दूसरों से दो ही तरह के संबंध हो सकते हैं — या तो प्रेम के, या फिर कामना के। कामना के रिश्ते उम्मीदों पर बनते हैं, जिनके पूरे न होने पर क्रोध आता है, और वही क्रोध फिर हिंसा बनता है। तुम्हारे भीतर यह गहराई से बैठा दिया गया है कि जीवन का अर्थ भोग है; और जिस रिश्ते की बुनियाद भोग हो, वहाँ प्रेम नहीं — हिंसा होती है। प्रेम में न कुछ चाहिए होता है, न भोगना होता है। प्रेम तब है जब बिना वजह, निःस्वार्थ, यूँ ही जुड़ जाते हो। अपने में जो पूरा है — सिर्फ वही प्रेम में स्वस्थ संबंध बना सकता है।
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प्रश्नकर्ता: हमारा स्वभाव इतना हिंसक क्यों है? हम कुछ भी देखते हैं तो ज़्यादा सोचते नहीं, सीधे उग्र हो जाते हैं। जैसे रास्ते में पत्थर पड़ा है तो उसे लात मारनी है, यह बड़ी आम बात है। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: पत्थर को लात मारने की संभावना कब ज़्यादा है?
प्रश्नकर्ता: जब हम गुस्सा हों।
आचार्य प्रशांत: जब गुस्सा हों तो संभावना बढ़ जाती है कि एक पत्थर ही पड़ा हुआ है तो उसे लात मार दोगे। तो क्या पता चलता है इससे कि हिंसा का क्रोध से संबंध है। पत्थर को लात इसलिए मारी क्योंकि क्रोधित थे। क्रोधित क्यों थे? तो कोई दूसरा था जिससे कोई उम्मीद थी, वो उम्मीद पूरी नहीं हुई तो क्रोध आया। या अपने आप से भी कोई उम्मीद थी तो वो दूसरों के सन्दर्भ में थी।




