा लगे। या नहीं दोगे? अब बच्चा बोल रहा है “नहीं लगवाएँगे सूई।” तुम कहोगे “जी आपकी इच्छा का सम्मान करते हैं संविधान ने सबको हक़ दिया है, अपनी मर्ज़ी अनुसार जीने का।” ये कहोगे? बच्चा है न। और मैं कह रहा हूँ, ‘अध्यात्म में सब बच्चे हैं,’ वहाँ सिर्फ़ शारीरिक उम्र नहीं देखी जाती। लेकिन जो मैंने बात बोली, वो अहंकार को बहुत रुचेगी, तुरंत उसका अभ्यास मत करने लग जाइएगा।
प्रेम का अर्थ ये नहीं होता कि अपनी इच्छा दूसरे के ऊपर थोप दी, और फिर कह दिया कि देखोㄧबच्चों की इच्छा का सम्मान थोड़े ही किया जा सकता है; हम बड़े हैं हमें हक़ है कि हम अपने इच्छा अनुसार दूसरे को चलाएँ ㄧ यही तो प्रेम है। न बाबा! सर्वप्रथम आपको ये देखना होगा कि आपके मन में दूसरे के हित की कामना है या अपने हित की कामना है। और जब तक आपको इसकी पूर्ण आश्वस्ति न हो, दूसरे के साथ कोई चाल मत चलिएगा।
नहीं तो ये बहुत संभव है कि दूसरे का भला करने के नाम पर आप अपना ही स्वार्थ साध रहें हों। और कह दें कि आचार्य जी ने ही कहा था कि साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी प्रयुक्त करना पर टीका लगवाना तो ज़रूरी है न। तो ये मानती नहीं थी, सुनती नहीं थी, तो हमने खूब झूठ बोल कर इसको लगवा दिए हैं टीके।
तो सर्वप्रथम अपने मन का शोधन करना पड़ेगा, सबसे पहले अपना मन साफ़ होना चाहिए। जब तक तुम्हें यही नहीं पता कि साहब कौन, साहब की भव्यता क्या और साहब के पास पहुँचना ज़रूरी क्यों, तब तक तुम दूसरे को क्या खींच-तान के ले जा रहे हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम साहब को भी अपने स्वार्थ का साधन बना लो। समझ में आ रही है बात? देखो कि तुम्हारा गहनतम हित कहाँ पर है। जब अपना हित समझोगे तो साथ में ये भी समझ जाओगे कि किसी भी अन्य व्यक्ति का हित कहाँ पर है, क्योंकि मूलतया हम सब के हित एक हैं।
स्वार्थ सबके अलग-अलग होते हैं, हित पूरी मानवता का साझा है, हित नहीं अलग-अलग होते। और अगर दिखाई दे कि दो लोगों की इच्छाएँ आपस में टकरा रही हैं, तो समझ जाना कि दोनों अपना-अपना स्वार्थ ही साध रहें हैं, या कम-से-कम उनमें से एक ऐसा है जो स्वार्थ साध रहा है। दो संतों की इच्छाएँ आपस में कभी नहीं टकराएँगी, इसी तरीक़े से दो ज्ञानियों की इच्छाएँ कभी आपस में नहीं टकराएँगी, क्योंकि उनकी इच्छा अब हित के साथ जुड़ गई है और हित तो सबके एक होते हैं। “अपने मन से जानिए मेरे जिउ की बात।”
प्रेम का कबीर साहब ने यही लक्षण बताया है। “अपने मन से जानिए मेरे जिउ की बात”ㄧअपना मन समझ गए अगर तुम तो मेरा मन भी समझ जाओगे। और जब तक अपना मन नहीं समझे हो, उसका टीकाकरण मत करा देना।
अध्यात्म का मतलब ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं होता, दूसरे के ऊपर विधियाँ भी प्रयुक्त करने का अधिकार सिर्फ़ उसको है जो निस्वार्थ-निष्काम हो गया हो।
नहीं तो तुम्हारी विधि फिर विधि नहीं हैㄧवो चालाकी है, धूर्तता है, वो फिर प्रेम नहीं है, कपट है। एक-दूसरे से जुड़ने का, रिश्ता बनाने का ये बड़ा अलग तरीक़ा है। जहाँ तुम कहते हो कि मेरा-तेरा एक ही रिश्ता हो सकता है, तेरा हित और मेरा हित आख़िरी हित। हमारा रिश्ता इसलिए तो हो ही नहीं सकता कि ‘मैं भी डूबूँ और तू भी डूबे,’ ये कोई रिश्ता हुआ? तेरा-मेरा रिश्ता इसलिए तो हो ही नहीं सकता कि तुझे भी क्षणिक शारीरिक उत्तेजना मिले, मुझे भी मिले और शरीर के द्रव्यों में ही हम गोता मारते रहें। ये कोई रिश्ता हुआ? तू मेरे शरीर में घुसा हुआ है, मैं तेरे शरीर में घुसा हुआ हूँ। कौन-सा तीर्थ है वहाँ? आ रही है बात समझ में?
अब दिक्कत ये है कि इस तरह के रिश्ते में ग्लैमर कि बड़ी कमी नज़र आती है। कहते हैं, "ये तो बड़ा रूखा-सूखा लग रहा है, वो लाल-पीली-हरी बत्तियों का क्या हुआ? वो गिटार और वायलिन का क्या हुआ? वो फूल नहीं झड़ेंगे आसमान से? और वो नग़में, वो ग़ज़लें, उनका क्या हुआ?" ये तो दिक्कत है।
पर देखो भाई, ऐसी शायरी भी है जो साहब के लिए की गई है, ग़ालिब भी सूफी ही थे। तुम्हें वो शायरी ढूँढनी पड़ेगी और न मिले तो रचनी पड़ेगी। फूल वैश्यालय में भी होते हैं और देवालय में भी होते हैं, तुमसे किसने कह दिया कि देवालय में फूलों के लिए जगह नहीं। खुशबू सुहाग-रात के बिस्तर पर भी की जाती है और पूजा घर में भी जाती है, तुमसे किसने कह दिया कि असली प्रेम में खुशबू के लिए जगह नहीं। तो ग्लैमर की उतनी भी कमी नहीं है कि है?
फूल और खुशबू एक सुन्दर रिश्ते में भी हो सकते हैं कि नहीं हो सकते? और मैं तुमसे कह रहा हूँ, फूल भी जब तुम स्वार्थ और वासना के लिए इस्तेमाल करते हो तो जान लेनाㄧफूल भी बुरा मानते हैं। कहते हैं, “एक तो हमारी जान गई और दूसरा हमारा इस्तेमाल घटिया। चलो जान की हमें बहुत फ़िक़्र नहीं, आज नहीं तो कल झड़ ही जाते, पर कम-से-कम हमारा इस्तेमाल तो ठीक कर लेते।”
छोटे थे तो स्कुल के पाठ्यक्रम में एक कविता होती थी, जिसमें फूल की इच्छा का ज़िक्र किया गया थाㄧ“पुष्प की अभिलाषा।” याद है किसी को? मुझे याद नहीं।
श्रोता: “चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊँ।”
आचार्य प्रशांत: आगे बोलो।
(श्रोतागण हँसते हैं)
“मुझे तोड़ लेना वनमाली मुझे उस पथ पर देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाते वीर अनेक।”
ठीक?
चलो वो देशभक्ति की बात हो गई। देशभक्ति से भी आगे हैㄧ'साहब की भक्ति।’ पर फूल भी यही कह रहा है कि कहाँ सुरबाला के गहनों के लिए मेरी जान ले रहे हो? तुम्हारी सुरबाला दो कौड़ी की नहीं। कुछ ढंग का इस्तेमाल करो भाई मेरा। बात समझ में आ रही है?
और वो श्रृंगार, वो रस, वो आभूषण, वो आयोजन, वो सौंदर्य — वो अप्रतिम होता है, अपूर्व होता है, उसकी तुलना आप वासना के नृत्यों से नहीं कर सकते। मीरा जब श्रीकृष्ण के लिए नाचती हैं और गाती हैं, और सजाती हैं — उनके बोल, उनकी मिठास, उनका सौंदर्य, उनका नृत्य, उसकी एक झलक भी जिसको मिल गई वो फिर आम स्त्री-पुरुष के भड़कीले सौंदर्य को कई मूल्य नहीं दे सकता।
तो डरो मत, असली प्रेम में जीवन रस से, सौंदर्य से, अलंकार से खाली नहीं हो जाने वाला। बल्कि एक ऊँचा सौंदर्य, एक ऊँचा गीत, एक ऊँचा अलंकरण जीवन में उतरेगा।
अभी तो हमें सुंदरता का कुछ पता ही नहीं, तभी तो सुंदरता के नाम पर ब्यूटी सलून चलते हैं। सुंदरता का हमें पता होता तो मुँह पर हम चीज़ें थोपते? सुंदरता का हमें कुछ पता होता तो हम गहनें धारण करते? ये तो छोड़ दो कि तुम्हें प्रेयसी की आत्मा से मतलब है, तुम्हें तो उसका शरीर भी ठीक नहीं लगता। तुम कहते हो, “अभी शरीर भी ठीक नहीं है, जा गहने पहन के आ।” हम तो ये भी कहें कि, साहब लोगों को बस खाल से प्यार है, तो वो भी झूठ है। हमें खाल से भी नहीं प्यार है, हम कहते हैं, “खाल भी पहले सजाओ।” ये सब बचकानी चीज़ें पीछे छूट जाएँगी, रस ही रस रहेगा।
साहब के बारे में जानने वालों ने जानते हो न क्या कहा है? “रसो वै सः” वो रस स्वरुप ही है। “पी ले प्याला हो मतवाला, प्याला नाम अमीरस का रे” यों ही थोड़े ही बार-बार कहा गया है कि साक़ी है और जाम है। कुछ रस तो होगा ही, रस के बिना कैसा जाम, बड़ा मादक रस है उसकी बात दूसरी है। ये छोटी-मोटी आशिक़ी भूल जाओगे। जिसको उसका ख़ुमार चढ़ गया, वो फिर असली आशिक़ हो जाता है, वो फिर ये दो टके की आशिक़ी नहीं करता।
जीव को एक ही झंझट है – उसका जीव रूप, तो एक ही उसकी हसरत भी है – मुक्ति। तो एक ही फिर उसका प्रियतम भी हो सकता है, वो जो परम मुक्त है। बाक़ी कौन सी आशिक़ी कर रहे हो? किस झंझट में पड़े हो? जो बेड़ियों में है उसे प्यार सिर्फ़ आज़ादी से ही हो सकता है न, तो तुमने किससे प्यार कर लिया? द वन हु इज़ इन फ़ेटर्स कैन जस्टिफ़ायबली लव ओनली फ़्रीडम। नाउ व्हाट आर यू आफ्टर?
इधर-उधर का अंट-शंट प्यार तो वही करेंगे जिन्हें अपनी हालत का कुछ संज्ञान ही न हो। जिन्हें ये पता ही न हो कि उनकी हालत क्या है, वही दो कौड़ियों के प्यार में पड़ेंगे। वो प्यार नहीं है, वो बेहोशी है। अभी लखनऊ से आ रहा हूँ, “शतरंज के खिलाड़ी” याद आ गई। तो दुश्मन की फौजें घुसी आ रही हैं और मियाँ साहब और शेख साहब लगे हुए हैं शतरंज में। क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि वो किस आपदा से घिरे हुए हैं, उन्हें अपनी विपत्ति का कुछ पता नहीं, तो वो मशगूल हैं। घंटा-घंटा भर ले कर के प्यादा सरकाया जा रहा है, और हुक्का। वैसे ही हमें नहीं पता कि हमारी हालत क्या है।
वो भैंसे वाला काला सरदार, भैंसा दौड़ाता चला ही आ रहा है और यहाँ प्रेम-पत्र लिखे जा रहें हैंㄧ“हम जनम-जनम तुम्हारे हैं” और भैंसे वाला बोल रहा है, “तू इस जनम का तो देख ले, बचा कितना है? पचास जनम की क्या बात कर रहा है?” और वो पूछ भी रही हैं, “वादा करो तुम इस जनम नहीं हर जनम हमारे रहोगे।” अरे पगली वो इस जनम का भी वादा करने की स्थिति में नहीं है। उसका ये जनम भी बस गया ही समझो। पर उसे अपनी हालत का ज़रा भी अनुमान नहीं, संज्ञान तो पीछे की बात, उसे अपनी हालत का ज़रा भी कुछ अनुमान तक नहीं है।
जैसे किसी इमारत में आग लगी हो, और एक युवा जोड़ा काम-क्रीडा में मग्न हो। वो न एक दूसरे को छोड़ रहे हैं न बिस्तर को छोड़ रहे हैं, और जितनी आग बढ़ती जा रही है, उतना वो कह रहे हैं “बेबी इट्स वेरी हॉट।” आज तो मामला ज़्यादा ही हॉट है, आज तो देर तक खिंचेगा। तुम्हे पता ही नहीं है कि जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? हमारी हालत क्या है? घर पूरा जल रहा है, तुम किन लफड़ों में फँसे हो? जान बचाओ। भागो! बस थोड़ी सी देर बाद लपटें तुम्हें भी घेर लेंगी।
तुम कहाँ लड़ रहे हो कि आज नाश्ता कौन बनाएगा और तुम मुझे ज़्यादा समय क्यों नहीं देते और तू मेरी माँ का ख़याल क्यों नहीं रखती। माँ को मृत जानो, स्वयं को भी मृत जानो, बच्चे को भी मृत जानो, पत्नी को भी मृत जानो — हम सब मरणधर्मा हैं। अब बताओ तुम कहाँ फँसे हुए हो। चिता पर नाश्ता करोगे? कब्र से पूछोगे कि मेरी माँ को दवा दी कि नहीं दी?
हमने तो नहीं सुना कि जहन्नुम में भी ब्यूटी पार्लर होते हैं, और रहना वहीं है ज़्यादा समय। स्वर्ग में उनकी ज़रूरत नहीं होती, और नर्क में वो पाए नहीं जाते। तो यहाँ इतना समय शरीर को अलंकृत करने में क्यों गवा रहे हो भाई? क्योंकि इरादा ये है कि कोई रीझे, कोई हमें साहब का पर्याय बना ले बल्कि साहब का विकल्प बना ले, कोई हमें इतनी हैसियत दे जितनी वो परमात्मा को भी नहीं देता, ये तो इरादे हैं।
अभी गए दिनों, मैं आई.आई.टी. के अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला, बहुत-बहुत कमा रहे हैं। फिर रात के दो तीन बजे जब सब बिल्कुल टुन्न हो गए, तो मैंने कहा ज़रा बात-चीत की जाए, अब ये बोलेंगे। जब तक ये बेहोश नहीं होते, तब तक सिर्फ़ ऐक्सेंट बोलता है, ये नहीं बोलते। तो मैंने कहा “अब बोलेंगे।” मैंने पूछना शुरू किया “क्या कर रहे हो? चालीस पार कर गए। जब कैंपस से निकले थे तो बात दूसरी थी, इरादे दूसरे। कर क्या रहे हो? और जहाँ तक मुझे याद है — लालची तुममे से कोई नहीं था।” सब मौज में 620 नंबर पर बैठ कर पिक्चर देखने जाते थे, कोई लालची नहीं था। दो रूपए का समोसा, पाँच रूपए का डोसा खाते थे कैंटीन में और मौज में रहते थे।
पहले तो इधर-उधर की बात “नहीं देखो… ये-वो, मैन मस्ट प्रूव हिमसेल्फ … ऐसा-वैसा। मैंने कहा अभी भी ये खुल नहीं रहें हैं, मैंने कहा "तुम थोड़ी और पिओ” सब करना पड़ता है।
(श्रोतागण हँसते हैं)
तो बोले कि अब हवाई जहाज़ उड़ चुका है और इतनी आगे बढ़ आया है कि वापस लौटने जितना ईंधन शेष नहीं है। अब जो जिधर को जा रहा है, उधर को ही जाएगा, अब वापस नहीं लौट पाएँगे। दिख भी रहा है कि गड़बड़ हो गई पर अब बहुत आगे आ गए हैं। और बात हमारी नहीं है, हम अभी भी शायद वैसे जी लें जैसे हॉस्टल में जीते थे, पर कुछ और दिखा कर बहुत सारे रिश्ते बना लिए हैं, वहाँ क्या जवाब देंगे? वहाँ तो रिश्ता बनाया ही ये दिखा कर था कि हम बड़े पुरुषार्थी हैं, बड़े कमाऊ हैं, बड़े कर्मठ हैं। आओ हमारे साथ हमारे साथ आओगे तो हम तुम्हें इस प्रकार का जीवन, इस प्रकार की लाइफ़स्टाइल देंगे। यही वादा कर के कई रिश्ते बना लिए, उनको अपने जीवन में ले आए। अब उनको क्या बोलें? कैसे पीछे हट जाएँ?
ये बात बेबसी भर की नहीं थी, इसमें अहंकार भी शामिल था। तुम चाहते हो कि अपना दम, अपना पैसा, अपनी काबिलियत दिखा कर, किसी की नज़रों में महत्त्वपूर्ण बने रहो। ले देकर बात वही आती है कि हम इतने क़ाबिल और इतने बड़े हैं कि परमात्मा का विकल्प बन जाएँगे। अब हमें साथी को साहब तक पहुँचाने की ज़रूरत नहीं, हम कह रहें हैं कि देखो, हम ही तो साहब हैं। हम इतने बड़े हैं, तुम हमारी ही शरण में आ जाओ, साहब तक जा कर क्या करोगे? ये प्रेम हुआ?
प्रेम पंख देता है, पिंजड़ा नहीं।
यही सवाल करो अपने आप से — तुमने अपने साथियों को पंख दिए या पिंजड़े? और अपने साथियों को भी ऐसे ही देख लो, उन्होंने तुम्हें पंख दिए या पिंजड़े?