मुझे बड़ा आनंद रहेगा अगर आप कहो कि नहीं मात्र परमात्मा ही मात्र चाहिए, सत्य के अलावा कोई कामना नहीं है। पर जब तक आप उस स्थिति में न पहुँच जाओ जहाँ सत्य के अतिरिक्त कोई कामना नहीं, तब तक जो चाहिए वो साफ़-साफ़ जानो और साफ़-साफ़ बताओ भी, क्योंकि अगर साफ़-साफ़ नहीं बताओगे तो बात खुद से ही छुपी रह जाएगी। जब जो चाह रहे हो, वो बता पाना थोड़ा लज्जास्पद लगता है तो हम ऐसे जताते हैं कि जो हम चाह रहे हैं वो बात बताई ही नहीं जा सकती।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे लगता है कि मुझे सबकुछ चाहिए और कुछ भी नहीं चाहिए? मैं गलत तो नहीं हूँ?
आचार्य प्रशांत: सूक्ष्मतम संप्रेषण की भाषा होते हैं ऋचाएँ, ऋचाएँ, आयतें, कोण। बहुत जो महीन भावनाएँ हो उनके संप्रेषण का माध्यम होता है काव्य, जो बहुत महीन चीज़ हो बस वही काव्यात्मक भाषा के द्वारा ज़ाहिर की जाती है और माँगी जाती है। और महीन ही चीज़ को काव्य के माध्यम से माँगा जाना चाहिए।
जब आप कहती हैं कि मुझे सबकुछ चाहिए और कुछ भी नहीं, तो ये आपने बड़ी, काव्यात्मक माँग रखी। काव्यात्मक रखना भला है पर ये याद रखिए कि काव्यात्मक माँग में माँग का विषय अति सूक्ष्म होना चाहिए, जो आप माँग रहे हो वो वस्तु बहुत झीनी होनी चाहिए, बहुत महीन। अगर जो वस्तु आप वास्तव में चाहते हो अपने जीवन में वो स्थूल है, तो उसको काव्य के माध्यम से मत माँगो, पहली बात तो वो मिलेगी नहीं, दूसरी बात, ये काव्य के प्रति भी ज़्यादा शोभनीय नहीं हुआ।
किसी पर बहुत दिल आ गया हो और उसका हाथ माँगना हो तो तुम काव्य के माध्यम से माँगते हो, ग़ज़ल कह देते हो, कविता कह देते हो क्योंकि चीज़ ज़रा महीन है। परमात्मा पर दिल आ गया हो, परमात्मा का हाथ माँगना हो तो तुम श्लोकों के माध्यम से माँगते हो, उसके लिए श्लोक हैं, दोहे हैं, शाखियाँ हैं, ऋचाएँ हैं, आयतें हैं। जोकि वो बात और भी महीन है।




