आचार्य प्रशांत: (लिखित प्रश्न पढ़ते हुए) हर्ष हैं मुंबई से। कैसे हो हर्ष? आचार्य जी प्रणाम, आशीर्वाद। ईर्ष्या और द्वेष के विचार मन में क्यों आते हैं? क्योंकि ईर्ष्या और द्वेष ही मन है, हर्ष! मन जब बना था न और मन जब बनता रहता है, तो उसको बनाने की सामग्री ही यही है ईर्ष्या और द्वेष।
वो इन्हीं चीज़ों से निर्मित है और इन्हीं चीज़ों को आकृष्ट करता है। जब पूछते हो कि ईर्ष्या और द्वेष मन में क्यों आते हैं तो ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी मान्यता हो कि मन तो अपनेआप में बहुत साफ़ और पवित्र ज़गह है जहाँ पर बाहर से ईर्ष्या और द्वेष नामक गन्दी चीज़ें यूँही दुर्घटनावश, संयोग बस आ जाती हैं।
मन अपनेआप में कोई साफ़ सुथरी ज़गह नहीं और ईर्ष्या और द्वेष कोई बाहर से आने वाली चीज़ें नहीं और ईर्ष्या और द्वेष का मन में पाया जाना न कोई दुर्घटना है न कोई संयोग है। मन माने ‘ईर्ष्या’ मन माने ‘द्वेष’। वो तो वहाँ होंगे ही।
बात समझ रहे हो?
तुम्हारा सवाल ऐसे ही है जैसे कोई पूछे शरीर में खून क्यों पाया जाता है। अरे! भाई, शरीर माने खून। खून नहीं तो कैसा शरीर? ईर्ष्या और द्वेष मन की सामग्री है। कहीं से आ नहीं गयी है। इन्हीं के साथ पैदा हुए थे तुम।
तो सबसे पहले तो ये देखना है कि ये भीतर ही मौज़ूद है। हाँ बाहर से जब कोई इशारा नहीं मिलता, बाहर से जब कोई उत्तेजना नहीं मिलती, तो ये ईर्ष्या और द्वेष सोये पड़े रहते हैं। जब ये सोये पड़े रहते हैं तो तुम्हें लगता है कि अभी मुझमें ईर्ष्या नहीं है द्वेष नहीं है।




