बेवजह की मान्यता है कि संसारी वह, जो भोगता है, और आध्यात्मिक आदमी वह, जो त्यागता है। अगर मामला राम और मुक्ति का हो, तो आध्यात्मिक व्यक्ति संसारी से ज्यादा संसारी हो सकता है। शृंगार का अर्थ है स्वयं को और आकर्षक बनाना, बढ़ाना—ऐसा जो तुम्हारे बंधन काट दे। जो करना हो, सब करेंगे—घूमना-फिरना, राजनीति, ज्ञान इकट्ठा करना, कुछ भी हो; कसौटी बस एक है—‘राम’। जो राम से मिला दे, वही शृंगार और वही प्रेम।
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आचार्य प्रशांत: अपने आपको कैसे देखना है? अपने आपको भी अपने लिए एक माध्यम की तरह देखना है। मेरे लिए जो स्थान, मूल्य और औचित्य पूरे जगत का है वही स्थान, मूल्य, औचित्य मेरे लिए मेरे अपने तन और मन का भी है।
जैसे यह जगत ही रास्ता है मुक्ति का और मुक्ति के लिए ही दूसरा नाम है राम को पाना। उसी तरह मेरे लिए- मैं भी माने मेरा भौतिक अस्तित्व, मेरा तन-मन भी एक माध्यम है राम को पाने का। यह मेरा मुझसे संबंध है। मैं क्यों हूँ? मैं इसलिए हूँ ताकि अपने माध्यम से मैं मुक्ति को, माने राम को पा सकूँ। मैं अपने लिए अपना साधन हूँ। मैं स्वयं के लिए मुक्ति का माध्यम हूँ। यह मेरा मुझसे रिश्ता है।
तो मैं अपने साथ बर्ताव भी वैसा ही करूँगा जैसा किसी माध्यम के साथ किया जाता है। माध्यम के साथ बड़ा विशिष्ट व्यवहार किया जाता है। बड़ा एक खास रिश्ता रखा जाता है। माध्यम को ठुकराया नहीं जाता, नकारा नहीं जाता और माध्यम को मंज़िल भी नहीं मान लिया जाता। वही रिश्ता शरीर के साथ रखना है। शरीर के अंतर्गत मेरा पूरा अस्तित्व, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सब आ जाते हैं। मेरी सारी शक्ति, सारे संसाधन सब शरीर के ही अंतर्गत हैं। तो इन सब से जो रिश्ता रखना है, वह इस एक शब्द में समाहित है कि शरीर के साथ क्या रिश्ता होगा।



