प्रेम ही ज़िंदगी को अर्थ, आज़ादी और सच्चाई देता है, लेकिन हमारे जीवन में किसी भी क्षेत्र में प्रेम नहीं होता। जब मामला Loveless होता है, तो हर आदमी भागना चाहता है—अपने काम से, रिश्तों से और खुद से भी। हमें खुद से भी प्यार नहीं है। हमारा समाज और अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियां देती ही नहीं, जिनसे प्यार हो सके। न कंपनियां प्यार के कारण बनती हैं, न जॉब्स ऐसी होती हैं कि कोई उनसे चाहे भी तो प्रेम कर सके। हम काम से कैसे प्रेम कर लेंगे?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। पाँच दिन पहले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री का निधन हुआ और उसी के चलते स्कूल, कॉलेजेज और सरकारी दफ्तरों की छुट्टी कर दी गई। और ऐसा हम आसपास भी देखते हैं कि जब भी किसी के घर में मृत्यु होती है तो हम काम-काज छोड़कर शोक में डूब जाते हैं। भारत में यह कार्यक्रम तेरह दिन तक पूरा चलता है।
एक ओर यह स्थिति है और जब दूसरी ओर मैं आपका जीवन देखती हूँ तो वहाँ कुछ ऑपोजिट दिखता है कि जब भी आपके जीवन में ऐसा कुछ हुआ तो संस्था का काम नहीं रुका। मिशन और तेजी से आगे बढ़ता गया। तो यह किस हद तक ठीक है कि किसी की मृत्यु हो जाए तो हम अपना सारा कामकाज छोड़ के शोक में डूब जाएँ। आपसे यह भी समझा है कि मृत्यु जीवन का तथ्य है। यह आना तो है। तो किस तरीके से ये....
आचार्य प्रशांत: यह हर जगह नहीं होता है। आपके लिए यह आज की एक्टिविटी रहेगी। खोजिएगा। दुनिया के कई प्रमुख देश हैं जिनमें यह बिल्कुल नहीं होता कि श्रद्धांजलि देने के लिए काम रोकेंगे। कहीं-कहीं पर तो आपको यह उदाहरण मिलेगा कि श्रद्धांजलि दी जाती है और ज़्यादा काम करके।
काम हमें रोकना इसलिए पड़ता है क्योंकि हमारे लिए काम सिर्फ़ शरीर चलाने का साधन है। उसका हमारे जीवन के लक्ष्य से, हमारे पवित्रतम केंद्र से कोई संबंध होता थोड़ी है।




