कुविचार और सुविचार में अंतर कैसे करें? || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: दो शिविर पहले मैं जब नोएडा आश्रम आया था तो वहाँ भजन का जो सेशन हुआ था उसमें कबीर साहब का भजन था, उसमें एक दोहा था
"माया-माया सब कहे, माया लखे न कोय। जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय।"
~ कबीर साहब
तो आज वो पुस्तक मेरे साथ ही है, मैं पढ़ रहा था। और कल हमको यहाँ से लिटरेचर (साहित्य) दिया गया था ज़िम्मेदारी के बारे में। उसमें डर और आसक्ति के बारे में भी उल्लेख था। तो मन में तो अच्छा-बुरा कभी-कभार तो चल ही रहा होता है। तो अच्छा भी हो और चल रहा हो तो हमें पता कैसे चलेगा कि यह माया है? और क्या यह आसक्ति की तरफ़ इशारा है? क्योंकि 'माया' शब्द भगवद्गीता में भी आता है।
आचार्य: सवाल यह है कि कबीर साहब अपने एक दोहे में, साखी में कहते हैं कि "माया-माया सब कहे, माया लखे न कोय। जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय।" तो आप पूछ रहे हैं कि मन में तो अगर बुरा चलता है तो अच्छा भी तो चलता है। अच्छी बातें भी तो मन में घूमती ही रहती हैं न। तो दोहे के हिसाब से जाएँ तो क्या मन में अच्छी बातों का चलना भी माया ही है? यही प्रश्न है न?
जिसको हम सुविचार या सदविचार कहते हैं, अच्छी बात और जो कुविचार होता है, आम भाषा में बुरी बात। दोनों में एक मौलिक अन्तर होता है। मौलिक अन्तर यह है कि कुविचार विचारक को, विचारकर्ता को बचाने के लिए होता है। बल्कि ऐसे कहिए कि विचारक का जो यत्न है ख़ुद को बचाये रखने के लिए वो कहलाता है कुविचार।






