प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर जी। मैं दो ढाई वर्ष पहले एक रिश्ते में था लेकिन मुझे बार-बार मेरे में अंदर से एक पुकार उठती थी कि नहीं ये प्रेम नहीं है और मैं काफ़ी परेशान रहता था और यूट्यूब पर काफ़ी वीडियो तलाश करता था कि प्रेम क्या है तो एक दिन आपका ऐड वाला वीडियो मुझे आया एक मिनट का और उसके बाद मैं क्लिक करते गया क्लिक करते गया बहुत सारे वीडियो देखते गया और फिर उसके बाद मैं आपसे जुड़ गया और धीरे-धीरे रिश्ते से हट गया। तो हम कैसे पता करे कि हम जिसके साथ रिश्ते में है तो हमारा इश्क़ हमें ऊँचाई की ओर ले जा रहा है या नीचाई की ओर?
आचार्य प्रशांत: तुम्हें अगर ये अभी तक पता ही नहीं है तो उसको छोड़ काहे आए बेचारी को? बिना जाने बुझे ही उसको त्याग दिया। हाँ? ढाई साल बाद भी कह रहे हो पता कैसे करें कि बंदा या बंदी ठीक है कि नहीं? जब पता ही नहीं था तो उसको क्यों डंप कर दिया? पहले पता करते फिर करते। नहीं पहले तुम जाओ अब तो….
प्रश्नकर्ता: झगड़े काफ़ी होते थे।
आचार्य प्रशांत: अब झगड़े तो हमारे भी तुम लोगों से बहुत होते हैं। रोज ही झगड़ा लगा रहता है। ऐसे तो तुम हमें भी छोड़ दोगे। मेरा तो काम ही है जहाँ झगड़ा ना हो वहाँ भी झगड़ा पैदा करना। एक बार तो मैंने कराया था झगड़ा शांत। उन्होंने कहा झगड़ा शांत करा दिया? हाँ, मैंने कहा झगड़ा शांत करा दिया अब झगड़ा नहीं हो रहा अब मार-पिटाई हो रही है।
देखो कितनी ये वैसे एक सूचक बात है। हम जाते भी किसी के पास सिर्फ़ किस वजह से हैं? कामना, माने भ्रम। और कभी उससे टूटते भी हैं। रिश्ता छोड़ते भी हैं। तो किस लिए कि कामना पूरी नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि झूठ की वजह से गए थे और सच दिख गया इसलिए छोड़ दिया। नहीं झूठ की वजह से ही गए थे और छोड़ा भी झूठ की वजह से। उसमें ऐसा थोड़ी होने वाला है कि एक चीज़ जिसके पास झूठ की वजह से गए थे उसको छोड़ दिया तो ज़िन्दगी में सच आ जाएगा। जाओगे कहीं और रिश्ता बनाओगे। वह रिश्ता भी बराबर का झूठा होगा।
यहाँ कोई रिश्ता बना रहा हो, गए हैं अपनी शादी रजिस्टर कराने तो वहाँ भी भ्रम ही है जो दो लोगों को पास ला रहा है और गए हैं डिवोर्स फाइनल करने उसके लिए भी साइन-वाइन करना होता है तो वहाँ भी कोई झूठ ही है जो रिश्ता तुड़वा रहा है। माने सच को तो किसी कदर नहीं आने देंगे, पास आएँगे तो भी झूठ की वजह से और दूर जाएँगे तो भी झूठ की वजह से।
हुआ यह होगा कि दूर तो जाना ही था, मेरी बात के रूप में बहाना मिल गया। दूर जाने का तो मन कर ही रहा था। बहाना और मिल गया कि हाँ यह देखा, यह ऐसा नहीं है कि मेरी कामना पूरी नहीं हो रही, मैं इसलिए तुमको छोड़ रहा हूँ। मुझे तो अब ज्ञानी का समर्थन प्राप्त है। तुमने ज्ञान का भी इस्तेमाल बस अपनी कामना के समर्थन में करा है। अन्यथा आज भी तुम्हें यह प्रश्न कैसे बचा होता कि बताइए प्रेम क्या है? पहचाने कैसे? बिना पहचाने ही किसी को पकड़ भी ले आया था और ना पहचाने किसी को छोड़ भी दिया। यह कैसे किया? कारण बोल रहे हो। झगड़े होते थे। माने कामना नहीं पूरी हो रही थी। कामना इधर-उधर दोनों तरफ पूरी हो रही हो तो झगड़े नहीं होते हैं।
रिसर्च कहती है कि बाकी ऊपर ऊपर जो भी कारण बताए जाएँ तलाक के पर जो अंदरूनी कारण होता है विशेषकर पश्चिम में क्योंकि वहाँ जब रिसर्च होती है रिसर्च कैसे हो सकती है? पूछा ही जाएगा इसमें तो। तो वहाँ पे वो लोग ईमानदारी से बोल देते हैं। भारत में कुछ बातें ऐसी हैं जो मुँह से बोली नहीं जाती हैं। खासकर महिलाएँ मुँह से बोल ही नहीं पाएँगी। तो रिसर्च होती है तो उसमें निकल के आता है कि जो सबसे बड़ा कारण है तलाक का, संबंध विच्छेद का सेक्सुअल इनकंपैटिबिलिटी, अब सेक्स में मजा नहीं आता।
उसके बाद तरह-तरह के झगड़े शुरू हो जाते हैं। तो आप यह कह सकते हो कि साहब रिश्ता तो इसलिए टूटा क्योंकि हमारे झगड़े होते थे। पर मूल कारण रिश्ता टूटने का वही था जो मूल कारण था रिश्ता बनने का। सेक्सुअल अट्रैक्शन ही था जो पास लाया था। अब जब सेक्स मज़ेदार नहीं रह गया, ऊब गए तो फिर बहुत बहुत वजह अपने आप पैदा हो जाती हैं। तुम ज़्यादा कमाते नहीं हो। वो बोल रहा है कि तुम इधर-उधर टीवी बहुत ऊँचा चलाती हो। फिर तो आप बहाने कोई भी खोद सकते हो। यह कोई संन्यासी हो गए हैं? इनके ज्ञान चक्षु खुल गए हैं? सेक्स उत्तेजक नहीं बचा इसलिए किसी को... तो ये कोई आध्यात्मिक बात कर दी है क्या? तुम्हें नहीं कह रहा हूँ। माने पश्चिम में ऐसा होता है। हम कहाँ, हम तो संस्कारी लोग हैं।
इश्क़ है आसमा में उड़ के जाना। कि हर लम्हा सौ पर्दे उठाना।
बहुत खुले प्रत्यक्ष प्रमाण आते हैं जब सही व्यक्ति आपकी ज़िन्दगी में आ जाता है तो। हालांकि सही व्यक्ति आपकी ज़िन्दगी में आए इसकी संभावना बहुत कम है। सही व्यक्ति सही व्यक्ति की ज़िन्दगी में आएगा ना। आपकी ज़िन्दगी में क्यों आएगा? और वह आने को भी होगा तो आप उसको आने दोगे क्या? हर प्रकार से अवरोध खड़ा करोगे। क्यों घुसने दोगे उसको? आपको तो अपने जैसा कोई चाहिए अपने तल का जो आपकी कामना पूरी कर सके।
सही व्यक्ति जब ज़िन्दगी में आता है तो दो बातें होती हैं। पहला चोट लगती है और दूसरा आँख खुलती है। ठीक वैसे जैसे सुबह-सुबह होता है जब कोई झंझोड़ के जगाता है। बुरा भी लगता है और आँख भी खुलती है। आपने देखा है आप रात को किसी को कह कर सोए हो मुझे सुबह उठा देना। तब भी अगर वो सुबह उठाने आए तो उस पर चिढ़ तो छूटती है एक बार। कई लोग ऐसे हाथ भी फेंक देते हैं। और कहेगा तुमने ही बोला था सुबह उठा देना 6:00 बजे अब उठा रहे हैं तो हाथ मार दिया। चिढ़ तो लगती है।
तो सही व्यक्ति आपकी ज़िन्दगी में आए और आपको चिढ़ ना लगे तो इसका मतलब यह है कि या तो वो सही है नहीं या फिर आपकी नींद बहुत गहरी है।
अभी वह आपको उठाने में सफल नहीं हो पा रहा है। अगर वो सही भी है और आपकी नींद तोड़ भी रहा है तो चिढ़ तो लगेगी। चिढ़ भी लगेगी। आँख भी खुलेगी और जब आँख खुलेगी तो आप मन मसोस के यही कहोगे कि है तो यह नालायक, दुखी तो किया पर चलो कुछ फ़ायदा कर दिया है तो भी इसको छोड़ेंगे नहीं। पर चिढ़ का भी क्षण होगा, एक नहीं कई क्षण होंगे जब बड़ा द्वेष उठेगा। ‘होने नहीं देता,’ ‘होने नहीं देता।’
तो आप बहुत लंबे समय तक अपने आप को अंतर्द्वंद में पाओगे। भीतरी एक घर्षण रहेगा, कॉन्फ्लिक्ट रहेगी। कुछ होगा भीतर जो चिढ़ेगा, गुस्साएगा और कुछ होगा भीतर जो धीरे-धीरे प्रेम में पड़ता जाएगा। फिर बड़े अरसे बाद ऐसा होता है कि एक दिन जब कोई आवाज उठती है कि छोड़ दो इसको और आप कहते हैं हाँ छोड़ देते हैं तो आपको सहसा पता चलता है कि अब इसको छोड़ सकते ही नहीं। कि आपने उसको छोड़ पाने का अपना अधिकार ही धीरे-धीरे छोड़ दिया है।
तो अब आप उस अधिकार का इस्तेमाल भी करना चाहते हो तो कर सकते ही नहीं, अब वो नहीं छूटेगा। पर यह होता है बीसियों बाद उसे छोड़ने के प्रयासों के बाद। बीस बार आप बोलोगे इसको छोड़ ही रहा हूँ। इसको छोड़ ही रहा हूँ। इसको छोड़ ही रहा हूँ। बीस बार उसे छोड़ने के प्रयास के बावजूद आप बीस बार अगर बच गए तब इक्कीसवीं बार यह होगा कि आपको ख़याल आएगा कि इसको छोड़ दूँ और उसको छोड़ने की जगह आप अपनी फ्लाइट छोड़ दोगे। हो गया, अब नहीं छोड़ सकते।
पता ही नहीं चला, धोखा हो गया। यह आदमी कब भीतर घुस करके इसको छोड़ने का हमारा अधिकार ही समाप्त कर गया हमें पता ही नहीं चला। अब हम इसे छोड़ना चाह रहे हैं पर छोड़ नहीं सकते। पर उसमें समय लगता है। बहुत समय लगता है। उससे पहले बीस मौके ऐसे आते हैं जब बहुत दिल करता है कि इसको छोड़ दो। और संभावना यही होती है कि बीस में से किसी एक बार तो आप छोड़ ही दोगे।
तो हमने समझा कि सही व्यक्ति का जीवन में आना कोई मीठी घटना तो कदापि नहीं हो सकता। वो मीठी चीज़ नहीं होगी कि गुण गा रहे हो, नाच रहे हो, धूम मचा रहे हो, अनुग्रह व्यक्त कर रहे हो। अनुग्रह भी व्यक्त कर सकते हो। लेकिन साथ में बहुत सारा…. दर्द तो क्या बोलूं? दर्द भी थोड़ी ऐसा लगता है जैसे ऊपर की चीज़ है। इसके लिए कोई ज़मीन का शब्द दीजिए ना — चिढ़ खुन्नस। खुन्नस- कहीं ना कहीं ये रहेगा। यहाँ ठीक है अच्छी बात करता है। पर भीतर कुछ ना कुछ उसके लिए काँटा रहेगा।
ऐसे समझो कि भीतर एक भाव लगातार यह रहेगा कि मैं इसको गिरते हुए देखना चाहता हूँ। क्योंकि इसने मुझे लगातार यही दिखाया है ना कि मैं कितना नीचे हूँ। तो मुझे भी एक बार तो कम से कम इसको हारते हुए, गिरते हुए, टूटते हुए देखना है। किसी तरह से देखूँ तो क्योंकि तू तो सबको बताता रहता है कि हम गिरे हुए हैं ऐसे। हम भी देखना चाहते हैं कि तू गिरा हुआ है। तो अगर कहीं से कोई आधा अधूरा भी कुछ सबूत मिल गया उसके गिरने का तो आपके भीतर कोई होगा जो बहुत प्रसन्न हो जाएगा। देखा हमें दिन रात लानतें भेजता था कि तुम यह करते हो, तुम वह करते हो और यह क्या है? बड़ी प्रसन्नता होगी। आ रही है बात यह?
तो उसके साथ आपका एक बड़ा विचित्र सा रिश्ता रहेगा। जहाँ एक ओर आपको दिख रहा है लाभ हो रहा है, छोड़ना भी नहीं चाहते और दूसरी ओर हर चौथे दिन उबाल आता है कि इस बार तो लात मार ही देंगे। उसको बीस बार छोड़ने के असफल प्रयासों के बाद ही इक्कीसवीं बार ऐसा होगा कि छोड़ने का ख़याल आएगा पर छोड़ नहीं पाओगे। पर बीस वो प्रयास असफल हो जाए ऐसी संभावना कम होती है। बीस में से हम कह रहे हैं कोई ना कोई प्रयास तो सफल हो ही जाता है।
बहुत अच्छा भाग्य होता है या फिर बहुत उस दूसरे व्यक्ति ने आपके ऊपर श्रम किया होता है कि वो बीस बार आपको रोक ले। आप बीस बार भागना चाह रहे हो। बीस बार हाथ बढ़ा-बढ़ा करके आपके पांव पकड़ पकड़ के मन्नतें कर करके आपको रोक रहा है। बार-बार आपके चले जाने पर भी आपको बुला रहा है। इसके लिए या तो सौभाग्य चाहिए या किसी का बड़ा श्रम। दोनों बातें मुश्किल होती हैं।
जो ज़िन्दगी में अचानक बहार आ जाती है ना, यह सबसे बड़ा रेड फ्लैग है। खट से लगा आ मिल गया। अगर इतनी जल्दी पहचान पा रहे हो तो इसका मतलब वो तुम्हारे ही भीतर द्वारा प्रक्षेपित की हुई चीज़ है। इसका मतलब वहाँ कुछ नया नहीं है। अगर इतनी जल्दी पहचान गए तो इसका मतलब तुम उसे पहले से जानते हो। ठीक? आप मिठाई की दुकान में जाते हो। वहाँ गुलाब जामुन रखा होता है। आपको कितना समय लगता है पहचानने में?
प्रश्नकर्ता: तत्क्षण
आचार्य प्रशांत: तत्क्षण पहचानते हो। क्यों तत्क्षण पहचानते हो? क्योंकि उस गुलाब जामुन को तुम अपनी कल्पना में ना जाने कब से रखे हुए हो क्योंकि वो तुम्हारी कामना पूरी कर रहा है। तो तुरंत पहचान गए और तुरंत उससे रस भी, मिठास भी मिल जाता है। और एकदम कोई नई चीज़ मिलती है तो क्या पहचान लेते हो तुरंत उसको? तो जिसको देखते ही लगे कि बहार आ गई, मिठास आ गई, उसको तो तत्काल जान लेना कि ये कुछ और नहीं है, मैंने ही जिसको कामना में निर्मित कर रखा है ये वही है। यह मेरे ही तल का केंचुआ है। इससे कुछ नहीं मिलेगा। जो पहली नजर में भा गया। “लव एट फर्स्ट साइट।”
लव एट फर्स्ट साइड सबसे बड़ा और सबसे सशक्त प्रमाण होता है कि तुम गिरने जा रहे हो। इसीलिए उसके बाद होता है फॉलिंग इन लव।
वास्तविक प्रेम बहुत समय लेता है होने में। बहुत-बहुत समय लेगा। दशकों भी लग सकते हैं। कई बार यह भी हो सकता है कि सत्तर साल के बाद समझ में आया कि यही तो… यह भी हो सकता है। धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे- गलाता है आपको भीतर से। वक्त लगता है ना?
यह थोड़ी कि फूफी ने लड़का देखा है। यह देख ले तू। और कल वह भी आ रहे हैं। और वह अपनी दो चार औरतों को घर ले आते हैं। वह आपको बिल्कुल पहले वह अब चाय दिखा दो। फिर वह आपको बिल्कुल जानवर की तरह पीछे के कमरे में ले जाकर के आपका शरीर अच्छे से उंगली घुसेड़ के और पकड़ के नाप के दबा के देख लेते हैं। हाँ ठीक है उपजाऊ है फर्टाइल है लड़की और आप उसको फिर कह देते जाओ तुम लोग छत पर आकर बात कर लो और आप वहाँ छत पर जाकर के पाँच मिनट बात कर लेते हो। प्रेम भी हो जाता है क्योंकि आजकल ये अपमान की बात लगती है कहना कि प्योरली अरेंज्ड मैरिज थी तो हर आदमी यही बोल रहा है नहीं इट्स लव कम अरेंज्ड मैरिज।
अच्छा लव कब हुआ? वह जब हमें देखने आए थे ना तो हम दोनों छत पर चले गए थे वहाँ प्यार हो गया। ऐसे लगता है कि देखो आधुनिकता और पुराने संस्कारों के मध्य कितना प्यारा संतुलन बनाया है। लव कम अरेंज्ड मैरिज। वहाँ छत पर बातचीत क्या हुई थी? तो आपने पढ़ाई क्या करी है? नहीं है। हैं जी आपकी हॉबीज़ क्या है? वो आपको थोड़ी बताएगा कि उसकी वास्तविक हॉबी क्या है। वो तो आपको रात को पता चलेगा। इतनी खतरनाक हॉबी थी। यही करते रहते।
ऐसे पाँच मिनट में नहीं हो जाता प्यार। आ रही है बात? बाजार सजी हुई है। कोई रिझा रहा है। कोई रीझ रहा है। इसको प्यार बोल रहे हो। चेहरा देख के प्यार कर रहे हो। और कुछ करते हुए, खाना बनाते हुए, कुछ करते हुए, गाड़ी चलाते हुए, दुर्घटना में आधा हिस्सा चेहरे का बिल्कुल उखड़ ही गया या पूरा ही पूरा ऐसे नुच गया। क्या होगा तुम्हारे प्यार का? बोलो? कोई बहुत असंभावित तो नहीं होता ना? ज़ुल्फ़ें-ज़ुल्फ़ें कर रहे हो उड़ गए बाल। अब?
वो गा रही है उड़े जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी कुँवारियों का दिल धड़के। हवा ज़ोर की चली वो उड़ ही गई ज़ुल्फ़ें। विग लगा के आया था धूर्त। अब क्या करोगी? गाना रुक गया। कुँवारियों का दिल धड़कना भी बंद हो गया। मर गई क्या सब? यह जो इतने झगड़े होते हैं प्रेमियों में मत सोचना किसी और वजह से होते हैं। झगड़ा तो वो इस बात पर भी कर लेते हैं कि रेस्तराँ में बैठे हैं तो ऑर्डर क्या होगा? मूल वजह बस यही होती है कि जो भी अरमान थे अब पूरे नहीं हो रहे हैं। तो फिर आप मेन्यू पे लड़ लो। किसी बात पर लड़ लो। मूवी कौन सी देखनी है इस पर लड़ लो। बहुत कारण मिल जाते हैं लड़ाई के। हिंसा कोई सिर्फ़ पति-पत्नी के बीच होती है? प्रेमियों के मध्य कुछ कमी रह जाती है क्या? वहाँ भी बराबर की होती है।
दहेज हत्याएँ होती हैं तो क्या लिविन में मर्डर्स नहीं होते? लिविन वाले भी एक दूसरे के लिए उतने ही हिंसक होते हैं जितने पति और पत्नी। बात विवाह की नहीं है। बात तो लिंग की भी नहीं है। विवाह नहीं भी किया तो भी हिंसा रहेगी। जहाँ अज्ञान है वहाँ हिंसा है। जहाँ अप्रेम है वहाँ हिंसा है। बात लिंग की भी नहीं है। एक लेसबियन लिव इन कपल था। वहाँ एक लड़की ने दूसरी की हत्या कर दी, लो नहीं अब इच्छाएँ पूरी हो रही हैं तो क्रोध आएगा। क्रोध और क्या होता है? अपूर्ण कामना ही क्रोध बनती है।
इसीलिए आदमी ना अपने बाप को इतना पीटता है, ना अपनी माँ को, ना अपनी बहन को जितना वो अपनी बीवी को पीटता है। क्योंकि बाप से, भाई से, माँ से, बहन से उतनी कामनाएँ नहीं होती- भयानक, मॉनस्ट्रस, दानवाकार जितनी ज़बरदस्त कामनाएँ बीवी से होती हैं। इसीलिए इतिहास में माएँ, बहनें, भाभियाँ यह सब नहीं पिटी हैं। बीवियाँ पिटी हैं।
अब सुनो सही इंसान को ज़िन्दगी में लाने के बारे में एक और बात, शायद आखिरी बात। कोशिश करके यह काम नहीं होता। तुम्हारे बुलाने से वह नहीं आएगा। उसका तुम्हारे जीवन में आना तुम्हारी कोशिशों का परिणाम नहीं होगा। तुमने पहले से ही उद्देश्य बनाया है प्रयोजन एजेंडा टारगेट कि अब मैं इतने साल का हो गया हूँ और मुझे जीवन में साथी तो चाहिए ही तो मैं सही आध्यात्मिक साथी को लेकर के आता हूँ। ऐसे नहीं होगा। ऐसे नहीं होता। वह जब भी आएगा तुम्हें तो पता भी नहीं चलेगा कि वह आ रहा है। यह पहली बात, दूसरी बात वो आएगा तो उसमें तुम्हारा कम योगदान होगा उसका ज़्यादा होगा। तुम्हारा योगदान तो यही होगा कि जब वह आ रहा होगा तो तुम बाधा बनोगे। यही तुम्हारा योगदान है। वो आ रहा होगा तुम रोकोगे। अपनी ओर से क्या कर सकते हो?
जो मैंने लक्षण बोले वैसा कोई जीवन में अगर आ रहा हो या जीवन में कहीं मौजूद हो दूर-दूर भी तो उसको बाधा देना रेज़िस्ट करना छोड़ो। तुम उसे खींच नहीं सकते क्योंकि ऐसा कोई होता है ना तो अपना मालिक आप होता है। वह तुम्हारे खींचे खींचेगा नहीं। आएगा तो स्वेच्छा से। हाँ तुम उसे रोक सकते हो। रोकना छोड़ो। रोकना छोड़ो। और यह उम्मीद छोड़ो कि मैंने पहले ही तय कर रखा है कि इस व्यक्ति को तो मैं जीवन में इसलिए ला रहा हूँ, इसको मैं जीवन संगिनी बनाऊँगा। यह करूँगा। ऐसे नहीं होता। यह काम जब भी होता है अनायास होता है। तुम्हें नहीं पता चलेगा। तो तुम्हें क्या करना है?
तुम अपने आप को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहो। करते रहो, करते रहो। एक दिन पाओगे कोई बेहतर इंसान तुम्हारी ज़िन्दगी में आ गया है।
तुम सही दिशा में चलने की कोशिश करते रहो करते रहो करते रहो, सही राह पर एक दिन अनायास पाओगे कि उसी राह पर सही दिशा में चलता हुआ कोई हमसफ़र मिल गया है। पर वो जो हमसफ़र है वह तुम्हारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। सही राह और सही मंज़िल तुम्हारा उद्देश्य होना चाहिए। फिर उस सही राह और सही मंज़िल से इतनी ताकत मिल जाती है कि हमसफ़र की तलाश छोटी चीज़ हो जाती है। तुम कहते हो राह भी सही है, मंज़िल भी सही है हमसफ़र मिले तो मिले, नहीं मिले तो नहीं मिले।
और जब यह कह देते हो ना कि मिले तो मिले, नहीं मिले तो नहीं मिले। तो कई बार बहुत अच्छा हमसफ़र मिल जाता है। और मिल जाए तो उसकी खातिर मंजिल को मत भुला देना। हमसफ़र मिल भी जाए तो भी यही कहना कि तुम हमसफ़र हो मंज़िल नहीं हो गए। जाना तो मंज़िल की ओर है ना, मंज़िल तो तब तक रहेगी जब तक सांस है हमसफ़र तो छूट भी सकता है किसी दिन। हमसफ़र छोटी चीज़ है मंज़िल बड़ी चीज़ है सफर बड़ी चीज़ है। हमसफ़र छोटी चीज़ है। आ गया संयोग से चला भी जाएगा संयोग से।
यह संयोग की बात हो सकती है कि हमसफ़र मिला कि नहीं मिला या कब तक के लिए मिला। पर यह संयोग की बात नहीं होनी चाहिए कि तुमने राह और मंज़िल क्या चुने हैं। यह बात बहुत आत्मिक है यह बात बहुत विवेक से आनी चाहिए कि क्या रहा है, क्या मंज़िल है। राह सही है, मंज़िल सही है तो कुछ संभावना है कि उस पर तुम्हें जो मिलेगा वह भी सही होगा।
लेकिन चेतावनी दे रहा हूँ। वैसा कोई मिल जाए तो उसी से चिपक मत जाना। यह मत कर देना कि अब मैं अपनी यात्रा भी बाधित करूँगा और तुझे भी आगे नहीं बढ़ने दूँगा। क्योंकि देखो हम तो इस सफ़र पर आए ही इसीलिए थे कि हमसफ़र मिल जाए। हम तो इस सफ़र पर आए ही इसीलिए थे कि हमसफ़र मिल जाए। हमारा तो पहले से ही यही उद्देश्य था। तो मिल गया हमसफ़र तो हमने मंज़िल ही भुला दी। यह गज़ब मत कर देना।
तुम्हारी निष्ठा सदा होनी चाहिए मंज़िल की। मंज़िल के प्रति निष्ठा है फिर कोई रास्ते में मिल गया है। बहुत अच्छी बात है।
जितने दिन के लिए मिला है बहुत अच्छी बात है। जिस दिन विदा भी हो गया उस दिन कहेंगे हमारा पहला नाता हमारा इश्क़ तो मंज़िल से है ना। यह तो रास्ते का साथी था कुछ दिन चला जितने दिन चला बहुत सुंदर बात थी। अब नहीं है चलो कोई बात नहीं। मंज़िल तो है ही। हमारा तो, अभी रास्ता लंबा है।
जो आप लोग करा करते हो कर्मकांड साथी की तलाश। आई ऐम लुकिंग फॉर ऐन अलायंस। इस तलाश की शुरुआत ही यह तय कर देती है कि अब बर्बाद होगे। उसका मिलना किसी उद्देश्य पूर्ण सप्रयोजन तलाश का परिणाम नहीं हो सकता। कोई अच्छा साथी मिलेगा भी, जब भी मिलेगा तो अनायास मिलेगा मैं कह रहा हूँ। वो एक बाय प्रोडक्ट के तौर पर मिलेगा। आपने माँगा नहीं था मिल गया। आप क्या माँग रहे थे? मुझे सच्चाई दो, ऊँचाई दो। आप अपनी ज़िन्दगी में एक तरफ़ को चल रहे थे उसी में हो गया, इरादा नहीं बनाया था।
यह सवाल इसलिए तो नहीं पूछा था कि पहले वाली जैसी मिली, अब दूसरी वाली उससे बेहतर खोजेंगे? खोजने की चीज़ आसमान है। यहाँ जमीन पर खोजाई ढूंढाई बंद करो। जब खोजने की चीज़ आसमान है तो ज़मीन पर अगर खोजना भी है तो क्या खोजोगे? आसमान की शक्ल खोजो जमीन पर।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जैसे आपने बताया कि सही आदमी लाइफ़ में अपने आप आ ही जाता है। आप उसे ढूंढते नहीं हो। जैसे इन डॉक्टर फील्ड आप भी बहुत हार्ड वर्किंग होते हो और आपके को-पीजी भी बहुत हार्ड वर्किंग होते हैं। तो लाइफ़ में ऐसा कोई ना कोई मिल ही जाता है। मेरी लाइफ़ में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। उसको भी काफ़ी चोट मिल रही है मुझसे और मैं भी उसको काफ़ी चोट दे रही हूँ क्योंकि वो सच बोल रहा है बहुत ज़्यादा। मैंने भी आपसे सच बोलना सीखा है। पहले मैं सच नहीं बोल पाती थी पर बहुत पेनफुल हो रहा है। लग नहीं रहा है कि मैं सर्वाइव कर पाऊँगी।
आचार्य प्रशांत: अगर चोट ऐसी मिली होती है कि भ्रम कटते हैं तो स्वभाव तो आनंद है। तो फिर बस चोट का दर्द नहीं रहता। साथ में आनंद भी आता है ना। पर्दा जब हटता है तो क्या खुलता है? स्वभाव। और वो क्या है? आनंद। तो चोट तो उस रिश्ते में भी होती है परस्पर जिसमें कामना का रिश्ता होता है। क्योंकि तुम उसकी कामना नहीं पूरी कर पाओगे कभी, तो वो चोट मारेगा। तुम उसकी नहीं पूरी कर पाओ....समझ रहे हो? तो वहाँ भी चोट का आदान-प्रदान तो चलता ही रहता है।
तो ऐसा नहीं है कि जो तुम अपने कामना मूलक रिश्ते बनाते हो उसमें चोटें नहीं होती। वहाँ भी चोट मारते हो एक दूसरे को। कोई किसी की इच्छाएँ आज तक पूरी कर पाया है क्या? नहीं पूरी कर पाओगे तो चोट मारेगा वो। चोट तो वहाँ भी चलती है। एक सही रिश्ते में जो चोट चलती है। उसमें सिर्फ़ चोट का दर्द नहीं होता। उसमें साथ में आनंद भी होता है। क्योंकि उस चोट ने आपको बेहतर बनाया होता है। तो यह जांचने की बात है कि फिर दर्द हो रहा है या आनंद भी आ रहा है। वह आनंद ही है फिर जो फिर उस रिश्ते को स्थायित्व देता है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मैं २७ वर्षीय हूँ और पंजाब से हूँ। तो अभी गवर्नमेंट जॉब में हूँ। तो मेरा क्वेश्चन ये है कि जिस इश्क़ की बात रूमी जी कर रहे हैं तो जो आपके सत्र सुनने के बाद जो मन हल्का होता है वो शांति मिलती है तो वो एक ही बात है?
आचार्य प्रशांत: मुझे क्या पता आशिक़ तुम हो? महबूबा को तुम ही पहचानोगे ना या मुझसे पूछने आओगे? अपने महबूब को पहचानना तो आशिक़ का दिल ही काम होता है। दुनिया से वह थोड़ी इसमें, मैं तुम्हारा हूँ या नहीं, यह पूछने अगर तुम मेरे पास भी आ रहे हो तो तुम मेरे नहीं हो यह पक्का है। मैं तुम्हारा हूँ या नहीं यह दूर की बात है। इतना अजीब लगेगा ना किसी से पूछने जा रहे हो। आर यू द वन? ये तुम जानो। सस्ती चीज़ हो जाती है।
ख़ुद दौड़ दौड़ के ऐलान करना कि इश्क़ है, इश्क़ है, इश्क़ है। बहुत ज़्यादा सस्ती चीज़। और ज्ञानी और ज़्यादा इस बात के प्रति संवेदनशील होते हैं कि यह काम बहुत सस्ता है। और विडंबना यह कि यह सस्ता काम ज्ञानी को ख़ुद ही करना पड़ता है। क्योंकि वह ना बताए कि मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ तो तुम्हें हमेशा यही लगेगा कि वह तुम्हारा दुश्मन है। तो फिर उसे अपने मुँह से बोलना पड़ता है कि भाई मैं तुम्हारा भरोसा कभी नहीं तोडूंगा। बहुत सस्ता वक्तव्य है यह। भरोसे के बारे में ऐसी बात कहना ही भरोसे की अनुपस्थिति को दर्शाता है। पर कहना पड़ता है। मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। मैं कुछ नहीं बोल रहा तुम देख लो।
कुर्सी पे माल रखा है। तुम्हें जचता है तो ठीक है। मस्त माल है काफ़ी भारी है बस। हल्का माल नहीं है इधर। मुझसे ही पूछोगे। मैं क्या बोलूं? और कुछ?
प्रश्नकर्ता: और मैं आपसे काफ़ी समय से जुड़ा हूँ पर मैं खुल के बोल नहीं पाता जो सीखता हूँ एक छवि का डर है वह हमेशा बना रहता है।
आचार्य प्रशांत: कम से कम बीस हज़ार लोगों के सामने तुम यहाँ प्रेम अभिव्यक्त कर रहे हो और कह रहे हो खुल के बोल नहीं पाते। हम लोग एकांत ढूंढते हैं प्रपोज़ करने के लिए। और दावा यह है कि हमसे खुल के बोला नहीं जाता। यही तो है। तुम्हें पता ही नहीं ना, आत्मअज्ञान और किसको बोलते हैं? माया तो माया है। तुम्हें अपने प्यार का भी नहीं पता है कि तुम वास्तव में किससे प्यार करते हो। क्या खुल के नहीं बोल पाते? और कैसे बोलोगे? बोल तो रहे हो।
और अगर फिज़ूल की बातें नहीं बोल पाते हो तो ये तो अच्छी बात है कि नहीं बोल पाते हो। जो मूल्य की बात है वो तो बोल ही रहे हो खुलेआम अब झिझकना कैसा फिज़ूल की बात तो मैं भी आज तक नहीं बोल पाता। तुम लोगों से इतना बोलता हूँ तुम्हें लगता होगा बोलना ही काम है इनका मुझे डाल दो दस-बीस ऐसे लोगों के बीच में मैं जिनको जानता नहीं, ना वो मुझे सुनने को उत्सुक हैं तुम देखो तुम छः घंटे मुझे वहाँ बैठा के रखो, मैं एक शब्द नहीं बोलूंगा।
फिज़ूल की बातें फिज़ूल जगहों पर अगर आप नहीं बोल पाते हो तो ये कोई कमज़ोरी थोड़ी ही है। क्यों बोलनी है? कुछ होते हैं जो इसमें बड़े प्रवीण होते हैं। वो कहीं भी होते हैं वो महफ़िल पर छा जाते हैं। कहीं नहीं छाना है। महफ़िलों में तो किनारे पर रहना है। महफ़िलों में तो किनारे पर रहना है। क्यों? क्योंकि जो महफ़िल का किनारा होता है ना उसी के ठीक बाद वह होता है जिसकी तुम्हें तलाश है। एट द एज ऑफ द पार्टी। बियॉंड, बियॉंड द बाउंड्री जस्ट बियॉंड द बाउंड्री ऑफ द गैदरिंग इज द वन यू आर लुकिंग फॉर।
मैं कहीं भी बैठने जाता हूँ एकदम जो कोने वाली जगह होती है सबसे पहले वह तलाशता हूँ।
चल बुल्लेया चल उत्थे किनारे जित्थे सारे अन्ने, ना कोई साडी जात पचाने,ना कोई सानु मन्ने।
एकदम कोने में जाके बैठ जाता हूँ। क्यों घुसना है महफ़िलों में? क्यों बनना है, यह आ गया देखो पार्टी की जान? क्यों बनना है क्या करना है?
चलो एक निजी बात बता देता हूँ प्रेमी आया है। तो मालूम है मैं मेरा बिस्तर है बड़ा चौड़ा है मेरी माँ ने बनवाया था मेरे लिए बड़े शौक से। बड़ा चौड़ा बिस्तर। जिन्होंने मुझे देखा है सोते हुए मैं एकदम उसके कोने पर सोता हूँ एज पर। मुझे कभी नहीं देखा होगा कि मैं बिस्तर के बीचो-बीच सो रहा हूँ। विदाई के लिए हमेशा तैयार। हम घुसे नहीं है कि तुम्हारे केंद्र में आ गए हैं। जाने के लिए हमेशा तैयार हैं। हमें तुम्हारी इस महफ़िल की जान बनना ही नहीं है।
हम सो भी रहे हैं तो भी प्रस्थान के लिए तैयार हैं। ऐसे लेटा होता हूँ और जिस करवट सोता हूँ उसी करवट उठ जाता हूँ। सोते वक्त जरा भी ऐसे-वैसे नहीं करता। तबीयत खराब हो तब करता हूँ सिर्फ़। मैंने देखा है मैं सो के उठता हूँ मैं ऐसे पाँव नीचे करता हूँ एक पाँव सीधा एक चप्पल में आता है दूसरा दूसरी, आँख खुली भी नहीं है तो भी क्योंकि जैसे लेटा था जिस मोशन में ठीक उसी मोशन में उतर भी जाता हूँ। क्या करना है बिस्तर पर लेट के? मजबूरी है शरीर की। कुछ घंटे का आराम देना होता है। लेट जाओ। जैसे लेटे थे वैसे ही उठ जाओ।
यहाँ बसने थोड़ी आए हैं। चाहे कैफे हो, चाहे बिस्तर हो। शुरुआत नकार से होती है। शुरुआत इससे नहीं होती है कि मुझे बोलना है। शुरुआत इससे होती है कि जहाँ नहीं बोलना है, वहाँ नहीं बोलना है। जिसने गलत जगह पर ना बोलना सीख लिया वो इस काबिल हो जाएगा कि अब जहाँ बोलेगा वहाँ मूल्य होगा। आप लोग फिज़ूल जगहों पर पहुँच भी जाते हैं, शामिल भी हो जाते हैं, बोल भी आते हैं। सबसे पहले वो बंद करिए। आ रही बात समझ में? यह कितने विद्रोह का काम है ना। एक जगह पर जहाँ सब पशु कोई ढेंचू-ढेंचू कोई मैं-मैं कोई बरबर कोई भौ-भौ कोई म्याऊँ-म्याऊँ। सारे पशु अपना-अपना राग अलाप रहे हैं वहाँ एक है चैतन्य जो मौन है। यह मौन कितने विद्रोह की बात है।
मौन साधना सीखिए। तब जाकर के वाणी में तेज आएगा। चुप रहता है, तो इसलिए जहाँ बोलता है वहाँ वज़न होता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक और छोटा सा प्रश्न है वो निजी जीवन से है। पूछ सकता हूँ मैं?
आचार्य प्रशांत: प्रेमियों को कोई रोक सकता है?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, घर में बिल्कुल एक रीति रिवाज का माहौल रहा है बचपन से ही और वो है कि मुझे वो करना ही करना होता है। तो मतलब मुझे आप ही मिले कि जिसने कहा कि जो मान्यता है जो वो ज़रूरी नहीं है जो भी परंपरा है जिसका कोई अर्थ नहीं है वो ज़रूरी नहीं है। तो अभी ऐसा है कि मैं अभी उसका पालन नहीं करता हूँ तो जो अगर करता था तो एक डर था कि अगर उसका पालन नहीं करूँगा तो कुछ बुरा हो जाएगा। तो अब ऐसे है कि अभी मन में मैं ख़ुद को तर्क देता हूँ कि अब अभी मैं सत्रों से जुड़ा हूँ, सीख रहा हूँ तो जो मुझे तो वो मान्यता का पालन करने से बुरा नहीं होना था तो अब सत्रों से जुड़ा हूँ तो वो नहीं होगा।
आचार्य प्रशांत: तो पहले एक टोटका था अब दूसरा है।
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: सॉरी सर तुम्हारा प्रपोज़ल रिजेक्ट हो गया है। कितने ख़ुश हो रहे हो? कैसे दांत दिखा रहे हो? क्या बोला है अभी और उस पर तुम ख़ुश हो रहे हो?
प्रश्नकर्ता: जो बात है आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: नहीं तो मैं ये थोड़ी कह रहा हूँ बात बदल दो। मैं कह रहा हूँ उसपर ख़ुश मत हो। क्या बोलूं? क्या बोलूं? तुम कह रहे हो कि जो भी चल रहा है वह तो करूँगा। बस अब यह है कि गीता पढ़ रहा हूँ तो यह पक्का हो गया है कि यह सब जो है इससे कोई नुकसान वगैरह नहीं होता तो ठीक है। और निश्चिंत होकर करूँगा। क्या बोलूं? यह कोई फैशन की बात नहीं होती है विद्रोह करो। यह ज़िन्दगी बचाने की बात होती है। यह कोई ज़िन्दगी में अतिरिक्त नहीं चीज़ होती है कि ज़िन्दगी अभी तो ठीक चल रही है। उसमें वैल्यू एडिशन हो जाएगा थोड़े रिबेलियन से। यह नहीं हो रहा है। तुम ख़त्म हो रहे हो। तुम ख़त्म हो। तुम्हारी जान बचाने की चीज़ है विद्रोह।
एक डूबता आदमी हाथपांव मार रहा है - यह है विद्रोह। जलते हुए भवन से घर से एक आदमी बाहर निकलने की बेतहाशा कोशिश कर रहा है - यह है विद्रोह। कोई फैशन नहीं है। नहीं बाहर निकलोगे तो जल मरोगे। तुम कह रहे हो कि गीता वाला फायर एक्सटिंग्विशर मिल गया है तो अब मैं उसको लेकर के जलती हुई जगह पर बैठा हूँ। माने बाहर तो नहीं निकलूूंगा। अब बैठा वहीं रहूँगा अब जब लपटें पास आती हैं तो ऐसे फुसफुस मार देता हूँ। कितनी देर तक मार दोगे? कितनी बार बोला अपनी ज़रूरतें कम रखो, स्वार्थ कम रखो ताकि किसी के आगे दबना झुकना ना पड़े। खासकर जो आदमी तुमको फिज़ूल की मान्यताओं और भ्रमों में धकेल रहा हो।
तुम जो आकर बोलते हो ना कि फ़लाना भ्रम है उल्टा-पुल्टा चल रहा है। अंधविश्वास चल रहा है। पर मैं उसको तोड़ नहीं सकता। बात अंधविश्वास की ताकत की नहीं है। बात तुम्हारे स्वार्थ की ताकत की है।
तुम्हारा स्वार्थ इतना ताकतवर है कि वो तुम्हें अंधविश्वास को तोड़ने नहीं दे रहा है।
अंधविश्वास में क्या जान होती है, उसको मत स्वीकार करो। ख़त्म हो गया। पर तुम स्वीकार इसलिए कर रहे हो क्योंकि उसके साथ तुम्हारा स्वार्थ जुड़ा हुआ है। जवान आदमी हो। पता नहीं कौन सी चीज़ के लिए किस पर निर्भर हो। डरे बैठे हो। क्यों निर्भर हो समझ में नहीं आता।
जो तुमने अपनी उम्र बताई उतनी उम्र में मैं अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन शुरू कर चुका था। किस बात का डर है तुमको? एक यही चीज़ ना मतलब मैं सवाल पूछता हूँ कई बार ये क्यों है? जैसे तैसे करके तो तुम लोग आए मेरे पास पर अधिकांशतः जो लोग आए हो बहुत डरपोक हो। और जो लोग तोड़फोड़ करते हैं वो सब गलत पक्ष में खड़े हुए हैं।
ये कितनी अजीब बात है। कि जो लोग कम डरते हैं वो सब वहाँ खड़े हुए हैं जहाँ झूठ है, जहाँ शोषण है उसके पक्ष में वो खड़े हुए हैं। और सच्चाई की तरफ पहले तो लोग बड़ी मुश्किल से आए और कम आए और जो आए वो ज़्यादातर वो हैं जिनका इूत्तु सा दिल है। हाय दैया धड़क गया। पता है ना दिल जितना छोटा होता है उतना ज़्यादा धड़कता है। गौरैया का दिल कुछ धड़कता है। हाथी का दिल बहुत धीरे-धीरे धड़कता है। तुम्हारा खट से धड़क जाता है। दुस्साहस कहाँ है? साहस ही नहीं दुस्साहस। बेटर लक नेक्स्ट टाइम।