प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
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घायल की गति और है, औरन की गति और। प्रेम-बाण हिरदै लगा, रहा कबीरा ठौर।।
सूरा तो बहुतक मिले, घायल मिला न कोय। घायल कूं घायल मिले, राम भक्ति दृढ़ होय।।
आचार्य प्रशांत: सूरा कौन? जो भिड़ने को तैयार है, आम सूरा जो तोड़ने को तैयार है, जो काटने को तैयार है, जो दूसरे को घायल करने को तैयार है। साहब फ़रमा रहे हैं, उससे बड़ा वह है जो ख़ुद घायल होने को तैयार है।
अहम् आत्मा की ओर बढ़े और घायल न हो, यह हो नहीं सकता। आपको प्रेम हो और आप घायल न हों, यह हो नहीं सकता। जो चोट खाने से डरते हैं, जो दर्द पाने से डरते हैं, फिर प्रेम उनके लिए नहीं है। घाव लेकर उसकी टीस, उसकी पीड़ा में आनंदित रहना सीखना होगा। पता हो कि घायल हैं और फिर भी आनंदित हैं।
हम इतना डर जाते हैं घाव खाने से कि हृदय के ही कपाट बंद कर देते हैं। अब सत्य और हृदय मिलेंगे कैसे? बीच में तो कपाट बंद कर दिए। डर लगता है न, उसके स्पर्श मात्र से घाव आ जाता है। बड़ा प्रेमपूर्ण घाव होता है वो, पर वह छूता नहीं कि बड़ी ज़ोर का दर्द उठता है।




