जहाँ प्रेम है, वहाँ मोह हो नहीं सकता, और जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम की कोई जगह नहीं है। मोह में सुविधा है, सम्मान है। प्रेम तो सब तोड़-ताड़ देता है—पुराने ढर्रें, पुरानी दीवारें, सुविधाएँ, आपका आतंरिक ढाँचा, और जो सामाजिक सम्मान मिलता है। प्रेम सब तोड़ देता है। प्रेम इतनी ऊँची चीज़ है कि आप उसमें पुरानी व्यवस्था का विरोध नहीं करते, पुरानी व्यवस्था को भूल जाते हो। प्रेम और मोह दो अलग-अलग दुनियाओं के हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रेम और मोह में क्या फर्क होता है?
आचार्य प्रशांत: प्रेम ऐसा है कि जैसे कोई चार दीवारों में कैद है और कैद उसे अखरने लगी है, बाहर की हवा प्यारी लगने लगी है, और बाँसुरी पर दी हुई तान हवा पर बहती हुई, उसकी दीवारों के बीच ही उसको आकर्षित करने लगी है। तो अब उसे दीवारें सुहाएँगी नहीं। दीवारों के भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो सुख दे सकता है, साज-सज्जा है, सुविधा का सामान है; काफी कुछ है जो रुके रहने के लिए लालायित करता है। लेकिन प्रेम का मतलब ही है कि अब रुकेंगे नहीं।
पुरानी, अति पुरानी, प्राचीन दीवारें, ये चाहे सुख देती हों और चाहे रुके रहने के पक्ष में धमकाती हों, इनमें रुकेंगे नहीं। बाहर की ताज़गी, बाहर का संगीत अब आमंत्रित कर रहा है, बाहर जाना है; ये प्रेम है। बाहर से आमंत्रण आता हो तो दीवारों के भीतर जो कुछ है वो और ज़ोर से लपटता है, वो पकड़ेगा। दीवारों के भीतर सामान है, वस्तुएँ हैं, व्यक्ति हैं, विचार हैं, वो सब और ज़ोर से रोकेंगे। पर रुकना नहीं है, बाहर जाना है।
मोह क्या है?




