‘माँ’ शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। एक अर्थ निकलता है नासमझी से और दूसरा अर्थ निकलता है समझ से। पहली माँ के पास मात्र ममता होती है, दूसरी माँ के पास मातृभाव होता है। ममता तो पशुओं में भी होती है, पर मातृभाव कोई-कोई माँ ही जानती है। मातृभाव का अर्थ है - वास्तविक रूप से जन्म देना - एक जन्म शरीर का और दूसरा जन्म ज्ञान का। ममता में प्रेम नहीं होता; इसमें मात्र हॉर्मोन्स होते हैं। वास्तविक माँ वो जो प्रेम जाने। उसके लिए माँ को स्वयं बोधयुक्त होना पड़ेगा।
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प्रश्नकर्ता: क्या माँ का अपने बच्चे के प्रति प्रेम आसक्ति है?
आचार्य प्रशांत: ये जो शब्द है, ‘माँ’ इसके दो अर्थ हो सकते हैं। सच तो ये है कि शब्दकोष में जितने भी शब्द पाए जाते हैं, उनके हमेशा दो अर्थ होते हैं। और दो अर्थों से मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि पर्यायवाची शब्द हैं। वो दोनों बड़े विपरीत अर्थ होते हैं। एक ही शब्द के दो अर्थ और दोनों बड़े विपरीत अर्थ। विपरीत कहना भी उचित नहीं होगा। मैं कहूँगा, वे दोनों अलग-अलग आयामों के अर्थ होते हैं; अलग-अलग डाइमेंशन्स में होते हैं। एक अर्थ ज़मीन का है और एक अर्थ आसमान का है; और हैं दोनों ही।
भाषा में दोनों ही प्रयुक्त होते हैं। चाहे दोस्त हो, चाहे माँ हो, चाहे जीवन हो, चाहे मृत्यु हो, चाहे प्रेम हो, चाहे हिंसा हो, ये सब कोई एक अर्थ नहीं रखते। इन सब के अर्थ इस बात पर निर्भर करते हैं कि किस मन से इनको देखा जा रहा है। और जैसे दुनिया में दो ही प्रकार के मन होते हैं- समझदार और नासमझ- उसी प्रकार शब्दों के दो अर्थ होते हैं। बात समझ ही गए होगे। एक अर्थ वो- जो निकलता है समझ से, और एक अर्थ वो -जो निकलता है नासमझी से।




