प्रेम तो जीवन में उतरता ही तब है, जब उसका (परमतत्व) आगमन होता है, अगर वो नहीं आया जीवन में तो तुम किस प्रेम की बात कर रहे हो? तुम्हारा सिर अभी अगर झुका ही नहीं उस पारलौकिक सत्ता के सामने, तुम्हारा सिर अकड़ा ही हुआ है, तो तुम किस प्रेम की बात कर रहे हो? तुमने प्रेम जाना ही नहीं है, झूठ बोल रहे हो अपने आप से भी कि तुम्हें प्रेम है, प्रेम है। होगा तुम्हारा बीस साल, पचास साल का रिश्ता, कोई प्रेम नहीं है। प्रेम अध्यात्म की अनुपस्थिति में हो ही नहीं सकता। जिसको अध्यात्म से समस्या है, उसको प्रेम से समस्या है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ऐसा कैसे हो कि मेरा प्रेमी परमतत्व को समर्पित हो जाए?
आचार्य प्रशांत: पहले खुद तो समर्पित हो जाओ किसी परम लक्ष्य को। अब ये भी प्रश्न तुमने ये नहीं पूछा कि मैं अपने जीवन में परमतत्व को कैसे समर्पित हो जाऊँ? अपनी और परमात्मा की बात नहीं करी, अभी भी बात अपनी और अपने दैहिक प्रेमी की कर रहे हो। अभी भी तुम्हारे विचारों के केंद्र में परमतत्व नहीं है, पार्थिव प्रेमी है। जब तुम परमतत्व को इतनी समर्पित हो जाओगी कि पार्थिव प्रेमी बहुत छोटी चीज़ लगने लगे, तब समझ लेना कि तुमने अपने पार्थिव प्रेमी को भी परमतत्व की ओर मोड़ दिया।
भई आमतौर पर तुम्हारे जो साथी होते हैं, जो जोड़ीदार होते हैं, जो पति या पत्नी होते हैं, वो नास्तिक ही तो होते हैं न सीधे-सीधे। उनका किसी बियोंडनेस् (परेता) में, किसी अलौकिक तत्व में यकीन होता ही नहीं है या होता है? सीधे कहें तो नास्तिक हैं। उनके लिए सत्य क्या है?
वही जो तुमने कहा - ‘खाओ-पियो, मौज मनाओ।’ अब उनको तुम कैसे यकीन दिलाओगे कि कुछ ऐसा है, जो अलौकिक है, जो इंद्रियातीत है। वो यकीन ही उन्हें तब आएगा जब वो तुमको इतना समर्पित देखें किसी परम लक्ष्य को, कि पाएँ कि तुम्हारी चेतना में उनका स्थान बिल्कुल न्यून हो गया है। इसके अलावा कोई विधि चलती नहीं। तब उन्हें मजबूर होकर के ये पूछना पड़ेगा कि ऐसा क्या मिल गया मेरे साथी को जो वो मुझसे इतना आगे निकल गया?




