दूसरों से प्रेम पाने की इच्छा सबसे ज़्यादा उन्हीं में देखी जाती है, जो स्वयं को प्रेम नहीं कर सकते। अगर जीवन में सच्चाई और ऊँचाई नहीं है, तो आप अपने आप को प्रेम नहीं कर पाएँगे। दूसरे आपके दिल के कटोरे में कितना भी प्यार डाल दें, वो कटोरा खाली ही रह जाना है। आप ज़िन्दगी भर यही कहते रह जाओगे कि प्यार नहीं मिला। प्रेम मत माँगो, पात्रता पैदा करो। पात्रता पैदा कर लोगे, तो अपने ही इश्क़ में पड़ जाओगे। ऐसों को फिर बाहर भी बहुत आशिक़ मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें उनकी ज़रूरत नहीं रह जाती।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं ‘स्नेह’ या यूँ कहूँ तो ‘अटेंशन’ की प्राप्ति के लिए कभी-कभी अपने आप को कमज़ोर दिखाती हूँ। मैं ऐसा क्यों करती हूँ?
आचार्य प्रशांत: हम सब पूर्णता में जीना चाहते हैं, हम सब स्वास्थ्य में जीना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे अनुभव में न आए कि हम बीमार हैं, आधे-अधूरे हैं, चिंताग्रस्त हैं, पर ऐसा हो नहीं पाता। हमारा अनुभव ही हमें बता देता है कि हमारी हालत क्या है, स्वयं से ही पूछो तो बात खुल जाती है। तो हम फिर अपने आप को एक विचित्र तरह का हास्यास्पद धोखा देते हैं — हम कहते हैं कि मुझे तो पता है कि मेरी हालत कैसी है, तो अगर स्वयं से पूछूँगा तो जानता हूँ कि जवाब क्या मिलेगा, उत्तर आएगा — स्वस्थ नहीं हो तुम, बेचैन हो, बीमार हो।
हम तिकड़म लगाते हैं, हम दूसरों से पूछते हैं। और दूसरों से अगर हमको सम्मान मिल जाए, स्वीकृति मिल जाए, स्नेह मिल जाए, तो फिर हम अपने आप को जताते हैं अपने आप को साबित करते हैं, — ‘देखा, हम ठीक ही हैं’ उसने कहा — ‘देखा हम सम्मान योग्य हैं, उसने हमें सम्मान दिया’ — ‘देखा हम इस लायक हैं कि हम पर ध्यान दिया जा सके, हमें ध्येय बनाया जा सके, देखो उसने हम पर ध्यान दिया न अभी-अभी।’



