
प्रश्नकर्ता: हमारा स्वभाव इतना हिंसक क्यों है? हम कुछ भी देखते हैं तो ज़्यादा सोचते नहीं, सीधे उग्र हो जाते हैं। जैसे रास्ते में पत्थर पड़ा है तो उसे लात मारनी है, यह बड़ी आम बात है। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: पत्थर को लात मारने की संभावना कब ज़्यादा है?
प्रश्नकर्ता: जब हम गुस्सा हों।
आचार्य प्रशांत: जब गुस्सा हों तो संभावना बढ़ जाती है कि एक पत्थर ही पड़ा हुआ है तो उसे लात मार दोगे। तो क्या पता चलता है इससे कि हिंसा का क्रोध से संबंध है। पत्थर को लात इसलिए मारी क्योंकि क्रोधित थे। क्रोधित क्यों थे? तो कोई दूसरा था जिससे कोई उम्मीद थी, वो उम्मीद पूरी नहीं हुई तो क्रोध आया। या अपने आप से भी कोई उम्मीद थी तो वो दूसरों के सन्दर्भ में थी।
कुछ दूसरा है जिससे संबंधित कुछ हासिल करना है। तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरों से कुछ चाहिए था। वो नहीं मिला तो, गुस्सा। फिर वही गुस्सा प्राकट्य या अप्राकट्य हिंसा के रूप में उबलता है, विस्फोट होता है। होता है न? जितना ज़्यादा ये भाव होगा कि किसी से कुछ चाहिए, या अपने आप से ही, उतना ज़्यादा उस संबंध में हिंसा रहेगी।
दुनिया अब और ऐसी होती जा रही है जिसमें भोगने पर ज़ोर है। ज़िन्दगी से और ज़्यादा वसूल लेने पर ज़ोर है, है न? ‘जितना ज़्यादा ज़िन्दगी से नोच खसोट सकते हो नोच खसोट लो।’ तुम्हें लगातार यही शिक्षा दी जा रही है। ‘भोग लो, चूस लो, एक बूँद भी छूट ना जाए।’ है न?
और वो हो नहीं पाता क्योंकि जितना तुम्हें चाहिए उतना तुम्हारी क्षमता के बाहर का है और जितना तुम्हें चाहिए उतना औरों को भी चाहिए। जितना तुम्हें चाहिए वो असीमित है, इसलिए कभी तुम्हारी इच्छा पूरी हो पाए ये हो नहीं सकता। लगातार कहा तुमसे यही जा रहा है कि इच्छाएँ और रखो, और बढाओ; नतीजा हिंसा है।
तुम प्रमाण रूप ये देख लो कि तुम सबसे ज़्यादा हिंसक उनके प्रति होते हो जिनसे तुम्हारा कभी ना कभी संबंध मोह का रहा होता है। उस मोह को कभी-कभार तुम प्रेम का नाम दे देते हो, प्रेम होता नहीं है। पर जो प्रेम वाले रिश्ते होते हैं उनमें जब हिंसा का विस्फोट होता है, तो बड़ा भयानक होता है, क्योंकि चाहते बहुत कुछ थे न। जो दूर के हैं उनसे तो फिर भी कम चाहते हो, जो तुम्हारे करीबी हैं उनसे तो तुम सभी कुछ चाहते हो। और जो चाहते हो वो हो नहीं पाएगा, नतीजा हिंसा है। हो सकता है उस हिंसा का एक बार में विस्फोट ना हो। अगर एक बार में नहीं होगा तो फिर वो एक पुराने घाव की तरह टीस देता रहेगा। एक सतह के नीचे चलने वाली निरंतर हिंसा लगातार बनी रहेगी। तुम अगर संवेदनशील नहीं हो तो तुम्हें लगेगा हिंसा नहीं है, पर सतह के नीचे हिंसा लगातार है।
जितना तुम्हारी पा लेने की इच्छा, जितना तुम्हारी भोगने की अभीप्सा, जितना तुम्हारा हीनता का भाव, जितना तुम्हारा लालच, उतना ही तुम्हारा क्रोध और तुम्हारी हिंसा। समझ में आ रही है बात? दूसरों से दो ही तरह के संबंध हो सकते हैं, या तो प्रेम के या फिर कामना के। कामना के संबंध तुम्हारे जिससे भी हैं, सावधान हो जाना, हिंसा मौजूद है, हो सकता है तुम्हें दिख ना रही हो। हिंसा मौजूद है, उसका फल भी भुगत रहे हो, कष्ट भी पा रहे हो। प्रेम का संबंध बिल्कुल दूसरी बात होती है।
प्रेम के संबंध में बुनियादी चीज़ होती है अपनी आतंरिक परिपूर्णता।
मैं तुमसे इसलिए नहीं जुड़ा हूँ कि मुझे तुमसे कुछ चाहिए। मैं तुम्हें तुमको भोगने के लिए नहीं जुड़ा हूँ। मैं तुमसे इसलिए नहीं संबंधित हुआ हूँ कि मैं तुमको भोग लूँ, तुमसे कुछ पा लूँ; ये प्रेम है। बड़ी सीधी सी बात है न? प्रेम माने जब किसी से यूँही बिना वजह, अकारण, निःस्वार्थ, जुड़ गए हो। वजह कुछ नहीं, संबंध फिर भी है। अगर वैसा कुछ भी है तुम्हारी ज़िन्दगी में तो वो प्रेम है।
वजह कुछ नहीं, नाता फिर भी है, तो ये नाता प्रेम का हुआ। और जहाँ कहीं भी नाते के पीछे वजह है, वहाँ तुम चाह रहे हो। जहाँ तुम्हारा चाहना है वहीं पर नफरत, घृणा, हिंसा, ये सब आएँगे। आएँगे नहीं, आएँगे से तो हमें ज़रा आश्वस्ति मिल जाती है, थोड़ी सुविधा हो जाती है कि आएँगे, माने भविष्य में आएँगे। आएँगे नहीं आए हुए हैं। विस्फोट हो सकता है भविष्य में हो पर जितनी बीमारियाँ हैं, जितने पैथोजन(रोगजनक) हैं उनकी मौजूदगी अभी है। हिंसा बढ़ेगी, और बढ़ेगी, क्योंकि तुम्हारा ये जो पूरा समाज है, पूरी दुनिया है, ये और ज़्यादा भोगवादी होती जा रही है। और ज़्यादा पदार्थवादी होती जा रही है।
इसे सब कुछ भोग लेना है। इसे इंसानों को भोग लेना है, इसे अपनी देह को भोग लेना है, इसे दुनिया, ज़मीन, आसमान, तारे, नदी, पक्षी, सब भोग लेना है। इसके भीतर ये भाव गहराई तक बैठा दिया गया है कि जीवन का अर्थ ही है भोग; बहुत मूर्खतापूर्ण बात है। पहले तुम्हें ये एहसास दिलाया जाता है कि तुम कमज़ोर हो, अधूरे हो, हीन हो। फिर तुमसे कहा जाता है कि चूँकि तुम हीन हो इसलिए भोगो। और भोगने से तुम्हारी हीनता शायद थोड़ी कम हो जाए। कैसा बेवकूफी का तर्क है।
जिस रिश्ते की बुनियाद भोग और हीनता हो उसमें प्रेम थोड़े ही होगा, उसमें तो हिंसा ही होगी। और वो रिश्ता व्यक्ति और व्यक्ति का हो यह ज़रूरी नहीं है। तुमने बिल्कुल ठीक कहा, वो रिश्ता व्यक्ति और पत्थर का भी हो सकता है, वो रिश्ता व्यक्ति और वातावरण का भी हो सकता है, व्यक्ति और पर्यावरण का हो सकता है, व्यक्ति और उसके पेड़ पर बैठी एक चिड़िया का हो सकता है और मूलभूत रूप से उस व्यक्ति का संबंध होता है अपने आप से। तुम्हारा अपने आप से क्या संबंध है, तुम अपने आप को किस दृष्टि से देखते हो, तुम अपने आप को क्या समझते हो, क्या जानते हो।
तुम्हारी यदि परिभाषा ही यही है कि मैं वो जो भूखा है, नंगा है, दरिद्र है, तो तुम पूरी दुनिया को सिर्फ़ कंज़म्पशन (उपभोग) की निगाह से देखोगे। मैं कौन? मैं भिखारी। तो पूरी दुनिया क्या? मेरी मालिक जिससे मैं कुछ ले लूँ और ना मिले तो नोच-खसोट लूँ। जिनकी भी आँखों में भूख देखो, समझ लेना बड़े हिंसक लोग हैं। त्रासदी ये है कि इस भूख को बड़ी उपलब्धि घोषित कर दिया गया है। आज तुमसे कह दिया गया है कि एम्बिशन(महत्वाकांक्षा) बहुत बड़ी बात है; महत्वाकांक्षा। और कोई नहीं है जो तुम्हें यह बता सके कि तुम जितने महत्वाकांक्षी हो तुम उतने ही हिंसक होओगे।
तुम्हारे गणमान्य लोग आते हैं और तुम्हें ऐसी बातें बोल के चले जाते हैं कि देखो तुम्हारे भीतर महत्वाकांक्षा तो होनी ही चाहिए। मैं तुमसे साफ-साफ कह रहा हूँ सत्यम (श्रोता को संबोधित करते हुए), ये तुम्हारे दुश्मन हैं। और ऐसी बातों पर ज़रा भी कान मत धरना। जो भी तुम्हें ये बताए कि तुम कमज़ोर हो, तुम नाकाबिल हो, तुम्हारे जीवन में कमियाँ हैं, और इन-इन रास्तों पर चलके तुम उन कमियों को पूरा कर सकते हो, उनकी बातों की ज़रा परवाह मत करना। ये वो लोग हैं जो ख़ुद तड़प रहे हैं, बेचैन हैं, ये दूसरों को सिर्फ़ बेचैनी ही दे सकते हैं।
इनका तो तुमसे कहना भी एक प्रकार की हिंसा है। क्योंकि जो आदमी शांत हो, उसे अशांत कर देना बड़ी हिंसा है। तुम आज के नौजवान हो और लोग परिपक्व होने का दंभ भर के अनुभव को अपना अस्त्र बना के तुम्हारे सामने आते हैं। ये तुमसे कहते हैं कि, “हमारी सुनो हमने दुनिया देखी है। हम अनुभवी हैं।” और फिर ये तुम्हारे मन में ज़हर भरते हैं। ये तुमसे कहते हैं कि इस रास्ते चलो तो इतना पाओगे, उस रास्ते चलो तो उतना पाओगे, और तुम्हारे मन में ये कामना के बीज डाल देते हैं।
और याद रखना ये जिस भी रास्ते पर तुम्हें चला रहे हैं, उस रास्ते पर ये खड़े ख़ुद होंगे। जैसे कि कोई उचक्का तुम्हें गलत रास्ते भेजे और फिर उस रास्ते ख़ुद ही तुम्हें लूट ले, ये ऐसे लोग हैं। ऐसा खूब होता है। पहले तो बहुत होता था कि राहगीर जा रहे हैं, उनको गलत रास्ते भेज दो और जब वो गलत रास्ते चल दें तो उनको लूट लो। ये यही काम कर रहे हैं। समझ रहे हो बात को?
एक काम ये और बखूबी करते हैं। इन्होंने हिंसा के प्रदर्शन को वर्जित कर दिया है। इन्होंने ये भी एक शर्त रख दी है कि ऊपर-ऊपर से यही दिखाना है कि हम बड़े खुश हैं। सतह खूब चिकनी होनी चाहिए। खाल खूब चमकती होनी चाहिए। भले भीतर तुम्हारा दिल, गुर्दा सब खराब हो गया हो। तो ये कहते हैं कि दुनिया को दिखाओ यही कि हम खुश हैं। ये कहते हैं हँसो।
पिछले सौ सालों में हँसने पर जितना ज़ोर दिया गया है, इतना मानवता के इतिहास में कभी नहीं दिया गया है।
तुम अपने देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखना, तुम्हें कोई हँसती हुई नहीं दिखाई देगी। तुम बुद्ध का चेहरा देखो, तुम्हें उस पर सिर्फ़ एक झीनी-सी स्मिता दिखाई देगी बस। ठहाका मारते नहीं दिखाई देंगे। यहाँ तक की, तुम अपने स्वतंत्रता सेनानियों के भी चित्र देख लो, तो सहज, शांत, मौन, गंभीर खड़े होंगे। वो तुमको कान से कान मुस्कुराते नहीं दिखाई देंगे।
पर आज के इन तथाकथित सफल लोगों को देखो, जो ये सी.ई.ओ. हैं, जो ये उपलब्धियों पर बैठे लोग हैं, जो सफल लोग हैं, मजाल है कि तुम्हें इनकी कोई शांत फोटो दिख जाए। ये तुम्हें हमेशा कैसे दिखाई देते हैं? हँसते हुए। इनका ये हँसना सिर्फ़ यही प्रदर्शित करता है कि ये कितना रो रहे हैं। जो व्यक्ति रो नहीं रहा उसे इतना हँसने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी। कहानियाँ भी हैं, कहते हैं जीसस कभी हँसे ही नहीं। महावीर के बारे में भी यही कहा जाता है, कभी हँसे नहीं। हँसे नहीं क्योंकि उन्होंने रोना बहुत पीछे छोड़ दिया था।
जिसका रोना पीछे छूट गया अब वो हँसेगा क्यों? और जो खूब हँस रहा है, यही समझ लो कि अभी रोना उसके साथ लगा हुआ है। और खूब ज़ोर दिया जाता है न इसपर कि तुम हँसो। और ये जितने हँसने वाले हैं इनके हँसने का कारण सिर्फ़ एक होता है — भोग, पा लेना, उपलब्धि। इनसे बचना! ये हँस के सिर्फ़ हिंसा छुपा रहे हैं। ये हँस के सिर्फ़ अपने आँसू, अपनी कुण्ठा, अपना दुख छुपा रहे हैं।
और ये हँसने वाली जमात अलग दिखाई देती है। तुम दूर से ही देख के समझ जाओगे। असल में ऐसा समझ लो कि दो ही तरह के धर्म हैं – एक हँसने वालों का और एक शांत रहने वालों का। और जो हँसने वालों का धर्म है ये तुम्हें दिख जाएगा कि ये हँसने वालों की जमात है। वहाँ से तुमको खूब शोर-शराबे की, नकली चेहरों की, व्यर्थ की बातों की खूब गूँज आ रही होगी, खूब महक आ रही होगी। उनके बीच में यदि तुम शांत और मौन हो जाओ तो वे असहज हो जाते हैं। उनके बीच जाने की शर्त ही यही है कि तुम भी हँसो। ये हँसना सिर्फ़ इसीलिए है, मैं दोहरा रहा हूँ, ताकि तुम छुपा सको कि तुम कितने बेचैन और हिंसक हो।
इन हँसने वालों से बचना। मैं ये भी नहीं कह रहा हूँ कि रोने वालों की ओर चले जाना। ये हँसने वाले और रोने वाले एक ही हैं। जो सब के सामने हँस रहा है वो अपने एकांत में रो रहा है। यह एक ही जमात है। हँसने और रोने के आगे भी कुछ लोग हैं। अगर सौभाग्य है तुम्हारा कि ऐसों से परिचय हो तो उन्हें उम्र भर मत छोड़ना। नहीं तो दुनिया की सारी आबादी का धर्म अब बस यही है – हँसना, रोना, हिंसा। यही मिलेंगे तुम्हें। बात आ रही है समझ में?
प्रश्नकर्ता: अपनी ज़िन्दगी से दूसरे को हटाएँगे कैसे?
आचार्य प्रशांत: अच्छा सवाल है। देखो, अभी मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ, बैठा हूँ? ऐसे समझ लो कि मैं तुमसे जुड़ा ही इसलिए हूँ क्योंकि मैं सबसे पहले अपने साथ हूँ। असल में मुझे तुमसे बार-बार बोलना पड़ रहा है कि दूसरों को ज़िन्दगी से हटाओ, पर दूसरों को ज़िन्दगी से हटाने का असली अर्थ होता है दूसरों के साथ प्रेमपूर्ण संबंध बनाना; ये दोनों एक ही बात हैं। सुनने में बड़ी विरोधाभासी लगेंगी, पर इन्हें समझो ध्यान से।
जब तक तुमने दूसरे का प्रभाव अपने ऊपर से हटाया नहीं, तब तक तुम्हारा दूसरे से प्रेमपूर्ण संबंध नहीं हो सकता।
अभी थोड़ी देर पहले मैंने कहा था न कि जिस संबंध में निर्भरता होती है उस संबंध में प्रेम नहीं हो सकता। तो यदि प्रेम हो तो इसके लिए ज़रूरी क्या है? दूसरे से प्रेम हो इसके लिए ज़रूरी है दूसरे से मुक्ति; ये बात बड़ी विचित्र है, पर समझना। दूसरे से प्रेम हो सके इसके लिए तुम्हें दूसरे से मुक्त होना पड़ेगा। तो मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ, मैं तुमसे जुड़ा तो हुआ हूँ, पर मैं तुमसे मुक्त हूँ। इस वक़्त मैं तुमसे पूरे प्रेम से जुड़ा हुआ हूँ, तुम परम सत्ता हो मेरे लिए अभी, लेकिन मैं तुमसे मुक्त हूँ। समझ रहे हो बात को?
अपने में जो पूरा है सिर्फ़ वही स्वस्थ तरीके से दूसरे से जुड़ सकता है। अपने में पूरे रहो, फिर तुम्हारे सारे संबंध स्वस्थ होंगे, उनमें प्रेम होगा।
फिर वो निर्भरता के और शोषण के संबंध नहीं होंगे। समझ में आ रही है बात? मैं तुम्हारे साथ हूँ, पर मैं तुम पर निर्भर तो नहीं हूँ न। इसलिए अभी जो घटना घट रही है वो बड़ी सुन्दर घटना है — साथ हैं, पर साथ होते हुए भी हम मुक्त हैं। अगर मैं ये करने लग जाऊँ कि तुम निर्भर हो गए मुझ पर, तो तुम पाओगे कि शोषण शुरू हो गया है। और अगर मैं मुग्ध हो गया तुम पर तो तुम पाओगे कि सत्य छुप गया है, अब मैं जो बोल रहा हूँ उस बात में उतना दम नहीं रह जाएगा।