डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ऊँचा जीवन जीने में बहुत डर लगता है। क़ीमत चुकाने से मुँह चुराता रहता हूँ। जितना देख पाता हूँ कि समय ही व्यर्थ कर रहा हूँ, लेकिन फिर भी उसे रोक नहीं पाता। कभी-कभार भावुक होकर कुछ करने की कोशिश करता हूँ, लेकिन बाद में वहीं पहुँच जाता हूँ, जैसे शुरुआत करी थी। इस पर कृपा करके प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: जहाँ तुम बैठे हो, वहाँ बैठे-बैठे कोई बदलाव नहीं आ जाएगा, एक क़दम तो बढ़ाओ। बहुत सारे लोग होते हैं। देखा है, सोते समय बड़ी खिड़कियाँ भी हों उनके कमरे में, तो उन पर पर्दे चढ़ा देते हैं। और पर्दे भी उनके गाढ़े रंग के होते हैं। दरवाज़ा भी बंद है, पर्दे भी चढ़ा दिए, तो कैसा हो जाता है कमरा? एक़दम अँधेरा हो जाता है, एक़दम अँधेरा है, एक़दम अँधेरा। जाड़े का मौसम है। मान लो, सुबह के आठ-नौ बज गए हैं, ये अभी सोकर उठ रहे हैं। एक़दम अँधेरा, एक़दम अँधेरा।
कमरा जब रात भर बंद रहे, तो उसमें ज़रा गंध भी आ जाती है। और कमरे के भीतर हो सकता है हीटर, ब्लोअर कुछ चला दिया था। तो कमरे का एक तापमान भी था, गर्म हो गया था कमरा। और कमरे के भीतर से बैठकर कह रहे हैं, "ये समस्या, वो समस्या। अच्छा नहीं लग रहा है, घुटन भी हो रही है, अँधेरा भी बहुत है।"




