मीरा का प्रेम तो साकार था — क्या वो अधूरा था?

Acharya Prashant

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मीरा का प्रेम तो साकार था — क्या वो अधूरा था?
मीरा अगर पुरुष होती, तो भी क्या श्रीकृष्ण को पति ही मानती? तुम्हें समझ में नहीं आ रही बात। ठीक है भाई दैहिकता है, शारीरिकता है, लेकिन फिर भी हम मूल्य देंगे, सम्मान देंगे कि इतना तो करा कि किसी जीवित पुरुष के जाकर के आलिंगन में नहीं बँध गई। उन्होंने कहा, "मुझे ऊँचे से ऊँचा चाहिए भले ही अभी वो जीवित ना हो, भले ही मुझे सामने शरीर–रूप में दिखाई ना देता हो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सारांश है। मेरा एक प्रश्न था। अभी आपने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं एक जगह, कि जो लोग मुझे देही रूप में स्वीकार करते हैं और मानते हैं, वे लोग भ्रमित हैं। फिर मन में प्रश्न आता है कि मीराबाई जब कहती थीं, "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई। जाके सर मोर मुकुट मेरो पति सोई।" तो वहाँ तो लगता है कि वो एक साकार रूप को श्रीकृष्ण के रूप में दर्जा दे रही हैं।

संत तुलसीदास जी को भी देखें तो वो भी साकार सगुण राम की भक्ति करते थे।

आचार्य प्रशांत: आप कब से हो गीता-समागम में?

प्रश्नकर्ता: डेढ़ से दो साल।

आचार्य प्रशांत: डेढ़-दो साल से हो गए तो तुलसीदास के ही कितने वक्तव्यों को मैंने 50 बार उद्धृत किया है। वो आपके कान में नहीं पड़े कभी? “राम ब्रह्म परमारथ रूपा।” सौ बार हम बात करते हैं, तो वो नहीं पढ़ा?

और राम को ही चार तरह से देखा जा सकता है इसको मैंने कितनी बार बताया है, वो आपने नहीं समझा? बिल्कुल बताया जा सकता है चार तरीक़े से राम को, आप जो सबसे निचला तरीका है, उससे क्यों बताना चाहते हो? राम हों कि कृष्ण हों, उनको चार तलों पर देखा जा सकता है। और संतों की बात कर रहे हो, तो संतों ने ही कहा कि “हाँ, चार तलों पर देखा जा सकता है, लेकिन तीन तल हैं व्यवहार और चौथा तल है — सार।” तुम्हें तीन तलों पर देखना है देख लो, पर असलियत चौथे तल पर ही है।

एक राम हैं, जिन्हें तुम एक ख़ास व्यक्ति मान सकते हो, दशरथ-पुत्र राम, वो सबसे नीचे के हैं।

फिर एक राम हैं, जिनको तुम कह सकते हो कि प्रत्येक जीव वो राम है — जहाँ कहीं भी चैतन्य अहंता है, वो राम है। वो दूसरा तल है।

तीसरा तल है जहाँ तुम कहते हो कि, नहीं-नहीं-नहीं-नहीं मात्र अहंता माने दृष्टा ही राम नहीं है, दृष्टा और दृश्य मिलाकर के जो समूची प्रकृति है, मैं उसको राम बोलूँगा। ये तीसरा तल है।

और चौथा तल है फिर, जिसके लिए संतों ने कहा है, “निर्गुण के गुण गाऊँगा” वो चौथा है। बार-बार चौथे की बात करी है। ये तो तुम्हें देखना है कि तुम्हारा जन्म यदि उच्चतम तक पहुँचने के लिए हुआ है, तो तुम्हें जहाँ चौथा उपलब्ध है, वहाँ पर पहले, दूसरे, तीसरे में क्यों फँसना है। और बाक़ी देखो, ज्यादातर दुनिया जब पहले ही तल पर फँसी होती है, तो जो दूसरे, तीसरे तल पर भी पहुँचते हैं ना, हम उनको सम्मान दे देते हैं। क्योंकि 90-95% लोग तो पहले ही तल पर हैं, 99% लोग पहले ही तल पर हैं, निचले ही तल पर हैं। वो इतने ज़्यादा देहाभिमानी होते हैं कि वो उच्चतम को भी देही बना देते हैं।

तो कोई उससे अगर उठकर दूसरे पर भी आया है, कि तीसरे पर भी आया है, तो हम उनको सम्मान देते हैं। लेकिन वो आख़िरी बात नहीं हो जाती।

स्मृति को भी धार्मिक ग्रंथ ही माना जाता है, पर वो आख़िरी बात नहीं हो जाती — आख़िरी बात श्रुति होती है, आख़िरी बात चौथा तल होता है।

तो स्मृति में बहुत तरह की बातें लिखी होती हैं, वो सब बातें भी अच्छी हैं, सम्माननीय हैं, पर वो आख़िरी बातें नहीं हैं। और वो बातें इसलिए ताकि उन बातों के पार निकल सको, वो बातें इसलिए नहीं हैं कि उन बातों पर अटक जाओ। अगर आपको दूसरे तल के राम या कृष्ण की बात करी जा रही है, तो इसलिए करी जा रही है कि पहले से उठ जाओ भाई, इसलिए नहीं करी जा रही है कि दूसरे पर ही अटक जाओ।

चार सीढ़ियाँ हैं जो पहले पर बैठा है, उसको दूसरे पर बुलाया जाता है, दूसरे पर इसलिए थोड़ी बुलाया जाता है कि दूसरी सीढ़ी पर सोना शुरू कर देगा! दूसरी पर बोला जाता है कि आप और आगे निकल जाओ। हाँ, जो दूसरी पर भी बुला रहा है, हम उसको इज़्ज़त देंगे बिल्कुल, लेकिन वहाँ रुक नहीं जाएँगे।

तो स्मृति की बातें ज्यादातर उन लोगों के लिए थीं, जो सीधे-सीधे श्रुति तक नहीं पहुँच सकते थे। और स्मृति तो ऐसी चीज़ है जो कि लगातार विकसित होती रही है, रामचरितमानस तो अभी हाल में ही लिखी गई थी। उसके बाद भी अगर और कुछ अच्छे ग्रंथ लिख दिए जाएँ तो स्मृति में हम उनको भी सम्मिलित कर लेंगे, स्मृति तो ऐसी है आप कहते जाइए। और स्मृति इनके लिए है जिनको श्रुति समझ में नहीं आती।

आम आदमी था, भारत में अगर तुम देखोगे तो जनता ज्यादातर खेतिहार थी, पढ़े-लिखे नहीं थे लोग और वर्ण-व्यवस्था बन गई थी, जातिवाद। तो उसके कारण ये हो गया था कि पढ़ने दिया भी नहीं जाता था। तो फिर संतों ने तरीक़े निकाले कि कैसे इन तक हम, नहीं जो कुछ जानते, अशिक्षित हैं, अनपढ़ हैं तो भी इन तक हम कुछ तो बात पहुँचा दें। तो उसके लिए फिर किस्से, कहानियाँ, ये सब करा गया कि लो भाई, तुम्हें दे दिया गया। पर वो कोई आख़िरी बात नहीं है। वो ये है कि जो पहली सीढ़ी पर पड़ा है, उसको किसी तरह उठाकर दूसरी पर ले आओ, उसका बस इतना ही महत्त्व है।

पर आज के समय में आप पहली सीढ़ी पर नहीं पड़े हो, आप बहुत पढ़े-लिखे आदमी हो। आपको अगर दूसरी पर रोका जाता है, तो ये आपके साथ अन्याय है। और कोई अगर आपको बोल रहा है कि जो दूसरी सीढ़ी है वही आख़िरी है, तो झूठ बोल रहा है, और उसमें उसका स्वार्थ है या कम से कम अज्ञान है।

भाई, 99% लोग तो कृष्ण को किसी भी तरह से याद ही न करते हों, मीराबाई कम से कम याद तो करती थीं और उस याद ने ही उनको बहुत ताक़त दे दी। फिर आप अगर एक ऐतिहासिक चरित्र की तरह देख रहे हैं मीराबाई को, तो फिर आपको संत रविदास को भी याद करना पड़ेगा — गुरु तो वो रविदास को मानती थीं। और रविदास तो नहीं कहेंगे, कि परम सत्ता देह लेकर खड़ी हो रही है। रविदास तो उसी श्रेणी के हैं, जिस श्रेणी के फिर संत कबीर हैं, और लगभग वो समकालीन ही थे जगह का अंतर था बस।

सबको एक बराबर मत मान लिया करो। आपको ये लगता है कि पीछे की जितनी बातें हैं, वो सब एक-सी बातें हैं, और एक ही बात कही जा रही होगी। रेलवे स्टेशन पर चले जाइए वहाँ पर वो जो व्हीलर्स वाला स्टॉल होता है, वहाँ पर आपको किताबें मिलेंगी, ऐसे ही स्थानीय प्रकाशकों की — “कबीर और रहीम के दोहे।” और मैं जितनी बार देखता हूँ, उतनी बार कहता हूँ, “वाह रे जगत! वाह रे तेरी दुर्बुद्धि।” इनको लगता है कि कबीर और रहीम एक ही तो बात हैं!

भाई, वो बहुत अलग लोग हैं और बहुत अलग स्तरों की बातें करी हैं। हाँ, रहीमदास (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) के दोहों में भी कुछ मूल्य है, हम पढ़ेंगे, सम्मान देंगे, पर कबीर और रहीम को एक साँस में कह देना मूर्खता की बात है। इसी तरीक़े से सब संत बराबर नहीं हो जाते हैं। हाँ, आम आदमी की तुलना में सब श्रेष्ठ होते हैं, आम आदमी से सब बेहतर ही हैं। लेकिन आसमान में और आसमान में अंतर होता है।

आप एक दिवाली वाला रॉकेट मारते हो वो भी कहते हो, “आसमान में चला गया।” फिर एक जंबो जेट है, उसको भी आप कहते हो, "आसमान में उड़ रहा है, वो 35,000 फीट पर है।" और आपने जो रॉकेट मारा था दिवाली वाला, वो गया होगा 100–200 फीट। लेकिन दोनों के लिए आप "आसमान" ही बोल देते हो, क्योंकि आपसे तो दोनों ही ऊँचे हैं।

दिवाली वाला रॉकेट भी आप कहते हो "आसमान में चला गया," जम्बो जेट भी बोलते हो, "आसमान में है।" और उसके बाद जो स्पेसक्राफ्ट होता है, जो पृथ्वी के वातावरण का अतिक्रमण करके आउटर स्पेस में निकल जाता, उसको भी आप यही बोलते हो, "वो देखो चला गया, वो व्योम में चला गया, आसमान में, आकाश में चला गया।"

अरे भाई! आकाश” और "आकाश” में बहुत अंतर होता है।

इसी तरीक़े से "ऐतिहासिक चरित्र" और "ऐतिहासिक चरित्र में" बहुत अंतर होता है। सिर्फ़ इसलिए कि "संत" बोल दिया गया किसी को, तो सब बराबर नहीं हो जाते। एक, एक तल की बात करता है और एक उससे बहुत आगे की बातें करता है। और ये बात भी विवेक में शामिल होती है। जो बिल्कुल केंद्रीय वक्तव्य हैं श्रुति के उनके अलावा किसी भी चीज़ को एब्सोल्यूट मत मान लेना कि "देखो, ये बात तो इन्होंने कही, इनको संत कहा जाता है, तो हम इस बात को भी बराबर का वज़न या श्रेय देंगे।" ऐसे नहीं हो जाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब मुझे बहुत पसंद हैं, सूफ़ियों का उन पर प्रभाव था। कहीं-कहीं आप पढ़ेंगे कि मिर्ज़ा ग़ालिब स्वयं भी सूफ़ी थे, और उनकी बातों में कहीं-कहीं पर आध्यात्मिकता झलक भी आती है। पर जब आप दीवान-ए-ग़ालिब उठाते हो, तो 70–80–90% तो ऐसा मामला है जो कहीं से "आध्यात्मिक" नहीं है। तो मैं उसको थोड़ी कह दूँगा कि "ये देखो, ये भी इन्होंने कितनी गहरी बात बोल दी!" उसमें कुछ गहरी बात नहीं है।

हर चीज़ जो आपको कही गई है कि किसी ऊँची जगह से आ रही है या हर नाम जो आपको ऊँचा बता दिया गया है, उसको एक बराबर इज़्ज़त नहीं दी जा सकती। बहुत अंतर होता है। "आसमान" और "आसमान में" बहुत अंतर होता है।

कोई 6 फ़ुट 2 इंच का आ जाए उसको भी आप बोल देते हो "ऊँचा है।" और बुर्ज ख़लीफ़ा जाओगे उसको भी कहोगे कि "ऊँची है।" तो 6 फ़ुट 2 इंच और वहाँ दुबई का बुर्ज ख़लीफ़ा, वो एक बराबर नहीं हो गए। ऊँचाई और ऊँचाई में बहुत अंतर होता है। ये है कि आपसे शायद दोनों ही ऊँचे हैं क्योंकि आप 5 फ़ुट के हो, ये हो सकता है।

इसलिए इतना ज़्यादा स्पष्ट करके कहा कि "भाई, चार हैं राम, चार!" ताकि रामत्व के भी अलग-अलग तल हैं, ये आपको स्पष्ट हो जाए। और ये भी स्पष्ट हो जाए कि हम ऐसे अभागे हैं जो रामत्व के सबसे निचले तल पर गिरे रहते हैं। ये होता है असली संत का जादू, वो सब साफ़ करके बता देता है।

हमारे यहाँ जैसे होता है ना, हम घरों में मंदिर बनाते हैं और जितने स्थानीय देवी–देवता होते हैं, आप जाओगे, देखोगे, अलग-अलग जगह बहुत सारी वो छोटी–छोटी मूर्तियाँ रख देंगे। कई बार मूर्तियाँ नहीं मिलेंगी तो कैलेंडर से कुछ काटकर चिपका देंगे और इस तरह से कर रखा होता है। और फिर क्या बोलते हैं? "सब एक बराबर ही तो हैं! सब एक बराबर है।”

पहाड़ों पर चले जाओ, उनके अपने हैं। कहीं और चले जाओ, उनके अपने हैं। और किसी को कोई भी दे दो वो उसको बगल में रख देगा, कहेगा "हाँ, सब बराबर है, सब बराबर है।" ना जाने क्यों मुझे इसमें चापलूसी की बू आती है — कि जितने बड़े लोग हैं सबको नमन कर लो, किसी से भी पंगे लेकर ना रखो, किसी को भी नाराज़ ना करो, सबसे बनाकर रखो, क्या पता कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए।

विवेक का मतलब है — साफ़ जानना सार कहाँ है, और सार कहाँ नहीं है। दिवाली के रॉकेट को इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन) का रॉकेट नहीं बोल सकते आप। हाँ, आसमान की ओर दोनों जाते हैं ठीक है।

खूब चलता है "नहीं, इनकी भी सुन लो, इनकी भी सुन लो, इनकी भी सुन लो” (बाहर की तरफ़ अलग-अलग जगहों को इंगित करते हुए) सब लोग भगवान जी की ही तो बातें कर रहे हैं।

ये क्या — डरपोक, कैंट कॉल अ स्पेड अ स्पेड। डरे हुए हैं। “किसी को भी कैसे बोल दूँ कि फर्ज़ी है, कैसे बोल दूँ। रिस्क कैसे उठाऊँ, क्या पता कब किसकी ज़रूरत पड़ जाए। सबसे हाय–हेलो करके रखना चाहिए ना। कभी बिजली विभाग में काम पड़ सकता है, कभी जल विभाग में, कभी परिवहन विभाग में। सबसे जाकर के जहाँ कोई अफ़सर मिले, कोई पटवारी, चपरासी, कोई भी मिल जाए, सबसे हाय–हेलो करके रखना चाहिए। सब एक बराबर है।”

सबके आगे जाकर झुक जाओ, सब एक बराबर है।

क्योंकि मैं अपने आप को इतना हीन मानता हूँ कि कोई थोड़ा-सा भी ऊपर हो तो मुझे लगेगा कि वो आकाश हो गया। अरे हाँ, है ऊपर, इतनी इज़्ज़त हम दे देंगे, आकाश नहीं हो गया। और कई बार तो जो ऊपर नहीं भी होता, हम उसको भी दे देते हैं। बेचारे ट्रैफ़िक पुलिस के जो कांस्टेबल खड़े रहते हैं जैसे ही वो पकड़ेंगे, तो ये जितने बेरोज़गार छोरे होते हैं तो वो तुरंत जाकर उनको बोलेंगे, "अरे दरोगा जी! अरे दरोगा जी! अरे दरोगा जी!"

तुम अच्छे से जानते हो दरोगा नहीं है, वो पीसीआरआई है। उसमें जो बैठे हैं वो बेचारे, वो दरोगा नहीं हैं, क्यों उनका अपमान कर रहे हो उनको "दरोगा–दरोगा" बोल–बोल के। पर जो मिले सबको सर पर चढ़ा लो, क्योंकि हीन भावना बहुत है, सबको माई–बाप बना लो।

इतनी गीताएँ हैं, सब बराबर है? तो फिर हम भगवद्गीता ही क्यों पढ़ रहे हैं? बोलो।

एक गीता है, जिसको "गर्भ गीता" भी बोल सकते हैं, जिसमें आधा वर्णन यही है कि जब तुम पेट में होते हो, तो तुम्हें कैसे–कैसे कीड़े काटते हैं, हम वो पढ़ लेते हैं? भाई, गीता नाम लगा है "सब बराबर हो गए!" जैसे जितने ऐतिहासिक–धार्मिक व्यक्तित्व थे "सब बराबर हो गए!" वैसे फिर हम कल से भगवद्गीता हटाते हैं, दूसरी गीता ले आते हैं। और यहीं पर व्यवहारिक रूप से तुम तब भी फँस जाते हो, जब मैं बोलता हूँ कि "देखो, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बोल रहा हूँ पर मेरी सुन रहे हो, तो मेरी ही सुन लो।"

"नहीं, आचार्य जी भी ठीक हैं, और वो जी भी ठीक हैं, और फलाना जी भी ठीक हैं।"

हो गया बंटाधार।

अच्छा मीरा अगर पुरुष होती, तो भी क्या श्रीकृष्ण को पति ही मानती? तुम्हें समझ में नहीं आ रही बात। ठीक है भाई दैहिकता है, शारीरिकता है, लेकिन फिर भी हम मूल्य देंगे, सम्मान देंगे कि इतना तो करा कि किसी जीवित पुरुष के जाकर के आलिंगन में नहीं बँध गई। उन्होंने कहा, "मुझे ऊँचे से ऊँचा चाहिए भले ही अभी वो जीवित ना हो, भले ही मुझे सामने शरीर–रूप में दिखाई ना देता हो।" इतना तो श्रेय देंगे ठीक है। लेकिन साथ ही साथ ये भी याद रखेंगे, कि महिला थीं इसलिए श्री कृष्ण की पति और पुरुष रूप में उन्होंने कल्पना करी। पुरुष होती तो थोड़ी कहती कि मैं पति मान रही हूँ या कुछ और है।

और कुछ होते हैं जो कहते हैं, हम कृष्ण को पति मानते हैं। वो फिर स्वयं को स्त्री मानना शुरू कर देते हैं, तुम्हें ऐसे मिलेंगे उनका खेल कुछ और हो जाता है, वो कहते हैं “श्री कृष्ण हमारे पति हैं और हम उनकी पत्नी हैं।” और तुम कहोगे, “तुम्हारी तो दाढ़ी भी है।” वो कहेंगे, “उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मैं नाचूँगी।”

मैं तो कह रहा हूँ, इसको भी श्रेय मिलना चाहिए। लेकिन ये याद रखो, कि कितना श्रेय देना है। वो मत कर लेना कि कबीर और रहीम, जैसे वो एक ही हों और एक ही बात बोल रहे हों।

अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना वहाँ मुग़लों के, अकबर के दरबार में बैठे हुए हैं और वो वहाँ पर दुनियादारी अपना चला रहे हैं, और ये सब कर रहे हैं — और वो उस स्तर की बातें करते थे। और वहाँ पर संत कबीर हैं, जो पारमार्थिक तल की बात कर रहे हैं।

क्या तुलना है?

हाँ, व्यवहारिक जीवन में रहीम दास के दोहे भी उपयोगी हो जाते हैं, हम नहीं मना कर रहे।

**"रहीमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए।।”

हाँ ठीक, व्यवहारिक तल पर ठीक है बात चलो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसमें एक प्रति–प्रश्न था, जैसे अभी आपने बात की कि हम बिल्कुल श्रेय देंगे एक स्तर तक मीराबाई को भी, कि उन्होंने एक दैहिक पुरुष की जगह श्रीकृष्ण को आगे देखा।

तो फिर इसमें भी एक प्रश्न उठता है कि जैसे हम आचार्य शंकर जी की तीन रियलिटीज़ जो लें — प्रातिभासिक, व्यवहारिक और पारमार्थिक, तो ये उनकी कल्पना प्रातिभासिक आएगी जो व्यवहारिक से भी नीचे, या पारमार्थिक की ओर जाएगी? क्योंकि व्यवहारिक रूप में तो श्रीकृष्ण ही हैं।

आचार्य प्रशांत: पारमार्थिक की ओर जाएगी, ये वो कल्पना है जो आपको ऊँचा उठाएगी, तभी तो श्रेय दे रहे हैं। लेकिन कहाँ से ऊँचा उठाएगी? जहाँ आप हो वहाँ से ऊँचा उठाएगी।

चार सीढ़ियाँ हैं। दूसरे तल का सहारा लोगे, तो पहले से दूसरे पर पहुँच जाओगे, तीसरे पर नहीं पहुँच जाओगे। ऊँचा उठाएगी पर फिर स्वयं बंधन बन जाएगी। जहाँ पर हो वहाँ से तो उठा देगी, पर और आगे नहीं उठने देगी। समझ में आ रही है बात?

आप ऊपर को चढ़ रहे होते हो, रेलिंग का सहारा लेकर के। रेलिंग पूरी ऊपर तक जाती है, ठीक है? जब ऊपर चढ़ रहे होते हो तो आप कैसे, आप यहाँ पर हो (नीचे) तो रेलिंग यहाँ (हाथ से ऊपर पकड़कर) से थामते हो ना। और फिर इसका ज़ोर लगाकर के अगले पायदान, अगले सोपान पर आ जाते हो, अगली सीढ़ी पर आ जाते हो। यही तो करते हो।

ऐसे चढ़ रहे हो, ऐसे रेलिंग पकड़ी यहाँ आ गए। अब यहीं पकड़े रहो, तो क्या ऊपर पहुँच पाओगे? तो ऊपर उठाएगी ये बात, पर फिर एक सीमा के बाद ऊपर उठने से रोक भी देगी। और ऊपर उठना है तो फिर जो पकड़ रखा था, उसको छोड़ना पड़ेगा और ऊपर कुछ पकड़ना पड़ेगा।

साधारण स्त्री से तुलना करोगे, तो बहुत-बहुत ऊपर है मीरा। एक बात उन्हें समझ में आई, उसके लिए वो ज़हर पीने को तैयार हैं। एक मध्ययुगीन सामंतवादी मानसिकता, कैसा समय था वहाँ — मेवाड़, राजस्थान, उस पूरे क्षेत्र में जातिवाद एकदम चरम पर। और वो जा रही हैं और संत रविदास हैं, जो कि जाति से चर्मकार हैं और उनके पास बैठ रही हैं। ना डर से डर रही हैं, ना धमकी से, ना लज्जा से, कुछ नहीं। बहुत ऊपर है आम स्त्री से।

पर फिर आप श्रुति से अगर तुलना करोगे, तो वो ठीक नहीं है। वो तुलना ठीक नहीं होगी।

तो जब भगवद्गीता की बात हो रही हो, जहाँ श्रीकृष्ण उच्चतम संदेश दे रहे हों, वहाँ पर ये बात लेकर के आना कि "मोर मुकुट" और "बंसी" वहाँ पर ये बात लाना ठीक नहीं है। समझ में आ रही है बात?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: और जब कोई तुम्हें एक एक सीमा तक ऊपर उठाए, तो उसका आभार ही व्यक्त करना चाहिए। मैं बार–बार कह रहा हूँ, श्रेय दो, सम्मान दो, बिल्कुल दो। लेकिन ये भी याद रखो कि उसने वहीं तक उठाया है, अब आगे नहीं ले जा पाएगा, अब बल्कि वो बाधा बनेगा, स्वयं अड़चन बनेगा।

आप कोई भी जो छवि बनाते हो, विधि बनाते हो, सहारा बनाते हो, वो सीमित होता है और अल्पकालीन होता है। एक जगह तक आपको वो पहुँचाएगा और फिर उसी जगह पर वो आपको रोक भी देगा। अब अगर और आगे जाना है तो जिसको सहारा मानकर यहाँ तक आए थे, उसको त्यागना पड़ेगा। चाहे वो कोई छवि हो, व्यक्ति हो, सिद्धांत हो, जो भी कुछ हो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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