
घायल की गति और है, औरन की गति और। प्रेम-बाण हिरदै लगा, रहा कबीरा ठौर।।
सूरा तो बहुतक मिले, घायल मिला न कोय। घायल कूं घायल मिले, राम भक्ति दृढ़ होय।।
आचार्य प्रशांत: सूरा कौन? जो भिड़ने को तैयार है, आम सूरा जो तोड़ने को तैयार है, जो काटने को तैयार है, जो दूसरे को घायल करने को तैयार है। साहब फ़रमा रहे हैं, उससे बड़ा वह है जो ख़ुद घायल होने को तैयार है।
अहम् आत्मा की ओर बढ़े और घायल न हो, यह हो नहीं सकता। आपको प्रेम हो और आप घायल न हों, यह हो नहीं सकता। जो चोट खाने से डरते हैं, जो दर्द पाने से डरते हैं, फिर प्रेम उनके लिए नहीं है। घाव लेकर उसकी टीस, उसकी पीड़ा में आनंदित रहना सीखना होगा। पता हो कि घायल हैं और फिर भी आनंदित हैं।
हम इतना डर जाते हैं घाव खाने से कि हृदय के ही कपाट बंद कर देते हैं। अब सत्य और हृदय मिलेंगे कैसे? बीच में तो कपाट बंद कर दिए। डर लगता है न, उसके स्पर्श मात्र से घाव आ जाता है। बड़ा प्रेमपूर्ण घाव होता है वो, पर वह छूता नहीं कि बड़ी ज़ोर का दर्द उठता है।
आज उठा था, पहाड़ी को सुबह-सुबह गा रहा था। प्यार का दर्द है। सुना बेटा, अभी तक है। सुबह भी तीन थे। देखो, मेरा तो ऐसा है कि; सुबह तीन कौन-से थे? जब भी होता है तीन ही होते हैं। उन्हीं तीनों ने गाया था। गाओ, गाओ। सुर में गाना बिल्कुल।
श्रोता: “प्यार का दर्द है मीठा-मीठा, प्यारा-प्यारा; ये हँसी दर्द ही दो दिलों का है सहारा, दो दिलों का है सहारा।”
आचार्य प्रशांत: जिसके लिए दर्द नहीं है उसके लिए प्यार भी नहीं है। आपमें इतनी सिक्योरिटी होनी चाहिए कि आप इनसिक्योर होना बर्दाश्त कर पाएँ। आपमें इतना आनंद होना चाहिए कि आप दुखी होना स्वीकार कर पाएँ। समझ में आ रही बात?
आम आदमी बहुत डर जाता है, घाव देखते ही बहुत डर जाता है। ख़ून से बिल्कुल घबरा जाता है, दुख देखकर पीछे हट जाता है।
प्रेम वह आनंद है जो आपको वियोग का दुख सहने की ताक़त देता है। मात्र प्रेम में ही वियोग झेला जा सकता है।
समझे? “दो दिलों का है सहारा, मीठा।” घायल सो घायल मिले। घाव स्वीकार कर पाना, वल्नरेबिलिटी। जो अब पेने्ट्रेबल नहीं रहा, वो वल्नरेबल हो जाता है। वही अंग्रेजी में अगर आगे बढ़ा करूँ, वो ‘अफ़ोर्ड’ कर पाता है वल्नरेबल होना।
जो वैसा हो जाता है न, कि ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।’ वह कहता है, ठीक है अब स्वीकार करा जा सकता है न, कि पावक आएगी तो जलाएगी नहीं और हवा आएगी तो सुखाएगी नहीं, और तीर आएगा तो छेदेगा नहीं। तो अब हम तीर खाना स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि तीर आएगा भी तो छेदेगा नहीं। अब हम में भीतर कुछ ऐसा ठोस स्थापित हो गया है, कि अब हम घाव खाना, घायल होना, पेने्ट्रेट किया जाना स्वीकार कर सकते हैं।
कमज़ोरी का लक्षण नहीं है, घायल होना या घाव खाना। यह बहुत बड़ी ताक़त का लक्षण है। समझ में आ रही है बात? यूँ ही नहीं ‘घायल’ की महिमा गा रहे हैं। “सूरा तो बहुतक मिले, घायल मिला न कोय।” और सूरा कोई हल्का आदमी नहीं होता है, सूरा की शान में न जाने कितनी बातें कही गई हैं। “सूरा से सूरा मिले फिर पूरा संग्राम।।” और उससे भी आगे की बात बोल दी है, कि “घायल कूं घायल मिले, रामसनी।”
माने सुरमाओं में भी जो एकदम उत्कृष्ट होता है, वह घायल हो पाता है। घायल होना सीखो दर्द के साथ जीना सीखो। सहना सीखो, टूटना सीखो, बिखरना सीखो। जो बिखरना स्वीकार कर लेता है, पक्का समझ लो उस स्वीकार में ही उसने कुछ ऐसा पैदा कर लिया जो बिखर नहीं सकता। और जो बिखरने का विरोध कर रहा है, वह विरोध से ही ये स्वीकार कर रहा है कि मैं भीतर से बिखरा हुआ हूँ। टूटकर भी जुड़े रहना सीखो, “सोना सज्जन साधुजन, टूट जुड़े सौ बार।”
जीवन के सामने नग्न खड़े होना सीखो। कब तक बचते रहोगे? कि अगर सब कपड़े-कवच उतार दिए तो कहीं चोट न लग जाए, कहीं घाव न लग जाए। लगे तो लगे, ठीक है। क्या होगा? ख़ून बहेगा, दर्द होगा, टूट जाएँगे, कोई बात नहीं तब भी जी लेंगे, टूट कर भी जी लेंगे। दर्द के साथ भी चल लोगे। संशय में भी सत्य रखेंगे। और यह मत बनाओ अपने साथ कि वेलनेस का, स्वास्थ्य का, कुशलता का, पैमाना यह होता है कि चोट नहीं लगी हुई है।
डरो मत, न शर्माओ, घायल हो तो अपना नाम घायल बताओ।
जैसे लोग अपने कई तरह के उपनाम रखते हैं न, तुम रख सकते हो, “संजय रावत घायल।” यह बहुत ऊँची बात है, बहुत बड़ा इसके लिए जिगर चाहिए।
पूरी दुनिया को घोषित कर देना कि मैं कौन हूँ? घायल। लगी है चोट, उतर गया है तीर। लेकिन फिर भी हम बिखरेंगे नहीं। इसमें थोड़ी कुछ है कि ऐसे डरे थे कि दुबककर बैठ गए, सब द्वार-दरवाज़े बंद कर लिए हैं कि कुछ हो न जाए। यह बुलेट-प्रूफ ज़िंदगी बड़ी घुटन की होती होगी न, कि नहीं?
अहम् काहे को नहीं जाता है आत्मा की ओर? चोटू लग जाएगी, “मम्मा लग गई।” ज़रा-सी लगती नहीं है कि तुरंत मम्मा की ओर वापस भाग जाता है। और मम्मा तो वहाँ बैठी हैं इंतज़ार में, तू आ। और उधर जाएगा तो पक्का है क्या होगा? लगेगी तो है ही। और उसको लगी, “माँ लग गई।” तुम्हारी लगेगी। समझ में आ रही है बात?
चोट देने से कहीं बड़ी बात है चोट खाना। और ज़िंदगी ऐसी चीज़ नहीं है कि जिसमें तुम पलटकर किसी को चोट दे ही पाओगे। यहाँ जो आता है, चोट ही खाता है। और जो चोटों से डर जाए, घबरा जाए, बिखर जाए, वह फिर संकुचित हो जाता है। जब आप डरे होते हो तो कभी आप ऐसे हाथ भी फैला पाते हो? जो डरा होता है, देखा है उसको कैसा हो जाता है। माने खरगोश हैं, जब वो डर जाते हैं तो बिल्कुल अंडा बन जाते हैं।
कभी डरा हुआ खरगोश देखा है, कैसा हो जाता है? वो सब कुछ भीतर खींच लेता है, वही कछुए की तरह। एकदम ऐसे हो जाएगा, कान भी ऐसे चिपटा लेगा। उसको दूर से देखो तो लगेगा, अंडा रखा हुआ है। न हाथ, पाँव, कान, मुँह, कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा, वो सब एक में।
डरा हुआ साँप कैसा हो जाता है? कुंडली मारकर एकदम ऐसे। डरा हुआ आदमी भी ऐसा ही हो जाता है, संकुचित। जब आप संकुचित हो जाते हो तो आप सुरक्षित हो जाते हो। अभी आप सुरक्षित हो। आपने किस चीज़ को सुरक्षा दे रखी है? अहम् को। और खुलने का मतलब होता है, मैं प्रस्तुत हूँ प्रेम के लिए, प्रेम तो चोट देगा।
अहम् की दो ही अवस्थाएँ होती हैं। जैसे हम बोलते हैं न, आत्मस्थ या प्रकृतिस्थ, उसको ऐसे भी बोल सकते हो: एक, वो जिसके लिए प्यार बड़ा है; दूसरा, वो जिसके लिए दर्द बड़ा है। अब ये आपको तय करना है। ले देकर बात चुनाव पर आनी है हमेशा। ये आपको तय करना है कि आपके लिए प्यार ज़्यादा बड़ा है या दर्द।
ज़िंदगी में छोटी-छोटी चीज़ों में दर्द का अभ्यास किया करो। अगर वह अस्तित्वगत, आख़िरी आत्मिक दर्द झेलना है, तो कैसे वहाँ पहुँचोगे अगर अभी छोटा दर्द भी नहीं झेलते? उसी के लिए आत्म-अनुशासन की इतनी विधियाँ तमाम धर्मों में दी गई हैं। दर्द झेलना सीखो। तो कहते हैं, निराहार रहना सीखो। ये सब व्रत, उपवास। इतने बजे कह दिया जाएगा जागना है, तो जागना है। इतने कोस की पैदल यात्रा करनी है, तो पैदल ही यात्रा करनी है। ये सब क्या किया जा रहा है? आपसे पूछा जा रहा है।
यह जो शर्त है, वह आपके सामने एक सवाल है। क्या है वह सवाल? बताओ, तुम्हारे लिए दर्द बड़ा है या प्यार? दर्द बड़ा होगा तो रुक जाओगे, और प्यार बड़ा होगा तो उड़ जाओगे। समझ में आ रही है?
मैं इन सबसे कहता हूँ, सब जिमिंग करते हैं। कहता हूँ ट्रेनर को, “ना” नहीं बोलना कभी, कभी नहीं। हाँ, तुम्हारी हालत देखकर वो ख़ुद ही वज़न कम कर दे, तो अलग बात है। वो जो भी दर्द दे रहा है झेलो। क्योंकि वो तो एकदम आरंभिक स्तर का दर्द है, शारीरिक; वो भी ज़रा-सी देर को। अगर उतना भी नहीं झेल सकते दर्द, वहाँ पे भी ना-नुकुर करने लगें, तो जीवन के गहरे दर्द कैसे झेलोगे?
बहुत अजीब लगेगा सुनने में, लेकिन एक अच्छे आदमी की पहचान ही होगी कि आप उसको धोखा दे पाओगे। वो प्रस्तुत है धोखा खाने के लिए। उसने संभव कर रखा है कि उसको धोखा दिया जा सके। ये एक अच्छे आदमी की पहचान है, आप उसको धोखा दे सकते हो। कपटी को धोखा देना मुश्किल होगा, क्योंकि वह धोखे के विरुद्ध पहले ही सारी सतर्कता तैयार रखता है। वो कपटी है, इसीलिए डरा हुआ है न, तो सौ तरीके की सतर्कताएँ तैयार रखता है कि कहीं कोई उसे धोखा न दे जाए।
अच्छे आदमी की पहचान क्या? उसे धोखा दिया जा सकता है। तो फिर, भाई लोग, गाएँगे
कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय।
उसको ठगा जा सकता है। आप किसी घुटे हुए, बेईमान आदमी को ठग पाओगे ही नहीं, कोशिश कर लीजिएगा। आप किसी सच्चे आदमी को ही ठग सकते हो, और इसी में उसकी ख़ासियत और महानता है। उसे ठगा जा सकता है। वो वल्नरेबल है, वो घायल होने को तैयार है। उसे ठगा जा सकता है आप उसको बेवकूफ़ बनाकर ले जाओगे, वो बन जाएगा।
“हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।” जो हरिजन होता है, वो हार सकता है, वो संसार को जीतने देता है। “हारा सो हरि से मिला, जीता जम के द्वार।।” हरिजन हार के हरि से मिल जाता है, और ये सब दुनिया वाले जीत जाते हैं, और ये कहाँ पहुँचते हैं? जम के द्वार पहुँचते हैं। समझते हैं?
जो अच्छा आदमी है, उसे तुम हरा लोगे। तो अगर अच्छा आदमी बनना है, तो हारने को तैयार हो जाओ। जिन्हें जीतने का बहुत शौक़ है, वो कभी अच्छे आदमी नहीं बन पाएँगे। दे दो दुनिया को यह अधिकार कि वो तुम्हें बेवकूफ़ बना ले जाए। वो वाला बेवकूफ़ नहीं, जिसमें तुम भ्रमित होकर, मोहित होकर, परास्त होकर, आसक्त होकर हारते हो। यह किसी दूसरे तल की हार की बात हो रही है। यह कौन-सी हार है? यह प्रेम की हार है।
दो लोग एक दिशा में जा रहे थे। बड़ी होड़ थी, पता नहीं पहले कौन पहुँचेगा। सामने एक चीज़ रखी थी उसको पाना था, दोनों एक ही दिशा में दौड़ रहे थे। एक को किसी और तरफ़ से प्रेम ने पुकार लिया। वो थोड़ा मुड़ गया, वो हारेगा। जो प्रेम की पुकार सुनता ही नहीं, वो जीतेगा; क्योंकि सीधा वो अपने द्वारा लक्षित वस्तु की ओर, कामना के वेग से दौड़ा चला जाएगा। वो जीत जाएगा।
आरंभ में मान लो इन दोनों का एक ही लक्ष्य था, एक ही कामना थी। सामने एक वस्तु थी। दोनों उसी की ओर दौड़ रहे थे, और बराबरी का मामला था। फिर उनमें से एक को, वो दूर से, राम ने पुकार लिया, तो उसका रास्ता मुड़ जाएगा वो हारना स्वीकार कर लेगा। “हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।” वो कहेगा, “अच्छा, तुम ही ले जाओ। संसार की चीज़ है, संसार को ही मुबारक। तुम ले जाओ, तुम जीत लो।”
“हारा तो हरि से मिले।” ये हार गया, इसे अब वस्तु नहीं मिलेगी। पर इसे अब कौन मिलेगा? हरि मिलेगा। यह हरि की ख़ातिर ही तो हारा है; और जो जीता, जम के द्वार। हारना सीखिए। अहंकार इसीलिए तो बड़ी लड़ाई हार जाता है, क्योंकि उसको छोटी लड़ाई हारना मंज़ूर नहीं होता। जो लोग छोटी-छोटी चीज़ों में अड़ते हैं, लड़ते हैं, वो कहीं नहीं पहुँचते। हारना सीखिए, झुकना सीखिए। चोट खाना सीखिए, ठगे जाना सीखिए।
तू बुद्धू बना नहीं रहा, हम बन रहे हैं। हम इसलिए चोट नहीं खा रहे कि हम कमज़ोर हैं। हम इसलिए चोट खा रहे हैं कि हमें प्यार है। कुछ समझ में आ रही है बात या उलटी-पुलटी जा रही है? नहीं समझ में आ रही?
आप ज़िंदगी में छोटी-मोटी हार नहीं स्वीकार कर पाओगे, तो हरि को कैसे पाओगे? क्योंकि उनके सामने तो सब कुछ हारना पड़ता है। और आप छोटी चीज़ें हारने को तैयार नहीं, तो आपा कैसे हारोगे फिर? हारना भी अभ्यास की बात है, घायल होना, दर्द सहना,अभ्यास की बात है। छोटी-मोटी चीज़ों में, ₹5-₹10 की चीज़ों में, अड़ना छोड़िए। किसी ने कुछ बुरा बोल दिया, यह अनिवार्य नहीं कि आप पलटकर के जवाब दें। कोई यूँ ही कोई कुतर्क कर गया, यह अनिवार्य नहीं कि आप उससे बहस करें; हारना। “हारा तो हरि से मिले।”